जन्म कुण्डली के अष्टम भाव के महत्व, प्रभाव एवम उपयोग को

किसी भी जन्म कुंडली में अष्टम भाव से व्यक्ति की आयु व मृत्यु के स्वरुप का विचार किया जाता है| इस दृष्टि से अष्टम भाव का महत्व किसी भी प्रकार से कम नही है| क्योंकि यदि मनुष्य दीर्घजीवी ही नही तो वह जीवन के समस्त विषयों का आनंद कैसे उठा सकता है?

अष्टम भाव त्रिक(6, 8, 12) भावों में सर्वाधिक अशुभ स्थान माना गया है| वैसे भी षष्ठ भाव(रोग, शत्रु, ऋण का भाव) से तृतीय(भ्राता) होने के कारण इसे अशुभता में षष्ठ भाव का भ्राता(भाई) ही समझिये|

अष्टम भाव आयु भाव है इस भाव को त्रिक भाव, पणफर भाव और बाधक भाव के नाम से जाना जाता है | पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि आयु का निर्धारण करने के लिए इस भाव को विशेष महत्ता दी जाती है | इस भाव से जिन विषयों का विचार किया जाता है | उन विषयों में व्यक्ति को मिलने वाला अपमान, पदच्युति, शोक, ऋण, मृत्यु इसके कारण है | इस भाव से व्यक्ति के जीवन में आने वाली रुकावटें देखी जाती है | आयु भाव होने के कारण इस भाव से व्यक्ति के दीर्घायु और अल्पायु का विचार किया जाता है।

अष्टम भाव आयु को दर्शाता है यह भाव क्रिया भाव भी है | इसे रंध्र अर्थात छिद्र भी कहते हैं क्योंकि यहाँ जो भी कुछ प्रवेश करता है वह रहस्यमय हो जाता है | जो वस्तु रहस्यमय होती है वह परेशानी व चिंता का कारण स्वत: ही बन जाती है | बली अष्टम भाव लम्बी आयु को दर्शाता है। साधारणत: अष्टम भाव में कोई ग्रह नही हो तो अच्छा रहता है | यदि कोई भी ग्रह आठवें भाव में बैठ जाये चाहे वह शुभ हो या अशुभ कुछ न कुछ बुरे फल तो अवश्य ही देता है।

अष्टम भाव तो अशुभ है ही, कोई भी ग्रह इसका स्वामी होने पर अशुभ भावेश हो जाता है| नवम भाव(भाग्य, धर्म व यश) से द्वादश(हानि) होने के कारण अष्टम भाव मृत्यु या निधन भाव माना गया है| क्योंकि भाग्य, धर्म व प्रतिष्ठा का पतन हो जाने से मनुष्य का नाश हो जाता है| फारसी में अष्टम भाव को मौतखाने, उमरखाने व हस्तमखाने कहते हैं| अष्टम भाव से आयु की अंतिम सीमा, मृत्यु का स्वरूप, मृत्युतुल्य कष्ट, आदि का विचार किया जाता है|

इसके अतिरिक्त यह भाव वसीयत से लाभ, पुरातत्व, अपयश, गंभीर व दीर्घकालीन रोग, चिंता, संकट, दुर्गति, अविष्कार, स्त्री का मांगल्य(सौभाग्य), स्त्री का धन व दहेज़, गुप्त विज्ञान व पारलौकिक ज्ञान, ख़ोज, किसी विषय में अनुसंधान, समुद्री यात्राएं, गूढ़ विज्ञान, तंत्र-मंत्र-ज्योतिष व कुण्डलिनी जागरण आदि विषयों से भी जुड़ा हुआ है|

“भावत भावम सिद्धांत” के अनुसार किसी भी भाव का स्वामी यदि अपने भाव से अष्टम स्थान में हो या किसी भाव में उस भाव से अष्टम स्थान का स्वामी आकर बैठ जाए अथवा कोई भी भावेश अष्टम स्थान में स्थित हो तो उस भाव के फल का नाश हो जाता है| मनुष्य को जीवन में पीड़ित करने वाले स्थाई प्रकृति के घातक रोग भी अष्टम भाव से देखे जाते हैं| आकस्मिक घटने वाली गंभीर दुर्घटनाओं का विचार भी अष्टम भाव से किया जाता है|अष्टमेश जिस भाव में स्थित होता है उस भाव के फल अचानक दिखाई देते हैं और वह अचानक से मिलने वाले फलों को प्रदान करता है।

व्यक्ति अपने जीवन में जो उपहार देता है, उन सभी की व्याख्या यह भाव करता है | इस भाव से व्यक्ति के द्वारा कमाई, गुप्त धन-सम्पत्ति, विदेश यात्रा, रहस्यवाद, स्त्रियों के लिए मांगल्यस्थान, दुर्घटनाएं, देरी खिन्नता, निराशा, हानि, रुकावटें, तीव्र, मानसिक चिन्ता, दुष्टता, गूढ विज्ञान, गुप्त सम्बन्ध, रहस्य का भाव देखा जा सकता है।

अष्टम भाव तथा अष्टमेश की कल्पना ही मनुष्य के मन में अशुभता का भाव उत्पन्न कर देती है| परंतु ऐसी बात नहीं है अष्टम भाव के कुछ विशिष्ट लाभ भी हैं| किसी भी स्त्री की कुंडली में अष्टम भाव का सर्वाधिक महत्व होता है| क्योंकि यह भाव उस नारी को विवाहोपरांत प्राप्त होने वाले सुखों का सूचक है| पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस भाव से एक विवाहित स्त्री के मांगल्य(सौभाग्य) अर्थात उसके पति की आयु कितनी होगी तथा वैवाहिक जीवन की अवधि कितनी लंबी होगी, इसका विचार किया जाता है|

यही कारण है कि इस भाव को मांगल्य स्थान भी कहा जाता है| इसके अलावा अध्यात्मिक क्षेत्र में सक्रिय व्यक्तियों के लिए भी अष्टम भाव एक वरदान से कम नहीं है| क्योंकि यह भाव गूढ़ व परालौकिक विज्ञान, तंत्र-मंत्र-योग आदि विद्याओं से भी संबंधित है इसलिए बलवान अष्टम भाव व अष्टमेश की कृपा बिना कोई भी व्यक्ति इन क्षेत्रों में महारत हासिल नहीं कर सकता|

यही कारण है कि जो लोग सच्चे अर्थों में अध्यात्मिक व संत प्रवृति के हैं उनकी पत्रिका में अष्टम भाव, अष्टमेश तथा शनि काफी बली स्थिति में होते हैं| सशक्त शुक्र अष्टम भाव में भी अच्छा फल प्रदान करता है। शुक्र अकेला अथवा शुभ ग्रहों के साथ शुभ योग बनाता है। स्त्री जातक में शुक्र की अष्टम स्थिति गर्भपात को सूचक। आठवें भाव का शुक्र जातक को विदेश यात्रायें जरूर करवाता है,और अक्सर पहले से माता या पिता के द्वारा सम्पन्न किये गये जीवन साथी वाले रिस्ते दर किनार कर दिये जाते है,और अपनी मर्जी से अन्य रिस्ते बनाकर माता पिता के लिये एक नई मुसीबत हमेशा के लिये खड़ी कर दी जाती है।

ऐसे जातक का स्वभाव तुनक मिजाज होता है । पुरुष वर्ग कामुकता की तरफ़ मन लगाने के कारण अक्सर उसके अन्दर जीवन रक्षक तत्वों की कमी हो जाती है,और वह रोगी बन जाता है,लेकिन रोग के चलते यह शुक्र जवानी के अन्दर किये गये कामों का फ़ल जरूर भुगतने के लिये जिन्दा रखता है,और किसी न किसी प्रकार के असाध्य रोग जैसे तपेदिक या सांस की बीमारी देता है,और शक्तिहीन बनाकर बिस्तर पर पड़ा रखता है। इस प्रकार के पुरुष वर्ग स्त्रियों पर अपना धन बरबाद करते है,और स्त्री वर्ग आभूषणो और मनोरंजन के साधनों तथा महंगे आवासों में अपना धन व्यय करती है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि जन्मकुंडली में अष्टम भाव अचानक प्राप्ति का है इसके अंदर ज्योतिषी विद्याएं गुप्त विद्याएं अनुसंधान समाधि छुपा खजाना अध्यात्मिक चेतना प्राशक्तियों की प्राप्ति योग की ऊंची साधना मोक् पैतृक संपत्ति विरासत अचानक आर्थिक लाभ अष्टम भाव के सकारात्मक पक्ष है और लंबी बीमारी मृत्यु का कारण तथा दांपत्य जीवन अष्टम भाव के नकारात्मक पक्ष है |

जन्म कुंडली के आठवें भाव में शुक्र होने के कारण जातक देखने में सुंदर होते है। निडर और प्रसन्नचित्त शारीरिक,आर्थिक अथवा स्त्रीविषय सुखों में से कम से कम कोई एक सुख पर्याप्त मात्रा में इन्हे मिलता है।

पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि इस भाव का कारक ग्रह शनि है जो कि वास्तविक रूप में एक सच्चा सन्यासी व तपस्वी ग्रह है| रहस्य, सन्यास, त्याग, तपस्या, धैर्य, योग-ध्यान व मानव सेवा आदि विषय बिना शनिदेव की कृपा के मनुष्य को प्राप्त हो ही नहीं सकते| इसके अतिरिक्त जो लोग ख़ोज व अनुसंधान के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं उनके लिए भी अष्टम भाव एक निधि(ख़ज़ाने) से कम नहीं है| इससे यह सिद्ध हो जाता है कि ज्योतिष में कोई भी भाव व ग्रह बुरा नही होता बल्कि हरेक भाव व ग्रह की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं| कोई भी भाव व ग्रह मनुष्य के पूर्व कर्मों के अनुसार ही उसे अच्छा या बुरा फल देने के लिए बाध्य होता है।

किसी भी जातक की जन्म कुंडली मे दर्शाता है जिसके साथ आप व्यापारिक लेनदेन करते हैं। कुंडली में दूसरा भाव धन और व्यक्ति के पारिवारिक जीवन के बारे में बताता है। वहीं आठवां भाव ससुराल पक्ष की संपत्ति अथवा घर से मिलने वाली पैतृक संपत्ति को भी दर्शाने का कार्य करता है। सामान्य भाषा में कहें तो यह व्यक्ति के लिए अनार्जित धन होता है।

“जातक तत्व” में महादेव ने कहा है कि कुण्डली में अष्टम भाव सर्जन्स, मेडिकल ऑफिसर, बूचड़ खाना आदि कार्यक्षेत्र के बारे में बताता है। यदि जातक उपरोक्त क्षेत्र में किसी के साथ मिलकर कार्य करे तो वह उसमें लाभ कमा सकता है। आर. लक्ष्मण के अनुसार, यदि आठवें भाव का स्वामी प्रथमेश और दशमेश से मजबूत अवस्था में हो तो जातक को समाज में अपमानित या आलोचना का पात्र बनना पड़ता है। वहीं सत्याचार्य के अनुसार अष्टम भाव जातक के शत्रुओं के विषय में भी बताता है।

वहीं प्रश्न कुंडली के अनुसार, कुंडली में अष्टम भाव यात्रा में होने वाली कठिनाई, शत्रुओं से मिलने वाला कष्ट, मृत्यु, भष्ट्राचार, लड़ाई-झगड़ा, रोग तथा कमज़ोर पक्ष को दर्शाता है। वहीं मेदिनी ज्योतिष के अनुसार, कुंडली में आठवें भाव से जनता के विश्वास पर शासन, लाल-फीताशाही, कार्य तथा क्रियान्वयन में तेज़ी, देरी एवं बाधाएँ, दुर्घटना, सोना, क़ीमती रत्न, विरासत मिलने वाली संपत्ति, प्राकृतिक आपदा, भूकंप, समुद्री तूफान, आग, तूफान आदि का विचार किया जाता है

कुंडली में यह भाव विदेशी विनिमय, स्टॉक मार्केट, अनुबंध, कर, राष्ट्रीय ऋण, करों से प्राप्त होने वाला धन, बीमा कंपनियाँ, बीमा के तहत मिलने वाला मुआवजा, जनता की आय, अवरुद्ध परिसंपत्ति, छुपी हुई चीज़ें एवं खोज आदि को बताता है। आठवाँ दूसरे देशों से होने वाली आर्थिक संधि को भी दर्शाता है।

आठवां भाव राष्ट्र के शासक (राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री/चांसलर/राजा/तानाशाह) की मृत्यु के बारे में बताता है। कुंडली में इस भाव से सरकार के कार्यकाल का समापन पर भी विचार किया जाता है। इस भाव का संबंध स्वास्थ्य मंत्रालय, मृत्यु दर, आत्महत्या आदि से भी है।