चंद्रिका देवी मंदिरः तेरे जैसा धाम कहां

  • सज गया मां का दरबार
  • दूर-दूर से जुटने लगे श्रद्धालु

हिमांशु सिंह चौहान

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित पौराणिक मां चंद्रिका देवी की महिमा किससे छिपी है। नवरात्रों में यहां श्रद्घालुओं की भीड अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा होती है। श्रद्घालुओं का मानना है कि यहां जो भी मुराद मां से मांगी जाती है, वह अवश्य पूरी होती है। माना जाता है कि मां के मंदिर में उस भक्त की मुराद सबसे पहले पूरी की जाती है जो यहां सुबह सबसे पहले अपनी हाजिरी लगा देता है। इसलिए यहां प्रतिदिन भोरकाल से ही भक्तों का तांता लगना शुरु हो जाता है, जो रात आरती के बाद तक अनवरत जारी रहता है।

माता का यह मंदिर नेशनल हाईवे 24 पर स्थित बख्शी का तालाब कस्बे से 11 किमी दूर कठवारा गांव में स्थित है। नवरात्रि में इस मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है। ऊंचे चबूतरे पर एक मठ बनवाकर पूजा के साथ देवी भक्तों के लिए प्रत्येक मास की अमावस्या को और प्रत्येक नवरात्रि में यहां भव्य मेला लम्बे अरसे से लगता चला आ रहा है, जिसकी परम्परा आज भी जारी है।

यहाँ पर श्रद्धालु दूर-दूर से आते है, नवरात्रि शुरू होने से लेकर दशमी तक यहां पर श्रधालुओं का तांता लगा रहता है। मेला समिति के अनुसार नवरात्रि के समय श्रधालुओं की संख्या हर दिन एक लाख से ऊपर रहती है। अष्टमी और नवमी को यह संख्या डेढ़ से दो लाख तक पहुंच जाती है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए माँ के दरबार में आकर मन्नत माँगते हैं चुनरी की गाँठ बाँधते हैं तथा मनोकामना पूरी होने पर माँ को चुनरी प्रसाद चढ़ाकर मंदिर परिसर में घण्टा भी बाँधते हैं। माँ के धाम की एक खास बात यह भी है कि यहाँ पर किसी प्रकार की बलि इत्यादि नही दी जाती है। मन्दिर में मेवे का ही भोग लगता है। मन्दिर में मुंडन आदि शुभ कार्य करवाए जाते हैं।

पौराणिक काल के इस मंदिर में प्राचीन हिन्दू संस्कृति के सामाजिक सद्भाव और सामाजिक समानता की तस्वीर आज भी नजर आती है। यहां महीसागर संगम तीर्थ के पुरोहित और यज्ञशाला के आचार्य ब्राह्मण हैं। माँ के मंदिर में पूजा पिछड़ा वर्ग के मालियों द्वारा तथा पछुआ देव के स्थान भैरवनाथ पर आराधना अनुसूचित जाति के पासियों द्वारा कराई जाती है। ऐसा उदाहरण दूसरी जगह तथा अन्य किसी मंदिर में  मिलना मुश्किल है।

पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व: मेले आदि की सारी व्यवस्था संस्थापक स्व. ठाकुर बेनी सिंह चौहान के वंशज अखिलेश सिंह संभालते हैं। वे मां चन्द्रिका देवी मेला विकास समिति के अध्यक्ष के एवं कठवारा गांव के ग्राम प्रधान भी हैं । मां का पौराणिक महत्व बताते हुए कहते है कि यहां महीसागर संगम तीर्थ यानी सुधन्वाकुंड के तट पर एक पुरातन नीम के वृक्ष के कोट में नौ दुर्गाओं के साथ उनकी वेदियां चिरकाल से अभी तक सुरक्षित रखी हुई हैं। वह बताते हैं कि यहां विराजमान पिंडी रूपी मां चन्द्रिका की प्रतिमा नारद जी द्वारा स्थापित की गई थी।

मंदिर के पुजारी बताते हैं कि मां चंद्रिका देवी मंदिर का महात्म स्कन्द पुराण में समझाया गया है। मंदिर की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि द्वापर युग में घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने मां चन्द्रिका देवी धाम स्थित महीसागर संगम में तप किया था। पंडित जी यहां की एक खास बताते हैं, वह यह कि यहां पर गोमती नदी उत्तरायण में बहती है अर्थात मन्दिर के तीन तरफ उत्तर पश्चिम और दक्षिण में गोमती नदी की पावन जलधारा प्रवाहित होती है। पूर्व की तरफ महीसागर संगम तीर्थ है। यहां वर्षा ऋतु में गोमती का जल स्तर बढऩे से महीसागर संगम तीर्थ में नैमिषारण्य के पावन चक्रतीर्थ का पवित्र जल नदी की जल धारा के साथ पूर्व दिशा में प्रवाहित होता हुआ दक्षिण दिशा में पुन: जाकर उस स्थान पर मिल जाता है जहां पर नदी की धारा का प्रवाह उत्तर दिशा की ओर है। यहां आने वाले श्रद्घालुओं और गांव वालों का मानना है कि महीसागर संगम तीर्थ में कभी भी जल का अभाव नहीं होता और इसका सीधा संबंध पाताल से है। आज भी लाखोंं भक्त यहां महाभारत काल के महान योद्घा बर्बरीक की पूजा अर्चना करते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दक्ष प्रजापति के श्राप से प्रभावित चन्द्रमा को भी श्रापमुक्ति के लिए इसी महीसागर संगम तीर्थ के जल में स्नान करने के लिए चन्द्रिका देवी धाम में आना पड़ा था। पुराणों में इस बात का भी जिक्र है कि त्रेता युग में लक्ष्मणपुरी यानी आज का लखनऊ के अधिपति उर्मिला पुत्र चन्द्रकेतु को चन्द्रिका देवी धाम के तत्कालीन इस वन क्षेत्र में अमावस्या की अर्धरात्रि में जब भय व्याप्त होने लगा तो उन्होंने अपनी माता द्वारा बताई गई नवदुर्गाओं का स्मरण किया।  उनकी आराधना की। तब चन्द्रिका देवी की चन्द्रिका के आभास से उनका सारा भय दूर हो गया था।

मंदिर के पुराजी बताते हैं कि महाभारतकाल में पांचों पाण्डु पुत्र द्रोपदी के साथ अपने वनवास के समय इस तीर्थ पर आए थे। महाराजा युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ कराया जिसका घोड़ा चन्द्रिका देवी धाम के निकट राज्य के तत्कालीन राजा हंसध्वज ने रोका था। हंसध्वज और युधिष्ठिर की सेना के बीच युद्ध हुआ  जिसमें उनका पुत्र सुरथ सम्मिलित हुआ। किन्तु, दूसरा पुत्र सुधन्वा चन्द्रिका देवी धाम में नवदुर्गाओं की आराधना में लीन था और युद्ध में अनुपस्थिति होने के कारण इसी महीसागर क्षेत्र में उसे खौलते तेल के कड़ाहे में डालकर उसकी परीक्षा ली गई। वह बताते हैं कि मां चंद्रिका देवी की कृपा के चलते उसके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तभी से इस तीर्थ को सुधन्वा कुंड भी कहा जाने लगा। महाराजा युधिष्ठिर की सेना अर्थात कटक ने यहां वास किया तो यह गांव कटकवासा कहलाया। आज इसी को कठवारा कहा जाता है।

नवदुर्गाओं की सिद्धपीठ चन्द्रिका देवी धाम में एक विशाल हवन कुण्ड, यज्ञशाला, चन्द्रिका देवी का दरबार, बर्बरीक द्वार, सुधन्वा कुण्ड, महीसागर संगम तीर्थ के घाट आदि आज भी दर्शनीय हैं। मंदिर के ऐतिहासिक महत्व की चर्चा करें तो हिन्दी साहित्य के उपन्यास सम्राट अमृतलाल नागर ने अपने उपन्यास करवट में चन्द्रिका देवी की महिमा का बखान किया। इस उपन्यास का नायक बंशीधर टंडन चौक इलाके से देवी को प्रसन्न करने के लिए हर अमावस्या को चन्द्रिका देवी के दर्शन करने आता था। आज भी अमावस्या के दिन और उसकी पूर्व संध्या को मां चन्द्रिका देवी के दर्शनार्थियों में सर्वाधिक संख्या लखनऊ के चौक क्षेत्र के देवीभक्तों की होती है।

आस्था का केन्द्र ही नहीं पर्यटन की भी असीम संभावनाएं  बुलंदशहर से परिवार सहित मां के दर्शन करने आए विनोद कहते हैं कि पांच साल पहले नौकरी की तलाश में लखनऊ अपने एक मित्र के पास आया था । उस समय आर्थिक और मानसिक दोनों तरह से बहुत परेशान था। कहते हैं कि मेरा दोस्त ही मुझे यहां लेकर आया था। उसी समय मैने मां से अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए मन्नत मांगी थी। विनोद बताते हैं कि मां के दर्शन करने के बाद मेरे जीवन में चमत्कारिक रूप से परिवर्तन हुआ। मेरी नौकरी बुलंदशहर में ही मेरे घर के पास एक इंटरनेशनल कंपनी में लग गई । विनोद कहते हैं कि तब से जब भी वे लखनऊ आते हैं, मां के दर्शन करना नहीं भूलते हैं। इसी तरह  मंदिर में दर्शन करने आई पुष्पा, माधुरी कहती है कि हम लोग हर सप्ताह सोमवार या मंगलवार को मां के दर्शन क रने जरूर आते हैं। माधुरी कहती हैं कि तीन साल पहले मां चंद्रिका से पुत्र प्राप्ति की अर्जी लगाई थी। माधुरी एक अक्टूबर से शुरु हो रहे नवरात्रि में यहां आकर अपने बेटे का मुंडन कराएंगी।

मां चंद्रिका देवी मंदिर सिर्फ लखनऊ वासियों या इसके आस पास के जिलों के श्रद्घालुओं की आस्था का केन्द्र ही नहीं है बल्कि यहां राज्य और देश के अन्य राज्यों से भी श्रद्घालु आते हैं। मंदिर समिति के लोगों का कहना है कि अगर प्रशासन और सरकार मंदिर को पर्यटन के रूप में विकसित और प्रचारित करे तो यह देश के प्रमुख आध्यात्मिक दर्शनीय स्थलों में शामिल हो सकता है। प्रशासन की उदासीनता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां आने के लिए परिवहन विभाग की ओर से किसी भी बस का प्रबंध नहीं हैं। लोग ज्यादातर अपने साधनों का प्रयोग करते हैं या फिर वाहन को किराए पर लेकर यहां आते हैं। मंदिर समिति के जसवीर सिंह बताते हैं कि पूर्व में श्रद्घालुओं के लिए नगर निगम की पहल पर बस सेवा शुरु हुई थी। लेकिन, एक वर्ष पूर्व उसे भी बंद कर दिया गया । वह बताते हैं कि मन्दिर परिसर के पीछे छह कमरों का निर्माण करवाया जा चुका है, जिसका लक्ष्य 20 कमरों का है इसके साथ ही लगभग 40 लाख रूपये की लागत से टीन शेड का निर्माण कार्य जारी है जो कि श्रधालुओं द्वारा दिए गए दान से करवाया जा रहा है। इस टिन शेड के निर्माण के बाद श्रधालुओं को धूप और बरसात दोनों से राहत मिलेगी।

जसवीर कहते हैं कि हनुमान मन्दिर के सामने पंचायत की तरफ से 2008 में दुकानों का निर्माण करवाया गया था जो की स्वयं सहायता समूहों को आवंटन करनी थी पर प्रशाशन की उदासीनता एवं लापरवाही के चलते अभी एक भी दुकान का आवंटन नही हुआ है, नाही किसी और को इसका आवंटन किया जा रहा है। स्थानीय लोगों एवम श्रधालुओं का कहना है कि आस्था और विश्वास से जुड़े इस पौराणिक महीसागर संगम तीर्थ को राजस्व विभाग के अभिलेखों में पांच एकड़ क्षेत्र वाले सामान्य ताल के नाम से अंकित किया गया है। स्थानीय लोगों एवं श्रद्धालुओं का कहना है कि इस पौराणिक तीर्थ को सरकार अपने अभिलेखों में दर्ज कराए। ताकि इसकी जानकारी लोगों को मिल सके।