दीपावली में ऐसे करेंगे पूजा तो निश्चित ही धन का भंडार भर जाएंगी श्रीलक्ष्मी

जानिए इस बार की दीपावली में कब है पूजा का मुहुर्त और कैसे करें पूजा। धनतेरस से लेकर भैया दूज तक चलने वाले इस पर्व पर क्या रखनी होती हैं सावधानियां और किन छोटी-छोटी चीजों को ध्यान में रखते हुए माता श्री लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए, इन सारे प्रश्नों का जवाब दे रहे हैं लखनऊ के मशहूर ज्योतिषाचार्य प्रदीप तिवारी…। वह बता रहे हैं कि दीप पर्व पर किस प्रकार पूजा करने से माता निश्चित रूप से प्रसन्न होंगी और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाएंगी।

दीपावली का पर्व इस बार सात नवम्बर, 2018, दिन बुधवार को पूरी दुनिया में मनाया जाएगा। सभी सनातनधर्मी और व्यवसायिक प्रतिष्ठान के लोग, यहां तक कि हर मत, हर सम्प्रदाय के लोग इसको बड़े हर्षोल्लास के साथ युगों-युगों से मनाते आ रहे हैं। ऐसा कहा जाता है सतयुग से लेकर अब तक इस त्यौहार को लोग बड़े सौहार्द और हर्ष उल्लास के साथ मनाया गया है। इसके पीछे कई कथाएं भी कही और सुनी जाती हैं। पुराणों में दीपोत्सव के इस पर्व को कौमुदी पर्व के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि व्यक्ति इस दिन, जितना खुश और आनंदित रहता है, उसका वह वर्ष हर्षोल्लास के साथ व्यतीत होता है।

कार्तिक अमावस्या में क्यों करते हैं श्रीलक्ष्मी की पूजा और कब है शुभ मुहुर्त…

ब्रह्म पुराण के अनुसार कार्तिक अमावस्या के दिन स्वाति नक्षत्र में जब सूर्य और चंद्रमा एक साथ होते हैं, तब रात्रि में लक्ष्मी गृह आश्रय लेने के लिए नगर-नगर घूमती हैं, इसलिए इस दिन प्रदोष काल यानी शाम के समय से ही घर को सुंदरता के साथ सजाकर घर के समस्त भागों को प्रकाशित कर रात्रि जागरण करते हुए लक्ष्मी जी का स्मरण करना चाहिए। ऐसा करने से विष्णु प्रिया की प्रसन्नता बढ़ जाती है। शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी जी का पूजन स्थिर लग्न में किया जाता है। इस दिन शुभ मुहूर्त में पूजन करने का नियम है, जैसे कि इस बार वृश्चिक लग्न सुबह 6:56 से 9:13 तक है। उसके बाद कुंभ लग्न 1:05 से 2:35 तक और प्रदोष काल में 5:41 से 7:38 तक का समय बेहद शुभ है। महानिशा पूजन मध्य रात्रि में या सिंह लग्न 12:09 से 2:23 रात्रि के बीच में करना शुभ माना गया है। मध्यान्ह काल में अभिजीत मुहूर्त है जो इन सबसे शुभ है यह काल 11:26 से 12.26 तक रहेगा।

क्या है इसके पीछे की कथाएं

पुराणों में दीपावली को लेकर एक कथा है। सतयुग में भगवान नारायण द्वारा राजा बलि को तीन दिन का राजा बनाया गया था, उस समय नारायण ने आशीर्वाद दिया था और पूरे राज्य में दीपावली मनाई गई थी। इसी तरह एक कथा और है। त्रेता युग में भगवान राम वनवास जब दोबारा अवधपुरी लौटे तो खुशी में अवधपुर के समस्त लोगों ने दीप प्रज्वलित कर भगवान राम का स्वागत किया था, उस समय से यह भगवान राम के अयोध्या आगमन के रूप में मनाया जाने लगा। व्यास जी कहते हैं कि इस अमावस्या के दिन पितरों का पूजन तुला में करने से भाग्योदय हो जाता है। इसीलिए अमावस्या के दिन पितरों का मार्गदर्शन के लिए  दीप प्रकाशित किया जाता है।

तीन दिनों तक चलता है यह पर्व

आम जनमानस के साथ-साथ पुराणों में भी तीन दिन का यह पर्व माना गया है। कुछ लोग धन त्रयोदशी से लेकर दीपावली तक मनाते हैं। कुछ लोग चतुर्दशी से लेकर प्रतिपदा तक और कुछ लोग इसको दीपावली से लेकर भैया दूज तक। लेकिन धनत्रयोदशी से लेकर दीपावली तक इसका विशेष महत्त्व शास्त्रों में भी दिया हुआ है इसीलिए प्रायः लोग धनत्रयोदशी से लेकर दीपावली तक यह पर्व मनाते हैं।

शास्त्रों के अनुसार समुद्र मंथन के समय श्री आदि वैद्य धनवंतरी जी अमृत कलश लेकर और महालक्ष्मी कलश लेकर समुद्र से उत्पन्न हुई थीं। उस दिन से धनतेरस के दिन विशेष कर नूतन बर्तन घर में लाने की प्रथा कायम हो गई। समय के साथ अब इस दिन लोग वस्त्र, आभूषण, वाहन और घर भी खरीदना अच्छा मानने लगे, लेकिन शास्त्रों में इसका कोई वर्णन नहीं किया गया है।

धनतेरस के दिन क्या करें

इस दिन शाम को घर के दरवाजे पर एक दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड में कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को प्रदोष काल में अपने घर के दरवाजे पर दीपक जलाने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है। ऐसा करने वाले की अल्पकालिक मृत्यु भी नहीं होती। लक्ष्मी के साथ सूर्यनंदन यम की कृपा प्राप्त होती है। दूसरे दिन चतुर्दशी को  स्नान कर 14 यमों का तर्पण करना चाहिए।

जो इस प्रकार हैं- ऊँ यमाय नमः। ऊँ धर्मराजाय नमः। ऊँ मृत्यवे नमः। ऊँ अन्याय नमः। ऊँ वैवस्वताय नमः। ऊँ कालाय नमः। ऊँ सर्वभूतक्षयाय नमः। ऊँ औदुम्बराय नमः। ऊँ दध्नाय नमः। ऊँ नीलाय नमः। ऊँ परमेष्ठिने नमः। ऊँ वृकोदराय नमः। ऊँ चित्राय नमः। ऊँ चित्रगुप्ताय नमः। इसके साथ ही प्रदोष काल में लक्ष्मी की विशेष कृपा पाने के लिए चतुर्मुखी दीपक जलाना चाहिए। चतुर्मुखी दीपक का दान भी करना शुभ होता है। शास्त्रों में वर्णन है कि ऐसा करने से सुख, शांति और समृद्धि प्रदान होती है।

लक्ष्मी को प्रिय है यह सामग्री

माताजी को पुष्प में कमल व गुलाब प्रिय है। फल में श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े प्रिय हैं। सुगंध में केवड़ा, गुलाब, चंदन के इत्र का प्रयोग इनकी पूजा में अवश्य करें। अनाज में चावल तथा मिठाई में घर में बनी शुद्धता पूर्ण केसर की मिठाई या हलवा, शिरा का नैवेद्य उपयुक्त है। प्रकाश के लिए गाय का घी, मूंगफली या तिल्ली का तेल इनको शीघ्र प्रसन्न करता है। अन्य सामग्री में गन्ना, कमल गट्टा, खड़ी हल्दी, बिल्वपत्र, पंचामृत, गंगाजल, ऊन का आसन, रत्न आभूषण, गाय का गोबर, सिंदूर, भोजपत्र का पूजन में उपयोग करना चाहिए।

दीपावली में ऐसे करते हैं माता की पूजा

चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम में रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजनकर्ता मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है। दो बड़े दीपक रखें। एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अतिरिक्त एक दीपक गणेशजी के पास रखें।

मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं। इसके बीच में सुपारी रखें व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचोंबीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें। थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें- 1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे।

उसके बाद सामूहिक रूप से कहें- भगवती लक्ष्मी कमल के आसन पर विराजमान हैं, कमल की पंखुड़ियों के समान सुन्दर बड़े-बड़े जिनके नेत्र हैं, जिनकी विस्तृत कमर और गहरे आवर्तवाली नाभि है, जो पयोधरों के भार से झुकी हुई और सुन्दर वस्त्र के उत्तरीय से सुशोभित हैं, जो मणि-जटित दिव्य स्वर्ण-कलशों के द्वारा स्नान किए हुए हैं, वे कमल-हस्ता सदा सभी मङ्गलों के सहित मेरे घर में निवास करें। पूरी पूजा के बाद माता की आरती करने के बाद ही लोग प्रसाद ग्रहण करें। ऐसा आचरण करने वालों के घर माता लक्ष्मी स्थिर रूप से निवास करती हैं। प्रेम से बोलो लक्ष्मी माता की जय।