जानें कैसे मुक्ति मिलेगी आपको पितृ दोष से

पं सुनील कुमार शास्त्री

नया लुक टीम, नई दिल्ली। अक्सर लोग इस भ्रम में रहते हैं कि श्राद्ध क्यों आवश्यक हैं? इसके लाभ क्या हैं? और इसकी महत्ता क्या है? कल से श्राद्ध पक्ष प्रारम्भ हो जाएगा। सोलह दिन के लिए हमारे पितृ घर में विराजमान होंगे। अपने वंश का कल्याण करेंगे। घर में सुख-शांति-समृद्धि प्रदान करेंगे। श्राद्ध कर्म करने की विधि होती है ताकि इसमें कोई भूल न हो। विभिन्न वेदों में कर्मकांड के अंतर्गत पितृ यज्ञ का वर्णन मिलता है। यह पितृ यज्ञ ही पितृ श्राद्ध है। इसका तात्पर्य है कि पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।’श्रद्धाया इदं श्राद्धम्‌’। विभिन्न प्राचीन ऋषियों, मुनियों एवं वेदों-पुराणों में श्राद्ध के लक्षण बताए गए हैं।


महर्षि पाराशर के अनुसार–  ‘देश, काल तथा पात्र में हविष्यादि विधि द्वारा जो कर्म तिल, यव और कुशा आदि से तथा मंत्रों से श्रद्धापूर्वक किया जाए उसे श्राद्ध कहते हैं।
महर्षि मरीचि-  मृत पितरों के निमित्त अपने को प्रिय भोजन, जिसे श्रद्धायुक्त होकर दिया जाए, उसे श्राद्ध कहा है।
महर्षि बृहस्पति- ‘जिस कर्म विशेष में अच्छी प्रकार से पकाए हुए उत्तम व्यंजन को दुग्ध, घृत (घी) और शहद के साथ श्रद्धापूर्वक पितृगण के उद्देश्य से ब्राह्मण आदि को प्रदान किया जाए उसे श्राद्ध कहते हैं।
ब्रह्मपुराण-   देश, काल और पात्र में श्रद्धा द्वारा जो भोजन पितरों के उद्देश्य से ब्राह्मणों को दिया जाए, उसे श्राद्ध कहते हैं। हिंदू धर्म में प्राचीन काल से मनुष्यों में श्राद्ध के प्रति अटूट श्रद्धा भक्ति रही है। यह हिंदू धर्म ही है, जिसमें मृत्यु पश्चात्‌ भी जनक-जननी के प्रति कर्त्तव्य का निर्वहन बताया है। अतः अगर शास्त्रोक्त श्राद्ध संपन्न करना संभव न हो तो कम से कम वर्ष में एक बार पितृ पक्ष में अपने मृत पितृगण की मरण तिथि के दिन श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। पितृ पक्ष के साथ पितरों का विशेष संबंध रहता है। अतः शास्त्रों में पितृ पक्ष में श्राद्ध करने की विशेष महिमा लिखी है।


महर्षि जाबालि-   ‘पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से पुत्र, आयु, आरोग्य, अतुल ऐश्वर्य और अभिलाषित वस्तुओं की प्राप्ति होती है। जो लोग पितृपक्ष में अपने मृत पितरों के प्रति श्राद्ध नहीं करते, उनके पूर्वज लोग उन्हें कठिन श्राप देते हैं।

क्या है श्राद्ध की विधि

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध करने की भी विधि होती है। यदि पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म न किया जाए तो मान्यता है कि वह श्राद्ध कर्म निष्फल होता है और पूर्वजों की आत्मा अतृप्त ही रहती है। शास्त्रसम्मत मान्यता यही है कि किसी सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण के जरिए ही श्राद्ध कर्म (पिंड दान, तर्पण) करवाना चाहिए। श्राद्ध कर्म में पूरी श्रद्धा से ब्राह्मणों को तो दान दिया ही जाता है साथ ही यदि किसी गरीब, जरूरतमंद की सहायता भी आप कर सकें तो बहुत पुण्य मिलता है। इसके साथ-साथ गाय, कुत्ते, कौवे आदि पशु-पक्षियों के लिए भी भोजन का एक अंश जरूर डालना चाहिए।
श्राद्ध करने के लिए सबसे पहले जिसके लिए श्राद्ध करना है उसकी तिथि का ज्ञान होना जरूरी है। जिस तिथि को मृत्यु हुई हो उसी तिथि को श्राद्ध करना चाहिए। लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थिति होती है कि हमें तिथि पता नहीं होती तो ऐसे में आश्विन अमावस्या का दिन श्राद्ध कर्म के लिए श्रेष्ठ होता है क्योंकि इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है। दूसरी बात यह भी महत्वपूर्ण है कि श्राद्ध करवाया कहां पर जा रहा है। यदि संभव हो तो गंगा नदी के किनारे पर श्राद्ध कर्म करवाना चाहिए। यदि यह संभव न हो तो घर पर भी इसे किया जा सकता है। जिस दिन श्राद्ध हो उस दिन ब्राह्मणों को भोज करवाना चाहिए.भोजन के बाद दान दक्षिणा देकर भी उन्हें संतुष्ट करें।

पितरों का श्राद्ध पक्ष में मिलता है शुभ संकेत

अपने घर के आसपास अगर आपको कौए की चोंच में फूल-पत्ती दिखाई दे जाए तो मनोरथ की सिद्धि होती है। अगर कौआ गाय की पीठ पर चोंच को रगड़ता हुआ दिखाई तो समझिए आपको उत्तम भोजन की प्राप्ति होगी। अगर कौआ अपनी चोंच में सूखा तिनका लाते दिखे तो धन लाभ होता है। कौआ अनाज के ढेर पर बैठा मिले, तो धन लाभ होता है अगर सूअर की पीठ पर कौआ बैठा दिखाई दें, तो अपार धन की प्राप्ति होती है। यदि कौआ बाईं तरफ से आकर भोजन ग्रहण करता है तो यात्रा बिना रुकावट के संपन्न होती है। वहीं कौआ पीठ की तरफ से आता है तो प्रवासी को लाभ मिलता है। अगर कौआ मकान की छत पर या हरे-भरे वृक्ष पर जाकर बैठे तो अचानक धन लाभ होता है।