एक बार फिर प्रबंधकीय तंत्र के विवाद का जिन्न निकला बोतल से बाहर

  • ठूठीबारी स्थित कालेज के प्रबंधकीय के विवाद ने लिया अहम मोड़
  • सोसायटी रजिस्ट्रार के फ़ैसले से सभी रह गए भौचक, तो क्या सोसायटी रजिस्ट्रार को है कोई विशेषाधिकार ?

नया लुक संवाददाता
महराजगंज। जनपद के सीमाई क्षेत्र क़स्बा ठूठीबारी में स्थित राधाकुमारी इण्टर कालेज के प्रबन्धकीय विवाद ने अब नया मोड़ ले लिया है। जिसमें एक वरिष्ठ सदस्य को अनैतिक अपराध की श्रेणी में आने की वजह से बिना किसी औपचारिकता पूरा कराए ही बर्खास्त करा प्रबन्ध समिति के चुनाव की औपचारिक घोषणा तक करा दी, जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। संस्था की वयोवृद्ध संस्थापिका/अध्यक्ष राधाकुमारी देवी के 15 जुलाई 2014 के निधन के बाद उपजे प्रबंधक विवाद ने अब नया मोड़ ले चुका है। अब यह विवाद सुलझने के बावजूद उलझता जा रहा है। प्रबन्ध समिति में करीब करीब एक ही परिवार व रिश्तेदार दोहरी नागरिकता ले प्रबन्ध समिति में अपना स्थान बनाये हुए है। जबकि मुख्य रजिस्ट्रार उत्तर प्रदेश ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि भारतीय प्रबन्ध समिति में किसी भी विदेशी नागरिक को सदस्य या पदाधिकारी नही बनाया जा सकता है। अब ऐसे में आगे किस प्रकार की कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी यह आने वाले समय पर निर्भर करेगा।

क्या है पूरा मामला….?
महराजगंज जनपद के भारत नेपाल की सीमा पर बसा क़स्बा ठूठीबारी में करीब 50 वर्ष पूर्व राधाकुमारी इण्टर कालेज की स्थापना की गयी थी। जिसकी संस्थापिका/अध्यक्ष राधाकुमारी देवी थी। समिति द्वारा बनाए गए संविधान में राधाकुमारी देवी को आजीवन अध्यक्ष पद दिया गया था। वही उस समय अन्य 8 पदाधिकारी व सदस्य बनाये गए थे। समय के साथ समिति के कार्यकारिणी सदस्यों की संख्या घटती बढ़ती रही। जब तक संस्थापिका/अध्यक्ष राधाकुमारी देवी जीवित नहीं समिति में किसी भी प्रकार का विवाद नही था पर 15 जुलाई 2014 में उनकी मृत्यु के बाद से ही समिति में प्रबन्धक पद को लेकर विवाद पैदा हो गया। जिसमें आपस के रिश्तेदार ही अपनी अपनी दावेदारी पेश करने लगे। यहां तक कि इस विवाद में रजिस्ट्रार ऑफिस गोरखपुर में मुकदमा भी चलन में आ गयी। जिस पर समझौते को लेकर एक पक्ष से दूसरे पक्ष पर दबाव बनाया जाने लगा कि मुकदमा को वापस ले लो। आगे विवाद बढ़ता गया और एक पक्ष को नेपाल में जेल तक करवा दी गयी। एक पक्ष के जेल में बंद रहते ही समिति के चुनाव की घोषणा तक करा दी गयी जिसमे परिणाम टाई हो गया।

विवाद को बढ़ता देख उक्त समिति को स्थगित करते हुए निगरानी के तौर पर रिसीवर नियुक्त कर दिया गया। अब धीरे-धीरे मामला सामान्य होता दिख रहा था कि अचानक ही अगस्त माह के अन्त में जैसे भूचाल सा आ गया हो।

जेल में बन्द एक पक्ष के वरिष्ठ सदस्य को जिला न्यायालय नेपाल के फैसले की कॉपी रजिस्ट्रार कार्यालय में पेश करते हुए अनैतिक अपराध किये जाने के कारण उन्हें सदस्यता से बर्खास्त करा दिया गया। जबकि ऐसी कोई व्यवस्था नही है कि समिति के स्थगन व रिसीवर की नियुक्ति के दौरान प्रबन्ध समिति कोई निर्णय ले सके। प्रबन्ध समिति के संविधान में उल्लेखित है कि किसी भी सदस्य को बनाने व निकाले जाने का अधिकार प्रबन्ध समिति को होगा। वह भी सम्बन्धित सदस्य को 14 दिन पूर्व नोटिस जारी किया जाएगा और 2/3 बहुमत के आधार पर उसे बाहर किया जाएगा। जिसकी लिखित सूचना सबन्धित सोसाइटी रजिस्ट्रार को भेजी जाएगी।

क्या है सवालिया निशान…

कहां कहां फंसता दिख रहा पेंच….?
1. प्रबन्ध समिति के संविधान में उल्लेखित अनैतिक अपराध की श्रेणी में कौन कौन से अपराध है ? जिन्हें अनैतिक अपराध की श्रेणी में लाया जा सकता है?
2. अनैतिक अपराध की श्रेणी में कितने वर्षों के कारावास में यह नियम लागू होगा?
3. प्रबन्ध समिति के स्थगन की अवस्था में ऐसी कौन समिति/संस्था को यह अधिकार है कि वह कार्यकारिणी की बिना 14 दिन पूर्व सूचना के ही बैठक करा सके?
4. जिस कार्यकारिणी ने यह निर्णय लिया क्या उसका यह दायित्व नही बनता कि अनैतिक अपराध करने वाले वरिष्ठ सदस्य को भी इसकी सूचना जारी करे?
5. अगर उपरोक्त प्रक्रिया को पूरा नही किया गया तो क्या सोसायटी रजिस्ट्रार को कोई ऐसा विशेषाधिकार प्राप्त है कि वह अपने विवेकानुसार समिति के सदस्यों को बना सकें या बाहर का रास्ता दिखा सकें?
6. सम्बन्धित सदस्य की पिटीशन पर माननीय हाईकोर्ट महोदय द्वारा जारी दिशानिर्देश के बाद आगे की प्रक्रिया पर लगता प्रश्नचिन्ह …?

तो क्या इस पर होगा विचार…..?
मुख्य रजिस्ट्रार सोसायटी उत्तर प्रदेश द्वारा जारी पत्रांक संख्या 3566 दिनांक 4 मार्च 15 निर्देश/जनसूचना में यह सूचना उपलब्ध करायी गयी है कि मांगी गई जनसूचना के बिन्दू 2 में सो. रजि. अधिनियम 1860 के तहत कोई अलग से ऐसा नियम नही बनाया गया है जिसमें विदेशी नागरिकों को पंजीकृत संस्थाओं में सदस्य/पदाधिकारी रखा जाय या नही बल्कि भारतीय संविधान के अनुसार किसी भी विदेशी नागरिकों को पंजीकृत संस्था में सदस्य या पदाधिकारी नही बनाया जा सकता है। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या दोहरी नागरिकता भी इस श्रेणी में मानी जायेगी ? अगर हां तो अबतक इस संस्था के सदस्यों व पदाधिकारियों के नागरिकता की जांच क्यों नही करायी गई जबकि इस संस्था के करीब आधे सदस्य व पदाधिकारी दोहरी नागरिकता का लाभ ले इस समिति में अपनी सदस्यता बनाए हुए हैै।