इस ‘भीष्मपञ्चक’ व्रत से दुनिया की हर कामना होती है पूरी

संजय पांडेय

गोरखपुर। देवोत्थनी एकादशी का व्रत करने के हजार फल प्राप्त होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं इसी दिन से पांच दिनों के कठोर उपवास का व्रत शुरू होता है। जो पुरुष इस व्रत को करते हैं वह निश्चित तौर पर भगवान श्री हरि विष्णु के लोक को गमन करते हैं और दुनिया में भरपूर यश, लाभ और समृद्धि को जीते हुए स्वर्ग लोग की यात्रा करते हैं। जीवन में कोई भी अभिलाषा इस व्रत को करने वालों की अधूरी नहीं रहती।

देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को इस मंत्र से उठाना चाहिए-

उतिष्ठ-उतिष्ठ गोविन्द, उतिष्ठ गरुड़ध्वज।

उतिष्ठ कमलकांत, त्रैलोक्यं मंगलम कुरु।।

उसके बाद व्रत का संकल्प लेकर पांच दिनी व्रत की शुरुआत की जाती है। 19 नवम्बर 2018 सोमवार से 23 नवम्बर 2018 शुक्रवार तक भीष्म पंचक व्रत है ।

इसकी कथा है कि अग्निदेव कहते हैं- अब मैं सब कुछ देनेवाले व्रतराज ‘भीष्मपञ्चक’ विषय में कहता हूँ। कार्तिक के शुक्ल पक्ष की एकादशी को यह व्रत ग्रहण करें। पांच दिनों तक तीनों समय स्नान करके पाँच तिल और यवों के द्वारा देवता तथा पितरों का तर्पण करें, फिर मौन रहकर भगवान् श्रीहरि का पूजन करें। देवाधिदेव श्रीविष्णु को पंचगव्य और पंचामृत से स्नान करावें और उनके श्री अंगों में चंदन आदि सुंगधित द्रव्यों का आलेपन करके उनके सम्मुख घृतयुक्त गुग्गुल जलावें।

प्रात:काल और रात्रि के समय भगवान् श्रीविष्णु को दीपदान करे और उत्तम भोज्य-पदार्थ का नैवेद्य समर्पित करे। व्रती पुरुष ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादशाक्षर मन्त्र का एक सौ आठ बार (१०८) जप करे। तदनंतर घृतसिक्त तिल और जौ का अंत में ‘स्वाहा’ से संयुक्त ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादशाक्षर मन्त्र से हवन करें। पहले दिन भगवान् के चरणों का कमल के पुष्पों से, दुसरे दिन घुटनों और सक्थिभाग (दोनों ऊराओं) का बिल्वपत्रों से, तीसरे दिन नाभिका भृंगराज से, चौथे दिन बाणपुष्प, बिल्बपत्र और जपापुष्पों द्वारा एवं पाँचवे दिन मालती पुष्पों से सर्वांग का पूजन करे | व्रत करनेवाले को भूमि पर शयन करना चाहिए।

एकादशी को गोमय, द्वादशी को गोमूत्र, त्रयोदशी को दधि, चतुर्दशी को दुग्ध और अंतिम दिन पंचगव्य आहार करे। पौर्णमासी को ‘नक्तव्रत’ करना चाहिये। इस प्रकार व्रत करनेवाला भोग और मोक्ष – दोनों का प्राप्त कर लेता है।

भीष्म पितामह इसी व्रत का अनुष्ठान करके भगवान् श्रीहरि को प्राप्त हुए थे, इसी से यह ‘भीष्मपञ्चक’ के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्माजी ने भी इस व्रत का अनुष्ठान करके श्रीहरि का पूजन किया था, इसलिये यह व्रत पांच उपवास आदि से युक्त है।