कर-नाटकः न जीत की खुशी, न हारने का गम

  • दोनों पार्टियां मना रहीं अपने-अपने जीत का जश्न
  • नहीं चला नरेंद्र मोदी और अमित शाह का जादू
  • ताश के पत्तों की तरह ढह गई बीजेपी की रणनीति

पिछले चार साल से छोटी-छोटी सियासी बाजी हारने वाली कांग्रेस के लिए आज जश्न का दिन है। यह जश्न इसलिए भी क्योंकि उसने अपनी विपक्षी पार्टी के चाणक्य को उसी के मंत्र से हराया है। जिसका परिणाम भी सामने है। बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री के शपथ पत्र तक पहुंचे, लेकिन कुर्सी से छिटक गए और सीटों के मामले में उनसे 44 कदम पीछे वाली कांग्रेस बाज़ी जीत ले गई। हालांकि कांग्रेस को यह दांव जीतने के लिए मुख्यमंत्री पद की क़ुर्बानी भी देनी पड़ी।

अनिल कुमार

लखनऊ। घड़ी की सुइयां करीब साढ़े तीन बजा रही थीं और कर्नाटक के सीएम बीएस येदियुरप्पा का भाषण हो रहा था। भाजपाई रीति-नीति, रणनीति और विचारधारा के जानकार येदियुरप्पा का चेहरा फक पड़ा था और उनके भाषण में नरमी बढ़ती जा रही थी। जैसे-जैसे उनका भाषण आगे बढ़ रहा था राजनीतिक गलियारों में खुसुर-पुसुर बढ़ रही थी कि कर्नाटक में बीजेपी के चाणक्य अपना जलवा नहीं बिखेर पाए। यूं कहें बीजेपी के हारने की पटकथा वहीं से पढ़ी जाने लगी थी।

बताते चलें कि कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा के जनादेश आने के एक दिन बाद यानी बुधवार की रात को राज्यपाल वजुभाई वाला ने 117 विधायकों वाले कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की बजाय भाजपा को सरकार बनाने का निमंत्रण देने का फैसला किया था। कांग्रेस ने उसी रात सुप्रीम कोर्ट में राज्यपाल के फैसले को चुनौती दी। पूरी रात चली विशेष सुनवाई के बाद कोर्ट ने येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण समारोह पर रोक नहीं लगाई, लेकिन कहा कि यह मामले की सुनवाई जारी रखेगा। सुबह करीब साढ़े तीन बजे तक चली कोर्ट ने “विधायकों की खरीद-फरोख्त” पर चिंता भी जाहिर की थी।

जीत के चंद घंटों बाद ही सरकार बनाने का दावा करने वाले येदियुरप्पा को यह भलीभांति मालूम था कि गोवा, मणिपुर, बिहार, जम्मू-कश्मीर जैसे तमाम राज्यों में बीजेपी ने कैसे सरकार बनाई है, इसलिए चुनावी नतीजे आने के पहले ही उन्होंने खुद को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया था। चंद घंटों बाद ही उन्होंने तीसरी बार कर्नाटक के सीएम पद की शपथ ले डाली, लेकिन उनके शपथ ग्रहण समारोह में पहले जैसी धूम नहीं दिखी। पीएम नरेन्द्र मोदी और भाजपाध्यक्ष अमित शाह समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्री और कद्दावर नेता इस समारोह से गायब थे। यानी बीजेपी के रणनीतिकारों को पहले से ही अंदेशा था कि बीजेपी इस बार अपनी मंशा में कामयाब नहीं हो पाएगी। यदि भाजपा स्पष्ट बहुमत पाती तो येदियुरप्पा उस ठाठ से शपथ लेते, जिसे लोग साल 2019 के लोकसभा चुनाव तक जरूर याद रखते। लेकिन गुरुवार की सुबह इवेंट मैनेजमेंट वाली शादी नहीं दिखी। उनकी जगह कोर्ट मैरिज जैसा नजारा दिखा और बीएस ने ईश्वर और किसानों के नाम की शपथ ली।

येदियुरप्पा का यह आत्मविश्वास अमित शाह जैसे दिग्गज रणनीतिकारों के कारण था, जिन्हें मालूम है कि सत्ता कैसे हासिल की जाती है और न मिले तो कैसे छीनी जाती है। सीएम पद से इस्तीफा देने वाले येदियुप्पा दोहाई दे रहे हैं कि कांग्रेस-जदएस का गठबंधन अनैतिक है। लेकिन उनका मिजाज़ भी फकीराना नहीं है। अगर नैतिकता की थोड़ी सी चिंता होती तो वह सत्ता को ठोकर मार देते। उनकी इसी जल्दबाजी के चक्कर में सत्ता की बिसात पर भाजपा का दांव फेल हो गया और उसके चाणक्य कोने में दुबक गए।

इस जंग में अंतिम बाजी राहुल गांधी के हाथ लगी। उन्होंने कर्नाटक की निर्णायक जंग जीत ली। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ उसी हथियार का प्रयोग किया, जिसके बूते साल 2014 में बीजेपी ने अपने पक्ष में फ़िजा बनाया था। सोशल मीडिया पर गांधीवादी तरीके से कांग्रेस ने प्रचार किया और जनमानस में यह बात सीधे पहुंचाई कि बीजेपी लोकतंत्र का गला घोंटना चाह रही है। जीतने के बाद मीडिया के सामने नमूदार हुए राहुल ने अपने भाषण की शुरुआत में ही कहा कि बीजेपी लोकतंत्र का हत्या करना चाहती थी। आरएसएस की मदद से बीजेपी के लोग विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। जनता ने मुंहतोड़ जवाब दिया और बीजेपी की करारी हार हुई। इस जीत का नजारा यूपी कांग्रेस मुख्यालय से लेकर जिला स्तर तक दिखा। वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने जीत का जश्न मनाया। यह जायज भी है। उन्हें साल 2014 के बाद दूसरी बार जश्न मनाने का मौका मिला है। पहला मौका पंजाब के कैप्टन ने दिया तो दूसरा मौका उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष ने।

वहीं बीजेपी के एक नेता ने एक दिन पहले ही कह दिया था कि आलाकमान मेरी राय मानते तो मैं कांग्रेस और जद(एस) को सरकार बनाने का मौका देता। मजबूत विपक्षी होने के नाते उनकी हर कारस्तानी का विरोध करता और जनता में यह संदेश देता कि जिस पार्टी को जनता ने 122 से सिमटाकर 78 सीटों पर पहुंचा दिया, उस पार्टी ने दबी-कुचली पार्टी (जनता दल एस, कुल संख्या-38) के साथ आपके जनादेश को कुचल दिया और फिर से गद्दी पर बैठ गई। काश आलाकमान उनकी यह बात मान लेता तो पार्टी इस तरह करारी हार का सामना करने से बच जाती। हालांकि बीजेपी के आला अलम्बरदार यह जानते थे कि जोड़-तोड़ में माहिर उनका मुखिया या तो 14 विधायक अपने पाले में कर लेगा या फिर 14 को फ्लोर से गायब कर लेगा। लेकिन हर बार एक ही रणनीति किसी भी कारगर नहीं होती, और हुआ भी वही। कांग्रेस ने अमित शाह के इस दांव का काट निकाला और अपने विधायकों को सुरक्षित कर लिया। राजनीति को करीब से देखने वाले एक वरिष्ठ कहते हैं कि गुजरात राज्यसभा चुनाव के बाद तो विधायक बड़े नेताओं की कठपुतली हो गए हैं, उन्हें ऐसे छुपाया जाता है जैसे कोई नई-नवेली दुल्हन का नायाब हुस्न हो।

दो विधायकों के लापता होने की सनसनी भी रही चर्चा में

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर करवाए जा रहे शक्ति परीक्षण से एक घंटे पहले दो कांग्रेसी विधायकों के लापता हो जाने की खबर टीवी चैनलों पर लगातार चल रही थी। कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बहुमत हासिल करने के लिए बेताब बीजेपी ने उन्हें “बंधक” बना रखा था। कांग्रेस ने एक के बाद एक कई ऑडियो टेप जारी की। जिसमें दावा किया गया कि इनसे साबित हो गया कि विधायकों को रिश्वत देने की कोशिश की जा रही थी।

बदला दिखा राहुल का अंदाज

एक वरिष्ठ राजनीतिक पंडित कहते हैं कि अब राहुल में संजीदगी दिख रही है। वो पहले जैसे नहीं हैं। कर्नाटक में प्रचार के दौरान उन्होंने अपनी जुबान को काबू में रखा। अब यह दिखने लगा है कि कांग्रेस की कमान पूरी तरह से उनके हाथों में हैं। उनकी मां (सोनिया) के पीछे खड़े होने वाले नेता अब उनके साथ खड़े हैं। गुलाम नबी आज़ाद, गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता उनके इशारे पर अपना सब कुछ दांव पर लगा रहे हैं।