‘गुरु कृपा ही केवलमं’ जप लेने से मिल सकती है भव से मुक्ति

  • अकाल मृत्यु के मुंह से शिष्य को खींच सकता है केवल गुरु
  • …लेकिन शिष्यता के सात बिंदु में से एक धारण करना अनिवार्य

स्वामी अच्युतानंद महराज

लखनऊ। आपने आदि गुरु शिव की पूजा के लिए उज्जैन जाने वाले भक्तों के मुख से यह जरूर सुना होगा- ‘अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चंडाल का, काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का।’ इन लाइनों का शाब्दिक अर्थ तो बुरे कर्म करने वालों को अकाल मृत्यु हो जाती है। प्रथम दृष्टया मृत्युलोक में रहने वाले सभी प्राणी को यही बात समझ में आती है, लेकिन आप शायद यह नहीं जानते होंगे कि चांडाल कर्म करने वालों में गुरु पूजन, हृदय में गुरु स्थापन न करने वाला व्यक्ति भी शामिल होता है।

आपको याद होगा कि गांवों में लोग कन्या दान के पहले कहा करते थे कि गुरुमुख हो जाइये नहीं तो कन्यादान का फल नहीं मिलेगा। यानी किसी बड़े दान का फल भी तब मिलेगा, जब आपके श्रीमुख में, आपके हृदय में गुरु की स्थापना हो जाए। गुरु का शाब्दिक अर्थ भी होता है- भारी। यानी गुरु की हृदय में स्थापना के साथ ही आपके व्यक्तित्व में गुरुता आने लगती है। बुरे कर्म स्वतः दूर भागने लगते हैं और सद्कर्मों में आपकी संलिप्तता स्वतः बढ़ती जाती है।

गुरु गोरखनाथः गुरु चरणकमलेभ्यो नमः

गुरु की महिमा वेद, शास्त्र, उपनिषद सभी बखानते हैं। लेकिन मैं आपको कुछ लाइनें यहां बताना चाहता हूं।

अपने हृदय में ‘गुरु’ स्थापन करना समस्त देवताओं को स्थापन करने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।  -ऋग्वेद

गुरु-पूजा के द्वारा ही ‘इष्ट’ के दर्शन संभव हैं। -गोरखनाथ

जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ की अपेक्षा ‘गुरु-पूजन’ ही हैं।  -गुरौपनिषद

चारों पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – की प्राप्ति केवल गुरु-पूजन के द्वारा संभव हैं। -याज्ञवल्क्य

जीवन की पवित्रता, दिव्यता, तेजस्विता एवं परम शांति केवल गुरु-पूजन के द्वारा ही संभव हैं। -ऋषि विश्वामित्र

‘गुरु-पूजा’ से बढ़कर और कोई विधि या सार नहीं हैं। -शंकराचार्य

समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों का आधार मात्र गुरु-पूजन हैं। -आरण्यक

जो प्रातःकाल गुरु-पूजन नहीं करता, उसका सारा समय, साधना एवं तपस्या व्यर्थ हो जाती हैं। -रामकृष्ण परमहंस

आदि गुरु का शिवावतारः ध्यान मूलं गुर्रु मूर्ति, पूजा मूलं गुरु पदं

अब मैं कुछ शब्दों में यह कहूं कि संसार का सार ‘मनुष्य जीवन’ हैं, और मनुष्य जीवन का सार गुरु-धारण, गुरु स्मरण एवं गुरु-पूजन है तो आप शायद मेरी इन बातों से सहमत भी होंगे। शायद आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मनुष्य योनि में जन्में सिरडी के साईं बाबा सबकी मुरादें कैसे पूरी करते हैं। तो जवाब है- जहां गुरुत्व है, वहीं शिवत्व है। अब आप साईं बाबा को गुरु रूप में पूजिए, आदि गुरु शंकर आपको फल देंगे। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि जीवन में गुरु का बड़ा ही महत्व है।

आपको छोटी-छोटी अच्छी दिशा दिखाने वाला गुरु आपको जीवन के सबसे बड़े पद तक कब पहुंचा देता है, यह तब पता लगता है जब गुरु महिमा के सत्संग में आप पहुंच जाते हैं। गुरु के साथ ही आपको शिष्य की योग्यता भी जाननी बहुत जरूरी है। यहां आपको शिष्यता के सात सूत्र बता रहे हैं। जीवन में उसे उतारिए और भव सागर पार करने के लिए यही नौका बन जाएगी।

भगवत्पाद शंकराचार्य ने ‘शिष्य’ और सही मायने में कसौटी पर खरे उतरने वाले शिष्य के सात सूत्र बताए हैं, जो निम्न हैं। आप स्वयं ही मनन कर निर्णय करें, कि आपके जीवन में ये कितने संग्रहित है-

अन्तेश्रियै वः कर्तव्यं श्रियै नः सेव्यं सतै दिवौं च

ज्ञानामृते वै श्रियं हितं वै हृदं ,गुरुर्वे गतिःइष्टौ गुरुर्वे गुरु ।

अब इसके एक-एक शब्द का बखान करता हूं, ध्यान से पढ़िए और जान जाइए।

अन्तेश्रियै वः – जो आत्मा से, प्राणों से, हृदय से अपने गुरुदेव से जुड़ा हो, जो गुरु से अलग होने की कल्पना करते ही भाव विह्वल हो जाता हो।

कर्तव्यं श्रियै नः – जो अपनी मर्यादा जानता हो, गुरु के सामने अभद्रता, अशिष्टता का प्रदर्शन न कर पूर्ण विनीत नम्र पूर्ण आदर्श रूप में उपस्थित होता हो।

सेव्यं सतै दिवौं च – जिसने गुरु सेवा को ही अपने जीवन का आदर्श मान लिया हो और प्राण प्रण से गुरु की तन-मन-धन से सेवा करना ही जीवन का उद्देश्य रखता हो।

ज्ञानामृते वै श्रियं – जो ज्ञान रुपी अमृत का नित्य पान करता रहता हैं और अपने गुरु से निरंतर ज्ञान प्राप्त करता ही रहता हैं।

हितं वै हृदं – जो साधनाओं को सिद्ध कर लोगों का हित करता हो और गुरु से निरंतर ज्ञान प्राप्त करता ही रहता हैं।

गुरुर्वे गतिः – गुरु ही जिसकी गति, मति हो, गुरुदेव जो आज्ञा दे, बिना विचार किए उसका पालन करना ही अपना कर्तव्य समझता हो।

इष्टौ गुरुर्वे गुरु: – जिस शिष्य का इष्ट ही गुरु हो, जो अपना सर्वस्व गुरु को ही समझता हो।

यदि आप इस संसार रूपी सागर को पार करना चाहते हैं तो गुरुभक्ति में खुद को रमाइए। गुरु कृपा नहीं है तो जल्द ही अपने लिए गुरु खोजिए, योग्य गुरु मिलते ही आपके अच्छे दिन शुरू हो जाएंगे। अब मेरे साथ एक बार बोलिए-

गुरु ब्रम्हा गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः

गुरु साक्षात् परम ब्रह्म, तस्म्यै श्री गुरवे नमः।।