देवोत्थनी एकादशीः इन्हीं चार कथाओं के कारण आज पूजे जाते हैं श्रीहरि विष्णु

आचार्य प्रदीप तिवारी

इस बार देवोत्थानी एकादशी आज यानी 19 नवंबर को पड़ रही है। आज के दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु चार माह की योग निद्रा से जागेंगे। इस दिन अबूझ मुहूर्त है। प्रभु के स्वागत की तैयारियां तकरीबन पूरे देश में पूरी हो चुकी हैं। कहा जाता है कि भगवान के जागने के बाद ही मांगलिक कार्यक्रमों की शुरुआत की जाती है। इस बार भगवान विष्णु 23 जुलाई (देवशयनी एकादशी) के दिन चार माह के लिए क्षीर सागर में योग निद्रा में लीन हो गए थे, तभी से सभी मांगलिक कार्य रुक गए थे। आज नारायण दोबारा बैकुंठ पहुंच जाएंगे, जिसके कारण मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र एवं सिद्ध योग में पड़ने वाली इस एकादशी की शाम से सभी शुभ योग शुरू हो जाएंगे। इसलिए इस एकादशी को लोग देवप्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं।

चार माह बाद इस दिन श्री हरि विष्णु जागते हैं इसलिए पौराणिक ग्रंथों में इस एकादशी का नाम देवोत्थनी एकादशी कहा जाता है। साल 2018 में देवोत्थान एकादशी का व्रत 19 नवंबर को है। साधु सन्यासी, विधवाओं एवं मोक्ष की इच्छा रखने वालों के लिए एकादशी व्रत 20 नवंबर को है। पुराणों में इस वैकल्पिक एकादशी को वैष्णव एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों में सभी एकादशियों का अपना महत्व है। लेकिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी भी विशेष फलदाई होती है। इसको लेकर कई व्रत कथाएं प्रचलित हैं। हम यहां तीन एकादशी व्रत की कथा बता रहे हैं। जनश्रुतियों और पौराणिक कथाओं के आधार पर इन तीनों एकादशी कथाओं का श्रवण, मनन बहुत ही फलदाई होता है।

  1. क्या है एकादशी की पौराणिक कथा

माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से कहा कि प्रभु आप या तो दिन-रात जागते हैं या फिर लाखों करोड़ों वर्ष तक सोते हैं। उस समय दानव सृष्टि का विनाश कर डालते हैं। इसलिये हे नाथ आपको हर साल नियमित रूप से निद्रा लेनी चाहिए। तब श्री हरि बोले-देवी आप ठीक कहती हैं। मेरे जागने का सबसे अधिक कष्ट आपको ही सहन करना पड़ता है आपको क्षण भर के लिए भी मेरी सेवा करने से फुर्सत नहीं मिलती। मैं अब से प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु में चार मास तक के लिये शयन किया करूंगा ताकि आपको और समस्त देवताओं को भी कुछ अवकाश मिले। मेरी यह निद्रा अल्पकालीन एवं प्रलयकारी महानिद्रा कहलायेगी। मेरी इस निद्रा के दौरान जो भी भक्त भावना पूर्वक मेरी सेवा करेंगें और मेरे शयन व जागरण को उत्सव के रूप में मनाते हुए विधिपूर्वक व्रत, उपवास व दान-पुण्य करेंगें उनके यहां मैं आपके साथ निवास करूंगा और तभी से नारायण आषाढ़ मास की देवशयनी एकादशी को सत्ता शिव के हाथ सौंप शयन के लिए निकल पड़ते हैं और ठीक चार माह बाद यानी कार्तिक मास की पूर्णिमा को जगते हैं, इसलिए पूरी दुनिया इस एकादशी को देवोत्थनी एकादशी के रूप में मनाती है।

  1. और भी कथाएं हैं प्रचलित

एक बहुत ही पुण्यात्मा राजा हुआ करते थे, लेकिन वह धर्म का दिखावा बहुत करते थे। कई बार तो अपनी प्रजा के साथ जबरदस्ती भी किया करते। एकादशी पर किसी भी घर में अन्न पकना तो दूर दुकानों पर अन्न को बेचने तक की मनाही होती थी। एक बार एक व्यक्ति उनके यहां नौकरी के लिए आया। राजा ने उसके सामने शर्त रखी की वह जो भी खाने को देगा उसे उसी का आहार करना होगा। उस शख्स को रोजगार की सख्त जरूरत थी इसलिए उसने हामी भर ली। अब वह मन लगाकर काम करता राजा भी उसके काम से प्रभावित था इसलिये उसे ठीक-ठाक भोजन भी मिलता था। एक बार एकादशी के दिन की बात है कि पूरे राज्य में अन्न ग्रहण न करने की मुनादी करवा दी। एकादशी के दिन राजा ने उसे फलाहार करने को कही तो उसने अन्न की मांग की अब राजा ने उससे कहा कि जो मैं तुम्हें दे रहा हूं उसी को ग्रहण करना पड़ेगा। तुम्हें इसी शर्त पर यहां रखा था। उसने कहा महाराज आप चाहे और कुछ भी कहें पर भूख मुझसे बर्दाश्त नहीं होती। राजा ने उसके काम को देखते हुए उसे अन्न दे दिया। अब वह नित्य की तरह नदी किनारे जाकर अपना भोजन बनाकर भगवान का आह्वान करता है और भोग लगाने की कहता है। भगवान भी प्रकट हुए और उसके साथ भोजन कर अंतर्धान हो गये। पंद्रह दिन बाद फिर एकादशी का व्रत आया। इस बार उसने राजा से दोगुना अन्न देने की कही और कहा कि स्वंय भगवान मेरे साथ भोजन करते हैं, इसलिये हम दोनों के लिए यह कम पड़ जाता है।

राजा ने सोचा कि इसका मानसिक संतुलन बिगड़ा हुआ है। उन्हों  उच्च स्वर में कहा कि मुझे इतने साल हो गये उपवास और धर्म के कार्य करते हुए मुझे तो भगवान ने कभी दर्शन नहीं दिये और तेरे साथ वे भोजन करते हैं। उसने कहा महाराज मैं झूठ नहीं बोल रहा यकीन नहीं आ रहा तो आप स्वंय देख लेना। अब राजा ने फिर उसे भोजन दे दिया लेकिन इस बार कहा कि अगर जो तुम कह रहे हो वह सच न हुआ तो फिर इसका अंजाम भुगतने के लिये भी तैयार रहना। व्यक्ति ने जाकर भोजन पकाया और भगवान का आह्वान करने लगा। राजा भी पेड़ के पीछे से उस पर नजर रख रहा था। इस बार भगवान नहीं प्रकट हुए।

व्यक्ति ने विवश होकर संकल्प किया कि प्रभु यदि आपने भोजन ग्रहण नहीं किया तो मैं यहीं नदी में कूदकर अपने प्राण त्याग दूंगा। भगवान अब भी प्रकट नहीं हुए। वह जैसे ही दृढनिश्चय के साथ अपने प्राण त्यागने के लिये नदी की ओर बढ़ा तो भगवान प्रकट हुए और हमेशा की तरह उसके साथ भोजन करने लगे। इस सारे घटनाक्रम को देखकर राजा की समझ में आ गया कि यह सब भगवान की ही माया है। वे मुझे समझाने की कोशिश कर रहे थे कि सच्ची श्रद्धा से किया गया धर्म पुण्य ही फलदायी होता है।

  1. एक और देवोत्थनी एकादशी की कथा

यह कहानी भी एक राजा की है। राजा बहुत ही पुण्यात्मा और श्री हरि के सच्चे भक्त थे। एक बार भगवान ने इनकी परीक्षा लेने का विचार बनाया और एक सुंदर स्त्री का वेश धारण कर जिस सड़क से राजा का गुजरना होता था वहीं बैठ गए। उधर से गुजरते हुए जब राजा की नजरें उस स्त्री पर पड़ी तो उसे ही निहारते रह गए। उन्होंने उसके सड़क पर होने का कारण पूछा तो। स्त्री बने नारायण ने कहा कि वह निराश्रित है उसका कोई नहीं बचा है, तब राजा ने उसे अपनी रानी बनने को कहा। राजा को अपने जाल में फंसता देखकर नारायण ने कहा कि रानी तो मैं बन जाऊंगी लेकिन आपको राज्य की बागडोर मेरे हाथों में सौंपनी होगी। जो मैं कहूंगी वही खाना पड़ेगा। आकर्षण में राजा की आंखे बंद हो चुकी थी और गर्दन थी की हां में ही हिलती जा रही थी। राजा उसे अपने राजमहल में ले आए।

अगले ही दिन एकादशी का व्रत था और नई रानी ने आदेश दिया कि जैसे रोज अन्न का आहार होता है एकादशी को भी वैसा ही हो। राजमहल में मांसाहारी भोजन बनवाकर राजा के सामने प्रस्तुत किया। अब राजा ने कहा कि आज एकादशी है और इस दिन मैं भगवान श्री विष्णु की भक्ति में लीन रहता हूं। उपवास के दौरान केवल फलाहार ही करता हूं। अब रानी ने राजा को अपने वचन की याद दिलाई। रानी ने कहा कि मैं आपको सिर्फ एक शर्त पर ही ऐसा करने दे सकती हूं। उसने कहा बदले में मुझे आपके बेटे का सर चाहिए। राजा ने कहा कि मैं बड़ी रानी से सलाह लेने के बाद ही आपको कुछ कह पाऊंगा। इस संकट के बारे में जब राजा ने बड़ी रानी को सब बताया तो उसने कहा कि भगवान ने चाहा तो पुत्र ओर मिल जायेगा लेकिन अपना धर्म भ्रष्ट कर लिया तो फिर कहीं कोई ठौर नहीं।

रानी रोने लगी कि तभी शिकार खेल कर लौटे राजकुमार ने अपनी माता से रोने का कारण पूछा। उसने सारा वृतांत अपने बेटे को भी कह सुनाया। पिता के धर्म की रक्षा के लिये लड़का भी अपने बलिदान के लिए तैयार हो गया। अब धर्म को लेकर पूरे परिवार की निष्ठा को देखते हुए भगवान श्री हरि भी अपने वास्तिविक रूप में आये और राजा से वर मांगने को कहा। राजा ने कहा प्रभु आपका दिया सब कुछ है बस हमारा उद्धार करें। तब अपने राजपाट की बागडोर पुत्र के हाथों सौंपकर वह भगवान विष्णु के साथ बैकुंठ प्रस्थान कर गये।

  1. तुलसी विवाह के कारण ही पूजे जाते हैं श्रीहरि

देव उठनी एकादशी के दिन ही भगवान श्री हरि के शालीग्राम रूप का विवाह तुलसी के साथ किया जाता है। तुलसी को विष्णुप्रिया कहा जाता है। मान्यता है कि जब श्री हरि जागते हैं तो वे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं। मृत्युलोक में तुलसी के माध्यम से श्री हरि का आह्वान किया जाता है। भक्तगण अपने जीवन को उल्लासमय बनाने और परमानंद की प्राप्ति के लिए तुलसी विवाह का आयोजन करते हैं। मान्यता है कि जिन दंपतियों की संतान नहीं होती उन्हें एक बार तुलसी का विवाह कर कन्यादान अवश्य करना चाहिए। असल में तुलसी को जड़ रूप होने का श्राप मिला था, जिसकी अलग-अलग पौराणिक कहानियां भी मिलती हैं।

तुलसी विवाह की कथा

जलंधर नाम का एक पराक्रमी असुर था, जिसका विवाह वृंदा नाम की कन्या से हुआ। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी और पतिव्रता थी, इसी कारण जलंधर अजेय हो गया। अजेय होने पर जलंधर अभिमानी हो गया और वह स्वर्ग की कन्याओं को परेशान करने लगा। दुःखी होकर देवता भगवान विष्णु की शरण में गए।

भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलंधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया, इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गई और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया। लेकिन भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे, अतः वृंदा के शाप को जीवित रखने के लिए उन्होंने अपना एक रूप पत्थर रूप में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया।

भगवान विष्णु को दिया शाप वापस लेने के बाद वृंदा जलंधर के साथ सती हो गई। वृंदा के राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया। इसी घटना को याद रखने के लिए प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है।

शालिग्राम पत्थर गंडकी नदी से प्राप्त होता है। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी, तुम्हारा स्थान मेरे शीश पर होगा। मैं तुम्हारे बिना भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है। बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं।