जानिये यूपी सहित पूरे देश में क्यों की जाती है माता समय की पूजा

खलीलाबाद से बीके मणि त्रिपाठी

भारत में जगह जगह डीह पर समय माता का मंदिर है ‌ कोई भी बडा़ पुरवा, गांव, महल ध्वस्त हुआ। कोई वारिस नहीं रहा तो कुछ वर्ष बाद वह डीह बन जाता है और वहां प्रतीक स्वरूप हाथी की मूर्ति रख कर उसका नाम समय माता,सम्मै माई, मां समय जी,समया माता या काली माता कह कर उसकी पूजा शुरु हो जाती है । काली माई का चौरा, डीह बाबा, बीरा बाबा आदि नाम पड़ जाता है ।

लगभग हर गांव के भीतर या बाहर ऐसे मंदिर मिलेंगे ।इसे ‘स्थान देवी’ या ‘ग्राम देवी’ भी कहकर पुकारते हैं । हर विवाह ,मुंडन, जनेऊ आदि संस्कारों में इस स्थान पर पूजा जरुर की जाती है । विवाह के दुल्हे को राछ घुमाने कुआं पर लेजाते हैं तो यहां नाच गाकर गोड़ धराने (प्रणाम) के बाद ही बारात विदा होती है । विवाह बाद नई बहू आई तो यहां दर्शन कराने जरुर ले जाया जाता है।

मतलब यह कि ‘समय बड़ा बलवान’ भाग्य सबसे बली होता है ‌। किसी का जन्म होते काल उसके पीछे पड़ जाता है । यह समय जैसे जैसे बीतता है, उम्र का एक एक दिन कम होता जाता है ‌। उम्र पूरी होने पर स्थाई मृत्यु हो जाती है। इस काल ने न जाने कितने राजाओ़,उनकी प्रजाओं को खा लिया है ‌। काल ने कितने गांव नष्ट कर‌ दिये कितने नदी के धार बदल‌ गए, महल अटारी डूब गया। गांव विसर्जित हो गए। अत: उस काल की पूजा करो देवी के रूप मे़ करो या देव रूप में है‌ वह समय ही ।

गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा

(अध्याय११श्लोक३२)

कालोस्मि लोकक्षय कृत प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तु मिह प्रवृत्त:।

ऋतेपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा:।। मतलब यह कि मैं काल हूं ,समस्त जगत का क्षय करता रहता हूं लोक का संहार करने में लगा हूं । हे अर्जुन तुम्हे छोड कर दोनों पक्षो के योद्धा एक एक करके सब मारे जायेंगे ‌। प्राणी का बीज बचा रहेगा,नव सृजन करेगा । पर सृजन के साथ मृत्यु सबके पीछे लग जायेगी । पुराने जमाने में भी राजा लोग इस डीह के हस्ती मूर्ति को पूजते थे ।

पूजा चढ़ाई जाती थी ,मान्यता थी कि इनकी पूजा करने से दैवी आपदा नहीं पड़ेगा और न तो महामारी फैलेगी । देवी हर तरह से हमारे राज्य की सुरक्षा करेगी।शत्रु पर आक्रमण करने राजा‌ निकलता था तो यहां दर्शन करने के बाद ही उसकी युद्धयात्रा शुरु होतु थी । इसी काल या काली की उपासना नवरात्रों में की जाती थी ।

मनोकामना पूरी होने पर यहा हाथी की मृत्तिका मूर्ति चढ़ाई जाती रही। पूड़ी‌ लप्सी बना कर महिलाएं सिंदूर से टीक कर‌ जेवनार चढ़ाती रही हैं। यह परंपरा आज भी जीवित है । इसका पुरुष वाची नाम शिव- महाकाल है । काली इनकी पत्नी कही गई है ‌। ये संहार के देवता माने गए हैं ।