बेईमानों का अड्डा बन चुका है यूपी का शिक्षा विभाग

  • शिक्षा के बजट के नाम पर सरकारें भी जमकर लूट करती है।
  • शिक्षा के नाम पर जारी भारी भरकम बजट में 40 प्रतिशत लोग ही पोस्ट होते हैं।
  • जायज है उतनी रकम ही खर्च होगी।
  • बचे 60 प्रतिशत रकम को मंत्री-अफसर अपने हिसाब से औने-पौने खर्च कर देते हैं।

‘भ्रष्ट अफसरों के कारण शिक्षा बदहाल’

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। शासन से मिली खबरों की मानें तो जल्द ही प्राइवेट स्कूलों और सरकारी स्कूलों के नियमों में बदलाव होने वाले हैं। प्राइवेट स्कूलों में बढ़ती फीस पर लगाम लगाने के लिए योगी सरकार कानून में नए प्रावधान लाने की तैयारी भी जोर-शोर से कर रही है। इन सारे प्रयासों के बावजूद अफसरों ने सेंटर और नकल के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे कर डाले। ऐसा कहा जा रहा है कि सरकार स्कूलों में शैक्षिक स्तर बढ़ाने के लिए करोड़ों रुपये फूंकने जा रही है, लेकिन इसका जमीनी फायदा होगा, विशेषज्ञ इस पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। प्राथमिक विद्यालय आज भी बच्चों व शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं, जिसका खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है। शिक्षक बच्चों की पढ़ाई के प्रति जरा भी गंभीर नहीं दिख रहे हैं। स्कूल में जहां शिक्षिकाएं आपस में बैठकर गुफ्तगू करने में मस्त रहती हैं, वहीं शिक्षक घंटों तक मोबाइल पर बात करने में जुटे रहते हैं। स्वच्छ भारत मिशन के जमाने में कई विद्यालय ऐसे हैं, जो गंदगी के ढेर पर चल रहे हैं। इन्हीं मुद्दों पर दफ्तर में बहस हो रही थी, तभी सम्पादक मंडल के अध्यक्ष प्रहलाद मिश्र ने शिक्षक नेता उमेश द्विवेदी का नाम लिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने और शिक्षा जगत में व्याप्त बुराई को दूर करने के लिए वह निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। अभी १५ मई को ही उन्होंने वित्त विहीन शिक्षकों के मानदेय और सेवा नियमावली पर राजधानी में महासंघ के शिक्षकों का बड़ा जमावड़ा भी कर चुके हैं। अब यह तय हुआ कि शिक्षा पर काम करने वाले उन सभी शिक्षक नेताओं से बातचीत की जाए, लेकिन शुरुआत उमेश द्विवेदी से की गई। ओसीआर के कमरा नम्बर 405 में नया लुक ने शिक्षा और शिक्षा से जुड़े कई विषयों पर उनसे लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के खास अंश…

क्या बिना धरना-प्रदर्शन कोई काम होता है?
उमेश: यह प्रश्न मैं खुद कई बार उठा चुका हूं। अब एक गरीब लड़की के साथ रेप हो, पुलिस कतई एफआईआर नहीं लिखेगी। एफआईआर तब लिखा जाएगा, जब गांव के 500 आदमी आकर थाना घेर लेंगे और धरना प्रदर्शन करेंगे। पुलिस वही है, अगर वह पीडि़त को देखकर कार्रवाई कर दे तो धरना प्रदर्शन की कहां जरूरत है। आज जो 90 प्रतिशत धरना प्रदर्शन हो रहे हैं, इसलिए कि अधिकारी अपने में व्यस्त है और नेता अपने में।

आखिर इस परेशानी के जनता को कब निजात मिलेगी?
उमेश: मैं एक बार हाऊस में मांग उठाना चाह रहा था। मेरे हिसाब से एक प्रकोष्ठ का गठन हो जाए और सक्षम अधिकारी बैठे और सबकी वाजिब समस्याओं को सुनने के बाद उसका निस्तारण करें। वह साफ-साफ बताएं कि ये हो सकता है या नहीं? इससे सरकार को रोज-रोज के धरना प्रदर्शन से मुक्ति मिल जाएगी।

आखिरकार शिक्षा में सुधार कैसे होगा?
शिक्षा में सुधार कैसे हो, इस बारे में अधिकारियों ने सोचना ही छोड़ दिया है। किन कार्यों के करने से पैसे मिलेंगे, केवल यह सोच कार्य कर रही है। वह केवल कमीशन वाले कार्यों पर ही ध्यान देते हैं। पिछली सरकार हो या उससे पहले की सरकारें सभी अफसर केवल कमाई पर ध्यान देते थे। अब आप पूर्व सीएम अखिलेश सरकार में अफसरों की कारस्तानी पर नजर डालें। अफसरों ने तय किया कि ज्यादा से ज्यादा राजकीय विद्यालय खोले जाएं। उनका यह कदम स्वागतयोग्य है। लेकिन गांव-गांव राजकीय विद्यालय खोल देने से क्या शिक्षा में सुधार हो जाएगा? पूर्व मुख्यमंत्री ने कई विद्यालय खोले, लेकिन उसमें न तो टीचर पोस्ट हो पाए और न ही चपरासी, बिल्डिंग बनाकर वह कैसे शिक्षा सुधार सकते हैं?
उमेश: अस्सी के दशक में जब मैं पढ़ता था तो प्राइमरी स्कूल में केवल एक कमरा ही हुआ करता था। कहीं-कहीं पेड़ के नीचे क्लास चलती थीं। पूर्व डीजीपी बृजलाल ने हमें अपना वाकया सुनाया था। वह बता रहे थे कि हम लोग पेड़ के नीचे ही प्राथमिक शिक्षा प्राप्त किए हैं। आज हम केवल बड़ी-बड़ी बिल्डिंग बना रहे हैं। टीचर नहीं है, लेकिन क्लासेंज चल रही हैं।

आपने इस तरफ कोई कार्य किया?
अभी कुछ दिन पहले की बात है, विधाई समिति की ओर से जांच करने मैं सोनभद्र गया था। उस जिले में 37 विद्यालय राजकीय हैं और केवल नौ विद्यालय सरकार द्वारा सहायता प्राप्त हैं। 37 राजकीय विद्यालयों में से सात ऐसे विद्यालय हैं, जहां एक भी टीचर नहीं है। 15-17 स्कूलों में एकल टीचर हैं और जहां हैं भी वहां भी स्थिति बड़ी भयावह है। इंटर स्तर की पढ़ाई के लिए जो शिक्षक तैनात हैं, उनकी क्षमता महज हाईस्कूल तक पढ़ा पाने की है। यानी शिक्षक हैं, लेकिन प्रवक्ता नहीं है। अब आप बताइए शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? पढ़ाने के लिए टीचर की व्यवस्था तो सरकार को करना चाहिए। मैंने हाउस में सवाल लगाया था। अमेठी में एक विद्यालय हैं, जहां नौ प्रवक्ता का पद है और एक भी प्रवक्ता की नियुक्ति नहीं है। सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। टीचर की सेलरी से सरकार को कोई फायदा होने वाला नहीं है।

सुना है आपके वहां चपरासी नियुक्ति में बड़ा घालमेल होता है?
उमेश: नियम है कि एडेड विद्यालय में अनुसेवक प्रबंधक देगा। अब आप बताइए एडेड विद्यालय में वह क्या कर सकता है। फीस आपने बंद कर दिया तो वह किस स्रोत के अनुसेवक नियुक्त करेगा।

मान्यता के नाम पर भारी खेल हो रहा है?
उमेश: वित्त विहीन विद्यालयों में मान्यता के नाम डीआईओएस भारी लूट-खसोट का धंधा करता है। पिछली सरकार में 15 लाख से 40 लाख रुपये लेकर शिक्षा अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी। अब जो इतनी मोटी रकम देकर पोस्टिंग पा रहा है, वह विद्यालयों का शोषण कैसे नहीं करेगा। अब ऐसे शिक्षा कैसे सुधरेगी। नकल की समस्या भी यहीं से पनपी है। सरकार बदलते ही जिले के अधिकारियों में होड़ लगी कि सरकार की चमचागीरी करके विद्यालयों का केंद्र डीबार कर दें। उसमें भी वसूली हुई, जिसने मोटा पैसा दे दिया, उसे छोड़ दिया गया बाकी लोगों के वहां जबरन पुर्जी फेककर उन्हें फंसा दिया गया और उनका विद्यालय डीबार हो गया। मेरी निजी जानकारी में कम के कम 10 विद्यालय ऐसे हैं।

आपने इस पर कभी आपत्ति जताई?
उमेश: हां, मैंने हाउस में सवाल उठाए। माध्यमिक शिक्षा में एक अफसर थे, जो बसपा शासनकाल में भी उसी कुर्सी पर जमे थे और सपा शासनकाल में भी।

अब वो कैसे शिक्षा में सुधार करेंगे?
उमेश: हो सकता है, जब शासन स्तर पर काम होंगे तो हर आदमी शासन तक नहीं पहुंच सकता। इसमें १० प्रतिशत भ्रष्टाचार हो सकता है, लेकिन ९० प्रतिशत भ्रष्टाचार रुक जाएगा। यहां तो डीआईओएस गाड़ी लेकर जाएगा और बोलेगा, यहां बहुत नकल हुई थी। अब आप या तो पैसे दीजिए या फिर सेंटर डीबार।

आपने नकल के खिलाफ कभी लड़ाई लड़ी क्या?
उमेश: साल 2007 से मैं नकल के खिलाफ लड़ता आया हूं। मेरी मांग है कि वित्त विहीन विद्यालयों के लिए नकल बंद होना जरूरी है। शासन हर साल सेंटर नीति बनाता है, उसमें साफ-साफ लिखा है कि एडेड और शासकीय विद्यालय के सेंटर अनिवार्य रूप से वित्त विहीन मेंं जाएं, इससे ज्यादा खुला नकल का शासनादेश और क्या हो सकता है। हमने सचिव से पूछा कि इसका क्या मतलब है, वह मुस्कराकर टाल गए। सेंटर नीति में लिखा हुआ है कि सबसे पहले राजकीय में सेंटर बनाया जाएगा। साल 2009 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र ने कहा कि जो विद्यालय 100 प्रतिशत रिजल्ट लाएंगे, उनके प्राचार्यों को पुरस्कृत करेंगे। वहां नाम पुकारा गया तो हुसैनाबाद राजकीय विद्यालय की प्रिंसिपल आएं और अपना सम्मान लें। मुझे शक हुआ कि राजकीय विद्यालय में 100 प्रतिशत? मैंने पूछा- आपका विद्यालय हाईस्कूल तक है या इंटर तक? उन्होंने कहा- इंटर तक? मैंने पूछा कितनी छात्राएं थीं? वह हंसने लगीं और बोली- एक। ऐसे विद्यालयों को ही पहले केंद्र बनाया जाता है। अब अफसरों को कौन समझाएं कि जो ज्यादा बच्चों को पढ़ाता है, उसके वहां ही सेंटर होना चाहिए।

कई विद्यालयों के मैनेजर अब विधायक हैं, क्या वो नकल के खिलाफ खड़े होंगे?
उमेश: सवाल यह है उन्हें किसने पनपने दिया। भ्रष्ट अधिकारियों और दलालों ने। प्रदेश में सामाजिक संबंधों का अवमूल्यन हो चुका है। भ्रष्टाचार करने वाले किसी अफसर पर कार्रवाई हुई क्या? नहीं हुई

9/4 में जो मान्यताएं हुई थीं, उसमें क्या हुआ?
उमेश: उसमें तीन साल की शर्त दी गई थी। वह ठीक था, आपको मान्यता दी जा रही है, तीन साल में आप अपना इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर लीजिए, लेकिन तीन साल में काम पूरा नहीं हुआ तो अधिकारी को चाहिॅए कि काम बंद कर दे।

क्या कुछ स्कूल बंद हुए?
उमेश : नहीं हुए और होंगे भी नहीं। शिक्षा में इतना बड़ा भ्रष्टाचार है, लेकिन क्या शिक्षा का एक भी अफसर नपा क्या? यहां सरकारें अफसरों के आगे नतमस्तक हैं। वो कोई कार्रवाई क्यों करेंगे?

नए विद्यालयों में जहां इंफ्रा की कमी है, वहां सरकार क्यों मदद नहीं कर रही है।
उमेश: सरकार क्यों मदद करेगी। मैं पहले भी कह चुका हूं, नई बिल्डिंग बनाने में सरकार को पैसे मिलते हैं, वह बिल्डिंग बनाने के बारे में ही सोचेगी। यहां तो कुएं में ही भांग पड़ी हुई है। एक बार में मलिहाबाद गया, वहां पता चला कि इस स्कूल में चार हजार छात्र पढ़ते हैं। बड़ी चिंता हुई 10 कमरों के विद्यालय में चार हजार बैठते कैसे होंगे? आप सोच लीजिए, जवाब मिल जाएगा।

सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड पर राज्य सरकार असहाय नजर आती हैं, ऐसा क्यों?
उमेश: सरकार की ओर से एंग्लो इंडियन बीएसए होता है। लेकिन वह उनके हाथों बिक जाता है। फिर भी सरकार चाहती तो कार्रवाई करती। एनओसी देने का अधिकार इन्हीं के पास होता है। लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि इनके विद्यालय में आईएएस/आईपीएस अफसरों की पत्नियां पढ़ाती हैं, वह उन पर कार्रवाई कैसे करने दे सकती हैं?

आपके महासंघ की मुख्य मांग क्या है?
उमेश: हमारी मांग है कि जब वित्त विहीन शिक्षक वास्तविक रूप में पूर्णकालिक शिक्षक के रूप में कार्य कर रहे हैं तो उन्हें अंशकालिक शिक्षक की बजाय पूर्णकालिक शिक्षक स्वीकार किया जाए।

बदहाल शिक्षा कैसे पटरी पर आएगी?
उमेश: शिक्षक-छात्र अनुपात बिना ठीक किए शिक्षा व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला। इसके अलावा बेइमान अधिकारियों को पद से हटाना पड़ेगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो शिक्षा समाज में मानवीय मूल्यों का क्षरण हो जाएगा।

कौन हैं उमेश?

शिक्षक नेता उमेश द्विवेदी के साथ अरुण त्रिपाठी राम इकबाल बहादुर सिंह और अन्य शिक्षक नेता

प्रतापगढ़ के लालगंज, हजारा में पं. सूर्यनारायण द्विवेदी के घर जन्में उमेश की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल से शुरू हुई। उन्होंने एमए की पढ़ाई पूरी कर रायबरेली के ऊंचाहार चले आए और सरस्वती शिशु मंदिर ज्वाइन कर लिया। वह साल 1991 में सरस्वती शिशु मंदिर फाउंडर प्रिंसिपल रहे। अपने कर्तव्यों के निर्वहन में आ रही परेशानियों से आजिज होकर उन्होंने शिक्षक राजनीति के क्षेत्र में कदम रखा और शिक्षकों की समस्याओं के लिए संघर्ष करते रहे। वह बड़े सहज लफ्जों में कहते हैं कि जिला विद्यालय निरीक्षकों के अपमान ने मुझे एमएलसी बनाया है। अगर वह परेशान न करते तो मैं राजनीति के क्षेत्र में कदम भी न रखता। साल 2006 में उन्होंने वित्त विहीन शिक्षक महासंघ का गठन किया और तत्कालीन कमिश्नर विजय शंकर पांडेय के खिलाफ प्रदर्शन करने चल पड़े। उसी विरोध ने उन्हें सूबे के करीब 2.5 लाख वित्त विहीन शिक्षकों का निर्विवाद नेता बना दिया। साल 2008 में महज 25वोट पाने वाले उमेश वर्ष 2014 में लखनऊ-रायबरेली क्षेत्र से शिक्षक विधायक चुने गए।