आसमां पर घर बनाउं मेरा मकसद नहीं, मेरे वतन की जमीं ही मेरी जन्नत है।

नया लुक संवाददाता, लखनऊ।
आज के समय में बहुत से ऐसे लोग हैं जो जानकारी के अभाव या अन्य किसी कारणवश अपनी किसी समस्या का समाधान नहीं निकाल पाते। दरअसल जिसने अपनी समस्या का समाधान खोज लिया आज के समय में वहीं चतुर और सुजान है। हमारे देश में ‘निष्काम कर्म’ की बात होती है, यानी ऐसी सेवा जिसमें कोई अपेक्षा न हो। हमारे यहां तो कहा गया है कि “सेवा परमो धर्मः”। निष्काम भाव से सेवा करने को ही दूसरे शब्दों में हम स्वैच्छिक सेवा करना भी कह सकते हैं। यदि हम प्रकृति की ओर नजर करें तो हम देखेंगे कि सूर्य, चंद्र, वृक्ष, वनस्पतियां, सभी मानव के लिए निरंतर सेवा करते आ रहे हैं इसीलिये वे जीवनदायी कहलाते हैं। प्रकृति हमें कुछ न कुछ देती ही रहती है और इसके बदले में कभी किसी चीज की हम से अपेक्षा भी नहीं करती।


नव शक्ति निर्माण सेना के अध्यक्ष प्रदीप सिंह भदौरिया नव शक्ति निर्माण सेना के बैनर तले उन जरूररतमंदों की मदद करते हैं जिन्हें सच में मदद की दरकार है। उनके संगठन के लोगों में इतना सेवा भाव है कि इसका कहना ही क्या। यह बिलकुल सच कहा गया है कि उत्साह से भरा एक व्यक्ति अत्यन्त बलशाली होता है क्योंकि उत्साह से बढ़ कर कुछ नहीं होता। नया लुक से खास बातचीत में वे बताते हैं कि हमारे संगठन का मुख्य उद्देश्य जनता की किसी भी समस्या को प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवे सोशल मीडिया के माध्यम से आवाज को उठाना है। हमारा संगठन कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है। संगठन का कार्य सिर्फ जनता की निष्काम भाव से सेवा करना है। संगठन को किसी भी राजनैतिक पार्टी के विचाार से कोई लेना—देना नहीं है। ‘सबका साथ सबकी ताकत’ संगठन का मुख्य उद्देश्य है। संगठन के अध्यक्ष का कहना है कि हमारा संगठन किसी भी व्यक्ति विशेष की आर्थिक सहायता नहीं करेगा लेकिन जो व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर होगा उसकी जिम्मेदारी संगठन ले सकता है।

संगठन अपनी आर्थिक मजबूती को देखते हुये जनता की आर्थिक सहायता करेगा। संगठन कभी भी उन लोगों का साथ नहीं देगा जो जाति अथवा धर्म के नाम पर अपना व्यक्तिगत फायदा उठाते हैं। संगठन किसी भी जाति या धर्म विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करेगा।
संगठन के अध्यक्ष का कहना है कि आज हम देख रहें हैं कि चारों तरफ अनाचार बढ़ रहा है। गरीब और ज्यादा गरीब हो रहे हैं। ज्यादातर लोग सिर्फ अपना भला चाहते हैं, दूसरों की उन्हें परवाह नहीं। क्यों? क्योंकि मानवी अपने स्वार्थ में अंधा होता जा रहा है। अपने स्वार्थ के कारण अकारण ही प्रकृति से खिलवाड़ कर रहा है। स्वैच्छिक सेवा भूलता जा रहा है। जबकि अनाचार, गरीबी और स्वार्थ परायणता का समाधान स्वैच्छिक सेवा में ही है। यह एक ऐसा मानवीय मूल्य है, जिससे न सिर्फ समाज और देश का स्वरूप निखरता है, बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी आत्मिक विकास में लाभ होता है।