कैसे होंगे प्रसन्न श्रीहरि विष्णु, जानिए देवोत्थनी एकादशी मुहूर्त और पूजा विधि

नया लुक संवाददाता

लखनऊ। हिंदू मान्यताओं के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु नींद से जागते हैं। देश के कई हिस्सों में लोग इस दिन को छोटी दिवाली के रूप में भी मनाते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना होती है। कहा जाता है कि इस दिन विष्णु की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। अगर सभी जरूरी विधि-विधानों से भगवान को खुश किया जाए तो परिवार में सुख और समृद्धि का वास होता है। घरों में लोग इस दिन उपवास पर रहेंगे। रात में पूजा-अर्चना की जाएगी। महिलाएं चावल को पीसकर अर्पण बना चौक में रंगोली बनाएंगी और उस पर ईख खड़ा किया जाता है। ज्योतिषाचार्य प्रदीप तिवारी कहते हैं कि दिसंबर महीने तक तीन शादी-विवाह के मुहूर्त हैं। गुरु का अस्त पश्चिम दिशा में हो रहा है और इसका उदय दोबारा सात दिसंबर शुक्रवार को पूरब दिशा में 10:25 मिनट पर होगा। इसके बाद शादी-विवाह का मुहूर्त प्रारंभ होगा।

देवोत्थान एकादशी तिथि –  19 नवंबर 2018

पारण का समय – 06:52 से 08:58 बजे तक (20 नवंबर 2018)

एकादशी तिथि आरंभ – 13:34 बजे से (18 नवंबर 2018)

एकादशी तिथि समाप्त – 14:30 बजे (19 नवंबर 2018)

आगामी एकादशी व्रत

03 दिसंबर : उत्पन्ना एकादशी

18/19 दिसंबर : मोक्षदा एकादशी

शास्त्रों के अनुसार एकादशी माह में दो बार आती है, एक कृष्ण और दूसरी शुक्ल पक्ष में। पंचांग के अनुसार प्रत्येक 11वीं तिथि को एकादशी व्रत का विधान है। हिन्दू धर्म के अनुसार एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से ही कुछ अनिवार्य नियमों का पालन करके अगले दिन (द्वादशी) प्रात:काल सूर्योदय के पश्चात ही एकादशी व्रत का पारण करके भोजन ग्रहण करना चाहिए। यह व्रत सर्व-सुख और मोक्ष देने वाला माना गया है।

क्या है व्रत की पूजा विधि

देव उठनी एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर सर्वप्रथम नित्यक्रिया से निपट कर स्नान करें। यदि स्नान किसी पवित्र धार्मिक तीर्थ स्थल, नदी, सरोवर अथवा कुंए पर किया जाए तो बहुत बेहतर होता है। स्नानादि के पश्चात निर्जला व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिये। इस दिन संध्या काल में शालिग्राम रूप में भगवान श्री हरि का पूजन किया जाता है। तुलसी विवाह भी इस दिन संपन्न करवाया जाता है। रात्रि में प्रभु का जागरण किया जाता है। व्रत का पारण द्वादशी के दिन प्रात: काल ब्राह्मण को भोजन करवायें व दान-दक्षिणा देकर विदा करने के बाद किया जाता है। शास्त्रों में व्रत का पारण तुलसी के पत्ते से भी करने का विधान है।

इस दिन गन्ने का मंडप बनाएं, बीच में चौक बनाया जाता है। चौक के मध्य में चाहें तो भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति रख सकते हैं।  चौक के साथ ही भगवान के चरण चिन्ह बनाये जाते हैं, जिसको बाद में ढक दिया जाता है। श्री हरि विष्णु को गन्ना, सिंघाडा तथा फल-मिठाई समर्पित किया जाता है। घी का एक दीपक जलाएं जो रात भर जलता रहे। भोर में भगवान के चरणों की विधिवत पूजा की जाती है। फिर चरणों को स्पर्श करके उनको जगाया जाता है। इस समय शंख-घंटा-और कीर्तन की आवाज़ की जाती है।

बिना मुहूर्त के भी आज होती हैं शादियां

मान्यता है कि बिना मुहुर्त देखे भी आज के दिन विवाह किया जा सकता है। आज के दिन हुई शादियां लम्बी चलती हैं। आचार्य प्रदीप तिवारी बताते हैं कि इस साल पांच अप्रैल तक शहनाइयों की आवाज कम सुनने को मिलेगी। पांच अप्रैल तक कुल 25 मुहूर्त ही हैं। गुरु के पश्चिम में अस्त होने से 19 नवंबर देव जागरण के अलावा दस दिसंबर तक विवाह मुहूर्त नहीं हैं। गुरु उदय सात दिसंबर को पूर्व दिशा में हो जाएगा। सात दिसंबर से दस दिसंबर तक गुरु उदय में बाल्यत्व दोष बना रहेगा। मार्गशीर्ष मास में कुल दो मुहूर्त, माघ मास में 15 मुहूर्त तथा फाल्गुन मास में 11 मुहूर्त शेष बचे हैं।

उपवास में इन बातों का जरूर रखें ख्याल

निर्जल या केवल जलीय पदार्थों पर उपवास रखना चाहिए। अगर रोगी, वृद्ध, बालक या व्यस्त व्यक्ति हैं तो केवल एक बेला का उपवास रखना चाहिए और फलाहार करना चाहिए। अगर यह भी संभव न हो तो इस दिन चावल और नमक नहीं खाना चाहिए। ख्याल रखें इस दिन घर में  तामसिक आहार (प्याज़,लहसुन,मांस,मदिरा,बासी भोजन ) बिलकुल न पके। इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करना चाहिए।