इंटरनेट से बदलता जीवन

वीणा सिंह

नया लुक।  आधुनिक डिजिटल युग में नई पीढ़ी जिस गति से टेक्नालाॅजी का प्रयोग कर रही है उसे देखते हुए तरफ तो लगता है कि इससे शिक्षा के क्षेत्र में क्रंातिकारी बदलाव आयेगा ए वहीं दूसरी ओर इसके दुष्प्रभाव भी चिन्ता का विषय बने हुए है। स्मार्टफोन टैबलेट ई-रीडर्स व लैपटाप जैसे गैजेट्स नई पीढ़ी की एकाग्रता व चिंतन की क्षमता को कम कर रहे है। वैसे तो अधिकतर लोग जानकारियों को याद करने के स्थान पर उन्हें गूगल एवं विकीपिडिया जैसे नेट पोर्टलों से लेना पसन्द करते है पर इस सुविधा से छात्र यानि युवा वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित है। उन्हे लगता है कि सब कुछ तो इंटरनेट पर उपलब्ध है बस जरूरत पड़ने पर उठा लेना है। यह ही गूगल इफेक्ट है।
यह सच है कि समाज में सूचनाओं को संप्रेषित करने और ज्ञान को बढ़ाने में इंटरनेट की अहम भूमिका रही है। इसके माध्यम से दूर बैठे अपने परिजनों को देख सकते है बात कर सकते हैं देश विदेश के मानचित्र देख कर आने जाने का मार्ग तलाश कर सकते हैं। घर बैठे आन लाइन शापिंग तो जैसे चलन में आ गई हो। जब तक इंटरनेट की सुविधा कम्पयूटर तक सीमित रही तब तक अनावश्यक इस्तेमाल कम हुआ पर जब से स्मार्टफोन का आगमन हुआ लोग रोटी कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को दरकिनार कर स्मार्टफोन पर अनावश्यक कार्य और खर्च कर रहे हैं। स्मार्टफोन का उपयोग सुविधा और आवश्यकता के लिए कम फैशन और शौक के लिए ज्यादा हो रहा है क्योंकि वह स्टेटस सिम्बल बन गया है। हाथ में महंगा फोन दर्शाता है कि अमुक व्यक्ति आधुनिक समाज का स्मार्ट व्यक्ति है।

यह चिन्ता का विषय है कि इंटरनेट से जहां एक ओर अनेकों फायदे और सुविधाएं है वहीं दूसरी ओर दुष्प्रभाव भी है। इंटरनेट के अधिक इस्तेमाल से लोगों में तरह तरह की मानसिक बीमारियां बढ़ रही हैं। इनमें से एक को ’नेटब्रेन’ नाम दिया गया है। इस बीमारी के होने पर व्यक्ति को असामाजिकता और मानसिक रूप से विचलित होने जैसी समस्याये होने लगती है। जिससे उनके काम और जिंदगी में असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है यहां तक कि पारिवारिक संबंधों पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ता है। गैजेट्स के अधिक इस्तेमाल से सबसे ज्यादा बच्चों के मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। मोबाइल लैपटाप टैब या अन्य किसी भी प्रकार के गैजेट से हानिकारक रेडिएशन निकलता है जो बच्चों के मस्तिष्क पर बुरा असर डालता है। बच्चे क्या बड़े भी इसके प्रभाव से बचे नहीं है। वे भी अपने महत्तवपूर्ण कार्यों को छोड़ कर इंटरनेट पर कीमती समय को नष्ट करते हैं। बदलती जरूरत बदलती सोंच के कारण अक्सर माता पिता भी बच्चों को मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से रोकते व टोकते नहीं । जिसके दुष्परिणाम स्वरूप आंखों में दर्द अनिंद्राए सिर में दर्द ए घबराहट आदि के रूप सामने आना स्वाभाविक है।

माना कि सरकार डिजिटल इंडिया का सपना देख रही है इंटरनेट की उपयोगिता सिर्फ लोगों को तकनीकी आधार पर जोड़ने या सूचनाएं देने तक सीमित नहीं है बल्कि जीवन को ज्यादा सुविधा जनक और बेहतर बनाने की योजना है। स्मार्ट सिटी स्मार्ट गांव बनाने की योजना है अनगिनत सेवाओं सुविधाओं को आम आदमी तक पहुंचाना है जिसमें अहं भूमिका इंटरनेट की ही होगी। परन्तु गरीब जन के लिये इंटरनेट का उपयोग न तो सरल होगा न अति आवश्यक होगा। उसके लिए इंटरनेट से पहले बेसिक आवश्यकताएं शिक्षा तथा रोजगार जरूरी है। इस पक्ष पर भी विचार करना आवश्यक है। जिससे वे अनावश्यक खर्च और तनाव से बचे रहें। कहा जाता है कि अति किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती पर इंटरनेट के बारे में यह पूर्णतः सत्य है। बच्चे युवा बड़े सभी इसकी लत के शिकार हो रहे है जो कि भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा है। इसलिए एक सीमित दायरे में रह कर ही इंटरनेट का इस्तेमाल करना चाहिये तथा अपने जीवन को इसके दुष्परिणामों से से बचाना चाहिये।