इनके शक्तिपात मात्र से भक्तों का दु:ख हो जाता है दूर

लखनऊ। कुछ तपोस्थली ऐसी होती है, जिस क्षेत्र में जाते ही तीर्थक्षेत्र का अनुभव आना शुरू हो जाता है। वहां पहुंचते ही मस्तिष्क के सारे द्वंद्व अनायास समाप्त हो जाते हैं। मन शांतचित्त होकर निर्मल हो जाता है। ऐसा ही एक तीर्थक्षेत्र है मुम्बई के दहिसर चेकनाका से लगभग 45 किलोमीटर दूर- गणेशपुरी। यहां महायोगी संत नित्यानंद का समाधि मंदिर है। उनके भक्त उन्हें भगवान नित्यानंद पुकारते हैं। ‘गणेशपुरी के बारे में बाबा कहते हैं कि यह संतों की तपोभूमि है। आज भी गणेशपुरी के करीब मंदाग्नि पर्वत पर कई तपस्वी सूक्ष्म रूप से साधनारत हैं। भगवान नित्यानंद भले ही सशरीर वहां न हों, लेकिनगणेशपुरी को मोक्षपुरी मानने वाले सैंकड़ों भक्त यहां प्रतिदिन आते हैं और एक-दूसरे से मिलने पर अभिवादन स्वरूप कहते हैं ‘जय नित्यानंद।

ध्यान मूलं गुरुर्मूर्तिं, पूजा मूलं गुरुपदम्,
मंत्र मूलं गुर्रुर्वाक्यं, मोक्ष मूलं गुरुकृपा।।

‘गुरु कृपा ही केवलं मंत्र का जाप करने वाले शिष्य कब ओम नित्यानंदाय नम: का जाप करने लगे उन्हें पता ही नहीं लगा। कोई दु:ख, परेशानी, संकट, मुसीबत आए तो सब इन्हीं के नाम का जप करते हैं। मशहूर एक्टर राजकपूर से लेकर राजकुमार राव तक सभी इनके दरबार में मत्था टेका है। विरार मुम्बई से गए पेशे से इंजीनियर प्रवीर वाघमारे के चेहरे के भाव बता रहे हैं कि उनकी अथाह श्रद्धा स्वामी नित्यानंद जी के प्रति है।स्वामी नित्यानंद कहां के हैं, यह बताने वाला कोई शख्स उस प्रांगण में मौजूद नहीं था। बस इतना प्रमाण है कि वह 1935-36 में गणेशपुरी आए थे। गंगू मौसी ने उन्हें पहली बार देखा था और वही उनकी पहली शिष्या थीं। उसके बाद गोपाल मामा और भास्कर हेगड़े उनके सहयोगी, साथी बने। वज्रेश्वरी मंदिर की ओर मुड़ते ही हर गली, नुक्कड़, चौराहे पर स्वामी नित्यानंद की कुछ न कुछ निशानी मौजूद मिलती है।

भगवान नित्यानंद के बारे में जनश्रुति है कि वह दक्षिण भारत के कोजीकोड जिले के तुनेरी गांव के एक गरीब परिवार को शिशु अवस्था में तब मिले, जब एक बहुत बड़ा नाग बरसात में फन उठाकर उन्हें बरसात से बचा रहा था। दम्पति चतुनायर और उन्नी अम्मा नामक दम्पति ने जब यह दृश्य देखा तो अवाक रह गए क्योंकि स्वप्न में भगवान शिव ने उन्हें अगले दिन उसी स्थान पर जाने को कहा था। माता-पिता ने उनका नाम राम रखा, जो बचपन से ही वैरागी था। राम के मुख से जो निकलता, वह सत्य हो जाता। हजारों लोग उसके पास इलाज के लिए आने लगे। कहा जाता है कि जिस रोगी के सिर पर वह बालक हाथ फेर देता वह ठीक हो जाता था।

 

बिना शिक्षण ग्रहण किए एक लंगोट में घूमने वाला राम वेदांत कब धर्मशास्त्र की अकाट्य व्याख्या करने लगा था, यह कोई बता नहीं पा रहा है। बस जितनी मुंह, उतनी बातें। कोई कहता- राम जन्म सिद्ध बालक है। वहां के पुजारी कहते हैं कि एक बार लोगों ने पूछा कि कैसे मान लें कि बड़े साधक हैं, वह मुस्कुराए और भगवान श्रीकृष्ण जैसा विराट रूप मंदिर में ही दिखा बैठे। ताउम्र एक लंगोट में रहने वाले शिव के साधक नित्यानंद स्वामी की गुरु परम्परा में बड़ी ऊंची पदवी है। कहा जाता है कि बाबा के गर्म पानी के कुंड में स्नान कर लेने मात्र से मानव के शरीर से कष्ट दूर हो जाता है। वह भक्तों को केवल राम-राम कहने की दीक्षा देते थे और लोगों को शिव-शिव बुलवाते थे। कुछ शिष्यों को ही वह ओम नम: शिवाय का पंचाक्षर मंत्र दिए थे।

एक दिन गुरु अय्यर उधर से गुजर रहे थे। सबके मुंह से उन्होंने बालक की बढ़ाई सुनी तो जानने की इच्छा भी हुई। सब कुछ जानने के बाद उन्होंने कहा कि तुम सबको नित आनंद देते हो, दुनिया तुम्हें नित्यानंद नाम से पहचानेगी। उसके बाद एक साधारण बालक राम से वह नित्यानंद बन गए और कुछ बरसों तक हिमालय में कई वर्ष तथा काशी में कुछ वर्ष रहने के बाद वह गणेशपुरी आ गए और वहीं के होकर रह गए।प्राचीन शिव मंदिर भीमेश्वर महादेव के समीप ही वह रहते थे। आज भी वहां कई ऐसे बुजुर्ग मिल जाते हैं, जिन्होंने नित्यानंद को हनुमान जी से संवाद करते देखा है। बाबा की स्तुति में आज भी कहा जाता है ‘नैव निंदा प्रशंसाभ्याम् अर्थात निंदा और प्रशंसा से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके साथ वक्त गुजार चुके लोग कहते हैं कि अपने आनंद में मस्त रहते थे और बहुत कम बोलते थे। संतों को पहचानकर उन्हें दृष्टि मात्र से दीक्षा देकर शक्तिपात कर देते थे। आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी को भगवान नित्यानंद ने समाधि मंदिर के पीछे बेंगलोरवाला बिल्डिंग में शरीर छोड़ दिया था। जिसकी घोषणा वह एक पखवाड़ा पहले ही कर चुके थे।

…. तो बाबा भी हुए शिवरूप
पुणे से आए मंजुल खांडेकर कहते हैं कि एक बार बाबा सभी भक्तों के साथ शिव मंदिर में बैठे थे, किसी ने पूछा कि बाबा आप शिवभक्त हैं तो शिव से कभी साक्षात्कार हुआ है। उन्होंने कुछ नहीं कहा और मंद-मंद मुस्कुराने लगे। थोड़ी देर में उन्होंने अपना पैर शिव लिंग से थोड़ा सा छुआ दिया, बस बाबा खुद शिव रूप में दिखने लगे। वहां उपस्थित सभी शिष्य उसी समंय ओम नित्यानंदाय नम: का जाप करने लगे और जयकारे लगाने लगे थे।

बड़े-बड़े नामों की फेहरिस्त है उनकी शिष्य मंडली में
नित्यानंद स्वामी के शिष्यों की टोली देखें तो पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल, पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुगा, मशहूर भजन गायक अनूप जलोटा और कांग्रेसी सांसद सुनील दत्त जैसे उनके शिष्य हुआ करते थे। प्रतिभा इंजीनियरिंग ने आश्रम के ‘प्रसादम भवन का निर्माण कराया है। वहीं मूर्ति और अन्य हॉल वगैरह राजकपूर फाउंडेशन की देन हैं।