पीएम मोदी के राज में भारत की बेरोजगारी में वृद्घि

उमाशंकर सिंह

आंकड़ों के अनुसार भारत में हर साल लगभग 12 लाख नए युवा रोजगार के लिए तैयार हो रहे हैं लेकिन उन्हें रोजगार मिल नहीं पाता है। फरवरी माह में संसद में भी सरकार ने स्वीकार किया है कि भारत में हर साल नौकरियों के लिए तैयार हो रहे  युवाओं के लिए रोजगार सृजन एक महत्वपूर्ण चिंता है। संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने इस महीने 2017 की विश्व रोजगार और सामाजिक आउटलुक रिपोर्ट जारी की, जिसके अनुसार विश्व में बेरोजगारी और सामाजिक असमानता के विरुद्घ आर्थिक वृद्घि की दर बहुत धीमी है।

हाल ही में सीएसओ ने अपनी आईआईपी और डब्ल्यूपीआई डेटा जारी किया है। सरकार ने इस डेटा में 2004-05 से 2011-12 तक अपना आधार वर्ष बदल दिया है। सरकार ने आधार वर्ष को क्यों बदल दिया और देश में अर्थव्यवस्था की स्थिति क्या है? इस पर हम बाद में चर्चा करेंगे, पहले यह बताना आवश्यक है कि वर्तमान संदर्भ में यह डाटा क्या कहता है। पहले चर्चा करते हैं आईआईपी यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के बारे में। आईईपी पिछले महीने 1.9 प्रतिशत के मुकाबले मार्च में 2.7 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। सरकार द्वारा जारी आंकड़े पर गौर करें तो मालूम चल जाएगा कि सरकारें किस तरह से इन आंकड़ों के साथ खेल करती हैं जिससे दुनिया की अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत की अर्थव्यवस्था फलती-फूलती और तेज गति से आगे बढ़ती दिखाई दे।

वर्ष 2011-12 आधार वर्ष पता चलता है कि साल 2012-13 से 1016-17 के बीच देश में औद्योगिक उत्पादन 5 प्रतिशत की दर से बढ़ा है, जो कि पुराने वर्ष 0.7 प्रतिशत के मुकाबले ज्यादा है। इसी तरह पुराने आधार वर्ष में औद्योगिक संकुचन २२ महीने का था जबकि नए आधार वर्ष के अनुसार औद्योगिक संकुचन घटकर पांच रह गया है। मोदी सरकार इस बढ़त को यह कहकर प्रचारित कर रही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन देश के अर्थशास्त्री उसे बारीकी से नहीं देख पा रहे हैं। अब आपको इस परिवर्तन का कारण स्पष्ट करते हैं। दरअसल आधार वर्ष 2011-12 आपदा का वर्ष था, जहां देश की अर्थव्यवस्था धीमी तथा जनआंदोलन अपने चरम पर था।

इस वर्ष देश का सकल घरेलू उत्पाद 6.4 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी । उद्योगपतियों का सरकार की पॉलिसी से विश्वास उठ चुका था और विपक्ष सरकार पर यह कहकर हमलावर था कि तत्कालीन सरकार पॉलिसी विहीन है। इन सबके बीच भारत की जनता की मनोदशा भी लगातार सरकार के खिलाफ होती जा रही थी, इसी का परिणाम था कि जब भ्रष्टाचार के विरुद्घ अन्ना आंदोलन शुरू हुआ तो उनके साथ विशाल जनसैलाब था।

अब इस बात का विश्लेषण करते हैं कि इस डाटा में हमारे लिए क्या है। डाटा के अनुसार, देश के औद्योगिक उत्पादन में 1.2 प्रतिशत की गिरावट, बिजली उत्पादन में 6.9 प्रतिशत की गिरावट आई है, हालांकि खनन क्षेत्र का जरूर विस्तार हुआ है। यहां सबसे ज्यादा नुकसान असंगठित क्षेत्र का हुआ है जो कि हमारे जीडीपी में एक बहुत बड़ा योगदानकर्ता है। यह थोक मूल्य सूचकांक के जारी आंकड़ो का सबसे चिंताजनक पहलू है। अप्रैल माह में  खाद्य वस्तुओं में मुद्रास्फीती दर 1.6 प्रतिशत 3.82 प्रतिशत रही। जबकि दालों में 13.64 प्रतिशत की अपस्फीती दर्ज की गई है। इसका मुख्य कारण दालों के निर्यात के लिए हमारा गलत तरीका तथा दूसरे देशों से आयातित दालों का गलत तरीका है। चर्चा तो यह भी है कि भारत सरकार ने कुछ अफ्रीकी देशों को इस वादे के साथ पट्टे दिए कि वे भारत के लिए दालों की खेती करें।

सब्जियों में भी भारतीय किसानों को बड़े पैमाने पर घाटे का सामना करना पड़ा है। सब्जियों में मुद्रास्फीती -7.78 प्रतिशत दर्ज की गई है जिसमें आलू -40.97 प्रतिशत और प्याज -12.47 प्रतिशत दर्ज की गई। यही कारण है कि किसानों अपने आलू और प्याज सड़कों पर डालकर प्रदर्शन किया, क्योंकि उन्हें उसका वाजिब दाम नहीं मिल पाया, जो किसानों की बरबादी और उनकी आत्महत्याओं का एक प्रमुख कारण है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में लाल मिर्च के उत्पादकों की स्थिति पहले से बद्तर है। वे अपना लागत मूल्य भी नहीं निकाल पा रहे हैं क्योंकि जिस लाल मिर्च के  दाम पिछले वर्षों में 12 हजार थे, घटकर 1500 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं। ये सभी संकट दोनों सरकारों यानी केंद्र सरकार और राज्य सरकार के कुप्रबंधन के कारण हैं।

बेरोजगारी

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे नरेंद्र मोदी ने प्रचार के दौरान देश की युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था, जिसके बाद उनकी प्रचंड जीत हुई। लेकिन साल 2015 पर गौर फरमाएं, इस वर्ष देश के विभिन्न क्षेत्रों जिसमें मुख्य आठ क्षेत्रों कपड़ा, चमड़े, धातु, ऑटोमोबाइल, रत्न और आभूषण, परिवहन, सूचना प्रौद्योगिकी और हथकरघा में रिकार्ड गिरावट दर्ज की गई। इन क्षेत्रों में वर्ष 2015 में 135000 नई नौकरियां पैदा हुईं जबकि साल 2014 में यह आंकड़ा 421000 था। यानी 2014 के मुकाबले 2015 में 67 प्रतिशत कम। वर्ष 2014 में नई नौकरियों में वृद्घि यूपीए सरकार के कारण हुई थी। इससे भी बद्ïतर हालात पिछले वर्ष अक्टूबर से दिसम्बर के बीच इन्हीं क्षेत्रों में 20000 लोगों ने अपनी नौकरी खो दी।

निर्यात में कमी के कारण भारत दुनिया की तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में जरूर आगे है लेकिन चीन की तुलना में 7.2 प्रतिशत कम है। आंकड़ों के अनुसार भारत में हर साल लगभग 12 लाख नए युवा रोजगार के लिए तैयार हो रहे हैं लेकिन उन्हें रोजगार मिल नहीं पाता है। फरवरी माह में संसद में भी सरकार ने स्वीकार किया है कि भारत में हर साल नौकरियों के लिए तैयार हो रहे  युवाओं के लिए रोजगार सृजन एक महत्वपूर्ण चिंता है। संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने इस महीने 2017 की विश्व रोजगार और सामाजिक आउटलुक रिपोर्ट जारी की, जिसके अनुसार विश्व में बेरोजगारी और सामाजिक असमानता के विरुद्घ आर्थिक वृद्घि की दर बहुत धीमी है। उसके अनुसार भारत में बेरोजगारी की दर साल 2017 में 17.7 और साल 2018 में 18 मिलियन हो जाएगी। यह दर दो साल पहले 17.7 मिलियन थी। उसके अनुसार साल 2017-18 में भारत में बेरोजगारी की दर 3.4 प्रतिशत रह जाएगी।

(लेखक सेवानिवृत्त आईएफएस हैं, यह उनके निजी विचार हैं)