चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठते सवाल :Pk पचौरी

नई दिल्ली। भाजपा के प्रतिनिधि मंडल ने गुरुवार को चुनाव आयोग जाकर पश्चिम बंगाल के ताजा हालातों का हवाला देते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा से मांग की कि राज्य में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए और ठोस कदम उठाए जाएं। प्रतिनिधि मंडल में शामिल तीन केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, मुख़्तार अब्बास नकवी तथा विजय गोयल ने बाद में पत्रकारों से कहा कि भाजपा चुनाव आयोग की इतनी कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है।

राज्य में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हथकंडों को रोकने के लिए और सख्त कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। जानकारी हो कि मंगलवार को पश्चिम बंगाल में आखिरी चरण से पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रॉड शो में हुई हिंसा व प्रख्यात समाज सुधारक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़े जाने की घटना के बाद चुनाव आयोग ने वहाँ सख्त कदम उठाए हैं। आयोग ने हस्तक्षेप करते हुए चुनाव प्रचार में तय अवधि से चौबीस घंटे की कटौती करने के साथ-साथ राज्य के प्रधान सचिव गृह और एडीजी-सीआईडी को तत्काल प्रभाव से हटा दिया था। पर भाजपा इतनी कार्रवाई को नाकाफी बता रही है।

पूरे मामले में पार्टियाँ चुनाव आयोग पर ही सवालिया निशान उठा रही हैं। कांग्रेस, भाजपा और तृणमूल कांग्रेस ने अपने नजरिए से चुनाव आयोग को घेर है। कांग्रेस ने तो यहाँ तक कह दिया कि 23 मई के बाद उसकी सरकार बनेगी और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर फिर से विचार किया जाएगा। वहीँ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सवाल उठाया कि आखिर पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग का दोहरा मापदंड क्यों? बची-कुची कसर ममता बनर्जी ने पूरी कर दी। ममता कहती हैं कि मोदी-शाह चुनाव आयोग को धमका कर मनमाफिक निर्णय करवा रहे हैं। इसके अलावा कई और क्षेत्रीय दलों ने भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।

तभी विचारणीय है क्या चुनाव आयोग की साख में वाकई बट्टा लग गया है? अगर नहीं, तो क्या ये राजनीतिक दल केवल अपनी मंशा साधने भर के लिए चुनाव आयोग की छाती पर दाल दल रहे हैं? लेकिन, जिस तरह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सबूतों व साक्ष्यों का हवाला दिया। उससे क्या ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’ वाली कहावत चरितार्थ नहीं हो गई है? तब सवाल उठता है कि आखिर समय रहते आयोग ने पश्चिम बंगाल में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए? रिपोर्ट बताती है कि वहां आशंकाओं पर गौर किया जाता तो हिंसा और आगजनी जैसी घटनाएं न होती।

पश्चिम बंगाल में लंबे अरसे से हिंसा एकमात्र चुनावी हथकंडे को धार देती रही है। पहले वामपंथियों के शासन को ममता दीदी ने सड़क पर उतर कर उन्हें मुख्य धारा से बाहर कर दिया था? आज वामपंथी कहीं नजर ही नहीं आ रहे हैं। ऐसा लगता है ममता के अराजकतापूर्ण शासन को उखाड़ फेंकने का वही काम अब भाजपा करती नजर आ रही है। हिंसक गतिविधियों में भाजपा के 60 से भी ज्यादा कार्यकर्ता काल-कवलित हो गए। ममता अपनी जमीन बचाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद का सूत्र अख्तियार कर रही हैं। उनकी कार्यशैली से लेकर जुबान और शारीरिक भाषा बताती है कि वे बुरी तरह घबराई हुई हैं।