ओम पुरी: सुसमन के आक्रोश का अर्धसत्य

  •  सामान्य चेहरा असामान्य अदाकारी

यह आघात ही था। कहां तो अगले हफ्ते ही मुलाक़ात तय थी। श्याम बेनेगल पर लिखी अपनी पुस्तक पर उनसे लम्बी बात करना चाहता था। मन में दबी इच्छा उनसे भूमिका लिखाने की थी। 6 जनवरी दोपहर 12 बजे टीवी खोला तो विज्ञापनों के बीच नीचे कैप्शन आ रहा था- ओम की बुलंद आवाज खामोश। तब भी आशंका नहीं थी, ओम पुरी नहीं रहे। हृदयगति रूकने ने उनका निधन हो गया। मन पूरी तरह से विचलित हो गया। लगा हाथों से फाकते उड़ गए। वैसे तो मेरा उनसे कोई सीधा रिश्ता नहीं था, बस मैं उन्हें जानता था। वे मुझे पहचानते थे। कभी हम प्रतिदिन मिलते थे। कभी पांच-छ: साल में एक मुलाकात होती। मैं उनके व्यक्तित्व से सम्मोहित था। बात 42-43 साल पहले की है। उन दिनों वे नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली (एनएसडी) में थे। उनकी प्रतिभा की चर्चा यहां लखनऊ में थी। 1973 में एनएसडी से ग्रेजुएट होकर निकले लोगों में ओमपुरी व नसीरुद्दीन शाह दो ऐसे एक्टर है, जिनकी बड़ी चर्चा थी। उनके नाटक देखने हम दिल्ली तक जाते थे। एनएसडी के बाद फिल्म अभिनय की ट्रेनिंग लेने दोनों पुणे फिल्म संस्थान गए। नसीरुद्दीन शाह पहले वहां पहुंच गए थे। उनकी सलाह पर अगले साल ओमपुरी गए। मुंबई आकर इन दोनों ने नाट्य संस्था ‘मजमा बनाई और नाटक करना जारी रखा। तब मैं बराबर उनके पूर्वाभ्यास पर जाता था। नाटकों में ओम पुरी का कद बहुत ऊंचा था। आवाज़ में बड़ी गहराई थी और एक अलग तरह का स्पंदन था। जबकि उम्र 24-25 साल की ही थी। उन दिनों अमरीश पुरी विलेन के रूप में स्थापित हो चुके थे। बहुत से लोग उन दोनों को भाई समझते थे, जबकि दोनों में कोई खूऩ का रिश्ता नहीं था। पुणे फिल्म संस्थान से निकलने के बाद ओम को बा. व. कारंत ने बच्चों की फिल्म ‘चोमान डूडी के लिए साइन किया। वहीं विजय तेंदुलकर के नाटक ‘घासीराम कोतवाल पर बनी मराठी फिल्म में अहम भूमिका मिली।’चोमान डूडी में उन्होंने मदारी की भूमिका निभाई थी। वे हीरो बनने की ख्वाहिश लेकर फिल्मों में नहीं आए थे। एनएसडी व एफटीआई में पढ़ते वक़्त उन्हें विश्व सिनेमा देखने को मिला। सत्यजीत राय, मृणाल सेन की फिल्में देखीं। इन फिल्मों के एक्टरों को देखकर लगा था, उन्हें भी अच्छे किरदार मिल सकते हैं। इन्हीं अच्छे किरदारों की तलाश में ही वे फिल्मों से जुड़े थे। उन दिनों हिंदी सिनेमा में भी बदलाव आ रहा था। श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, सईद मिजऱ्ा, केतन मेहता जैसे फिल्मकार अलग तरह की फिल्में बना रहे थे। नसीर को श्याम बेनेगल की दूसरी फिल्म में ही मौका मिल गया था। ओम को भी ‘भूमिकामें कास्ट किया गया। वैसे फिल्म में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण नहीं थी। सईद मिर्जा ने उन्हें ‘अरविंद देसाई की अजीब दास्तान व ‘अल्वर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है के लिए तथा केतन मेहता ने ‘भवनी भवई के लिए साइन किया। वहीं गोंविद निहलानी ने ‘आक्रोश में लिया। मैं मानता हूं ‘आक्रोश ही उनके कैरियर का टर्निंग प्वांइट है क्योंकि ‘आक्रोश के बाद ही सत्यजीत राय ने उन्हें अपनी टेलीफिल्म ‘सद्गति के लिए तथा श्याम बेनेगल ने ‘आरोहण के लिए साइन किया। ‘आरोहण के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का  पुरस्कार मिला। 1983 में उनकी दो महत्वपूर्ण फिल्में आर्इं। गोविंद निहलानी के लिए उन्होंने ‘अद्र्धसत्य किया। फिल्म में उन्होंने एक पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभाई थी। जिसके लिए दूसरा नेशनल अवार्ड मिला। गोविंद निहलानी ने पहले यह रोल अमिताभ बच्चन को ऑफर किया था। वे कमर्शियल फिल्मों से इतर जोखिम लेने को तैयार नहीं थे। बाद में गोविंद निहलानी ने इन दोनों को ‘देव में आमने-सामने किया। उसी साल उनकी दूसरी फिल्म ‘जाने भी दो यारो रिलीज हुई। कुंदन शाह के लिए यह फिल्म रंजीत कपूर ने लिखी थी। शूटिंग के पहले यह पूरी स्क्रिप्ट मैंने ओमपुरी के यहां ही पढ़ी।

एक तरफ आर्ट फिल्में थीं, जो उनका कद बढ़ा रही थीं। दूसरी तरह कमर्शियल फिल्में, यह एक तरह से किसी भी कलाकार की मजबूरी हो सकती है। थियेटर के अभिनेता को अगर सहूलियत की रोटी मंच से मिले तो वह टीवी फिल्मोंं की ओर रुख ही न करे। वैसे ही आर्ट फिल्मों से अगर कलाकार को सम्मानजनक जीवन जीने को मिले, तो वह भूमिकाओं के साथ समझौता न करे। वैसे अगर ओम पुरी का कैरियर देखें उन्होंने कोई 250 फिल्में की हैं। इसमें 100 आर्ट फिल्में हैं, उनमें अगर उनकी भूमिका छोटी भी है, उन्हें पहचानने में परेशानी नहीं होती। श्याम बेनेगल की ‘भूमिका में अगर उन्हें याद नहीं कर पाता, ‘मंडी, कलयुग में पहचानने में परेशानी नहीं हुई। गोविंद निहलानी के साथ ‘आक्रोश करने के बाद ‘विजेता में एक छोटी सी भूमिका की थी। इसके बाद ही उन्हेें हिस्से ‘अद्र्धसत्य, ‘आघात जैसे फिल्में आईं। एक अभिनेता के रूप में मंच पर उन्होंने विभिन्न किरदार किए हैं। वहां गंभीर भूमिकाएं की हैं। कॉमेडी रोल किए हैं। आठवें दशक में उन्होंने फिल्मों में हर तरह के रोल किए हैं। एक तरफ आम-आदमी के दर्द को उकेरा है।

वहीं कामेडी रोल भी किए हैं। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘जाने दो भी यारो है। कमल हासन के साथ ‘चाची-420 में भी उनका ऐसा ही किरदार था। कमर्शियल फिल्मों की शुरूआत मिथुन चक्रवर्ती के साथ ‘डिस्को-डांसर से की । इस फिल्म में उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती के मैनेजर की भूमिका निभाई है। इधर अक्षय कुमार के साथ उनकी जोड़ी बन गई थी। कई फिल्मों में दोनों साथ-साथ थे। सलमान खान के साथ ‘बजरंगी भाई जान में थे। 7 जनवरी को वे सलमान के साथ ‘ट्यूबलाइट की शूटिंग करने वाले थे। आमिर खान व शाहरुख खान के साथ भी फिल्मेंं की हैं। दो दर्जन से अधिक अंग्रेजी फिल्में की हैं। इन फिल्मों ने उनकी पहचान अंतर्रा अभिनेता के रूप में बनाई है। ओम की शुरूआती जिं़दगी बहुत बेतरतीब वाली और अव्यवस्थित थी। पंजाबी मीडियम में पढ़ाई लिखाई की। एनएसडी में जब वे थे, अंग्रेजी में अपने आपको तंग मानते थे। यहां डायरेक्टर इब्राहीम अल्काजी की सलाह काम आई। वे उच्चारण कर रोज़ अंग्रेजी का अखबार पढऩे लगे। अंग्रेजी नाटक पढ़ते। जिससे उनकी तंगहाली दूर हो गई। वैसे अंग्रेजी फिल्में करके भी वे हमेशा देसी बने रहे।

ओम से मेरी पहली मुलाकात 1974 में हुई है। उनके एक सहपाठी बंशी कौल लखनऊ में मेरी नाट्य संस्था ‘दर्पण के लिए नाटक करते थे। हम दिल्ली ओम पुरी के नाटक देखने जाते। रंजीत कपूर के परिवार के साथ ओम पुरी का लगाव था। रंजीत कपूर की छोटी बहन सीमा कपूर से उनका अफेयर था। रंजीत कपूर की मां ‘कमल चटर्जी थीं। उन्हें सब वैसे तो दीदी कहते थे। मैं उन्हें पिसी (बुआ) कहता था। उनकी कई कहानियां अपने मित्रों की पत्रिकाओं में छापी हैं। ओम ने सीमा से अलग होकर 1993 में कलकत्ता की एक बंगाली पत्रकार नंदिता से विवाह किया। दस साल बाद वे नंदिता से अलग हो गए। इधर वे सीमा के नज़दीक आए थे। इस बीच नंदिता ने ओमपुरी पर एक किताब लिखी।

उस किताब में कुछ अनर्गल बातें भी लिखी हैं। ओम के कुछ पुराने रिश्तों का जिक्र किया है। उनके पुराने घाव कुरेदें हैं। ओम इसको लेकर उनसे नाराज़ भी हुए हैं। ओम पुरी का मानना है, अगर नंदिता ईमानदारी से इस किताब पर काम करती। यह चार्ली चैपलिन की बायोग्राफी की तरह लोकप्रिय हो जाती। क्योंकि उनका जीवन भी बहुत कुछ चैपलिन सरीखा था। उनका भी बचपन ओम की तरह अभाव में गुजरा है। उनकी मां पागल हो गई थी। ओम की भी मां पागल हो गई थी। उन्हें भी विस्थापन का जीवन जीना पड़ा है।

ओम ने विपरीत परिस्थितियों में अपने को स्थापित किया। नंदिता चैप्टर के अलावा  उन पर दूसरा आरोप नहीं लगा सकते। ‘आक्रोश उनके मन में बराबर रहा है। यह आक्रोश व्यवस्था को लेकर था। समय-समय पर वे अपना आक्रोश व्यक्त भी करते थे। अन्ना हजारे जब दिल्ली में आंदोलन कर रहे थे। उस मंच से ओम का गुस्सा फूटा था। वैसे कभी-कभी उनका गुस्सा गलत दिशा में चला जाता था। क्योंकि वे अपने मन की बात कहने में माहौल का ध्यान नहीं रखते थे और फिर उन्हें सच्चाई का कठवा घूंट पीकर रह जाना पड़ता था। उनकी मृत्यु के बाद अस्वाभाविक मृत्यु की खबरें आने लगीं।

पहले खबर आई, उनके माथे पर चोट लगी है। उन्हें पूर्व पत्नी नंदिता ही कोपर हास्पिटल लाई, जाएं उन्हें डेड लाया गया, डिक्लेयर किया गया। यह लेख पूरा ही कर रहा था कि स्क्रीन पर अलर्ट पाया। ओम का मोबाइल ‘नंदिता के पास मिला, जबकि उसने पहले झूठ बोला था। मृत्यु के इन रहस्यों से परदा उठना चाहिए, वही ओम पुरी को सच्ची श्रद्घांजलि होगी, क्योंकि इससे ही ओम की आत्मा को शांति मिलेगी।