जाको राखे साईंयां, मार सके न कोए

विजय विक्रान्त

जीवन की कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो अपनी छाप छोड़ कर चली तो जाती हैं मगर जब जब उनकी याद आती है तो एकाएक कंपकपी सी उठने लगती है। मेरे साथ भी कई बार कुछ ऐसा ही हुआ। हर बार लगता था कि जीवन का बस अन्त हो गया है मगर हर बार कहीं से यह आवाज़ आती थी – अभी नहीं… अभी नहीं… अभी नहीं…

कुएं में सांप – 1953

अम्बाले में अपने बाग में पिता जी ने कुआं लगवाने का निश्चय किया। भूमि पूजन के बाद एक गोल गढ़ा खोदा गया और उसमें पहिए जैसा लकड़ी का चाक डाला गया। चाक पर ईंटों से कुंए की चिनाई होने लगी। जब यह ढांचा कोई तीस फुट का हो गया तो उसके ऊपर बहुत सा वजऩ रक्खा गया। नीचे जाकर मज़दूर मिट्टी खोदते थे और उसको चरखी द्वारा बाहर फेंका जाता था। इस तरह से कुंआ धीरे धीरे नीचे धंसत जाता था। पानी के दर्शन होने के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा और कुआँ जल्दी जल्दी नीचे जाने लगा। छुट्टी का दिन था। मैंने साईकिल उठाई और बाग पर जा पहुँचा। मज़दूरों को काम करते देख कर मुझे भी कुंए में उतरने की इच्छा हुई। माधो के बार बार मना करने पर भी में नीचे उतर गया और मज़दूरों के साथ मिट्टी खोदनी शुरु कर दी। आधा घण्टा रह कर कुंए से बाहर आ गया और फिर एकदम घर की ओर प्रस्थान किया।

इसी बीच पिताजी को भी मेरी इस हरकत की खबर मिल गई। शाम को डांट तो जो पड़ी सो पड़ी, उसके साथ यह भी पता चला कि मेरे बाहर आने के एक मिनट बाद ही एक बहुत बड़ा सांप निकला और उसने एक मज़दूर को डस भी दिया था। मज़दूर को तुरन्त अस्पताल ले जाया गया और वो मरते मरते बचा। सर्प रूप में आए थे, बनकर काल महान,अभी नहीं, कह चल दिये दान रूप दे प्राण।