एक बार सभी भक्तों बोलो- फुंतरू बाबा की जय

मधुकर त्रिपाठी

लखनऊ। इधर बाबा, उधर बाबा, जहां देखो वहां बाबा, अभी बहुत हैं बाबा, पर दिखते नहीं बाबा, अरे क्या बात करते हो, पहले बनो बाबा, फिर दिखेंगे बाबा। जब से दिल्ली वाले दीक्षित बाबा का नाम देश के बाबा शिरोमणियों में शुमार हुआ है मेरे भीतर की प्रतिभा बार-बार अंगड़ाई ले रही है। मेरा मन मुझे बार-बार इस बात के लिए समझा रहा है कि कहां दीन-दुनिया के झमेले में फंसे हो तुम्हारे अंदर अपार प्रतिभा है बाबा क्यों नहीं बन जाते। सोचता तो बहुत हूं लेकिन मेरा दिल बैठ जाता है कि अगर मैं बाबा बन गया तो जयकार लगाने वाला भी कोई चाहिये क्योंकि मेरे फॉलोवर कम हैं। फिर सोचता हूं कि मुझे तो फ्राड करने आता नहीं और न ही उच्चस्तरीय झूठ बोलने की कोई डिग्री ही है। मेरे पास तो महिला मित्रों की संख्या भी कम है। जब मैं अपनी तुलना इन बाबा शिरोमणियों से करता हूं तो मन बड़ा ही बेचैन हो उठता है। फिर किसी तरह से मैं अपने मन को समझाता हूं कि चलो मुझे कुछ आता नहीं तो मैं इनकी पहले कॉपी करना सीख लूं। इसलिए मैं इनके जैसा बनने की तैयारी कर रहा हूं। वैसे तो बाबा बनना एक पुण्य कर्म है। बाबा बनने के बाद हर कोई पुण्यात्मा हो जाता है।

 

बाबा कई प्रकार के होते हैं। लंबे बाल वाले। बिना बाल वाले। लंबी दाढ़ी वाले। लंबे नाखून वाले। लंबी चोटी वाले आदि-आदि। इसी के साथ बाबाओं की एक दूसरी वेराइटी होती है जो उन्हें जटा-जूट से निरपेक्ष रख कर दुनियादारी से जोड़ती है। जैसे चिमटे वाले। सोंटे वाले। बाघंबर वाले। सुट्टा

बाबा पर व्यंग्य

वाले बाबा। चिलम वाले बाबा। टाट वाले। बाल्टी वाले। मेले वाले। ठेले वाले। पानी वाले। बताशे वाले। दूध वाले। लंगोट वाले आदि। कुछ बाबाओं का संबंध उनके भक्तगण सीधे-सीधे बॉटनी से जोड़ते हैं जैसे पीपल वाले, बरगद वाले, बबूल वाले, सिंघड़ी वाले, शीशम वाले, पाकड़ वाले, महुआ वाले आदि। जब हम इनकी भक्ति में लीन होते हैं तो इनके नाम के साथ इनकी जयजयकार करते हैं। कलयुग में सबसे फायदे का धंधा है बाबा बन जाना। जो जीवन में कुछ नहीं कर पाया वह बाबा बन गया। सुदर्शन चेहरा और हृष्टï-पुष्ट शरीर हुआ तो वह इस क्षेत्र में टॉप पर जा सकता है। किस्मत ने साथ दिया तो आसाराम भी बन सकता है। एक बार टॉप पर पहुंचने के बाद मजे ही मजे होंगे। पांचों अंगुली घी और सर कड़ाही में होगा।

आज कल बाबा टाइप के लोगों की जयकार खूब लग रही है। ये बाबा लोग योग और भोग सिखाते-सिखाते कब सेक्स स्कैंडल में फंस जाते हैं पता ही नहीं लगता। आज के समय में हर कोई कुछ न कुछ अलग करना चाह रहा है। हर कोई औरों से अलग दिखने के चक्कर में अपना मूल अस्तित्व ही खोता जा रहा है। कुछ बनने और बनाने के चक्कर में लोग खुद ही घनचक्कर हो जा रहे हैं। आजकल मार्केट में बाबा नाम की खूब चर्चा है। इनकी डिमांड भी मार्केट में खूब है इसलिए ये बाबा मार्केट में बने रहने के लिए अच्छी अंग्रेजी भी सीखते हैं और तकनीकि से भी अपने आप को लैस रखते हैं। कुछ भी पता करने के लिए इनके पास गूगल महाराज हैं जोकि इनको सटीक जानकारी भी तुरंत मुहैया करा देते हैं- जैसे कह रहे हों-कर लो दुनिया मुट्ठी में।

आजकल दुनिया बाबाओं की मुट्ठी में है। कोई दाल, चावल बेच रहा है तो कोई गर्मागर्म
, जड़ीबूटी, कोई योग का ज्ञान दे रहा है तो कोई भोग का। कोई योग-भोग दोनों की घुट्टी पिला रहा है। अभी पिछले दिनों मार्केट में एक बाबा ऐसे आये थे जिनकी खूब डिमांड थी। उनके अंदर अद्भुत क्षमता थी। वे लोगों से यह पूछते थे कि तुमने किस रंग का बेल्ट लगाया है। अगर उसने बताया कि काला तो बाबा तपाक से बोल देते थे कि बेटा इसीलिए तो तुम परेशान हो।

तुरंत बेल्ट बदल लो और मूंग की दाल खानी शुरू   कर दो। इन बाबा को आप चाहे योग गुरु कहें या संयोग गुरु। इनके गुरू होने पर आप कोई संदेह न करना। इनके प्रति आप के भीतर पूरी श्रद्धा होनी चाहिए। इतनी श्रद्धा कि महागुरूका ताज भी इनके मस्तक पर छोटा प्रतीत हो। हां, इतना तो सही है कि ये बाबा लोग कपालभांति, अनुलोम-विलोम, प्रवचन आदि तो बहुत अच्छा कर लेते हैं लेकिन इनके भीतर यह डर हमेशा बना रहता है कि कहीं मेरा असली चेहरा भक्तों के सामने न आ जाये। फिर तो चहुंओर बाबा, बाबा और सिर्फ बाबा की गूंज फैल जायेगी। इसलिए भक्तजनों जोर से बोलो-फुंतरू बाबा की जय।