महादेव को क्यों अति प्रिय है बिल्व पत्र?

  • सभी मनोकामना पूरी कर सकता है एक माह का बिल्व पूजन
  • रुद्र के अंश हनुमान को भी बेलपत्र से किया जा सकता है प्रसन्न

ज्योतिषाचार्य प्रदीप तिवारी/लखनऊ

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्।
त्रिजन्मपापसंहार, विल्वपत्र शिवार्पणम् ॥
तीन गुण, तीन नेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले और तीन जन्मों के पाप को संहार करने वाले हे शिवजी आपको त्रिदल बिल्व पत्र अर्पित करता हूं ।

पुराणों में उल्लेख है कि  समुद्र मंथन के समय जब ‘हलाहल’ निकला तो सभी देव परेशान हो उठे। उसी समय ब्रह्मा ने भगवान शिव को पुकारा। महादेव आए और सारा विष पी गए। विष पीने के बाद उनका गला जलने लगा तो सभी देव उनपर जल चढ़ाने लगे। जल से जब उनके गले की जलन शांत नहीं हुई तो देवताओं ने उन्हें बिल्वपत्र खिलाना शुरू कर दिया, जिसके प्रभाव से महादेव के ऊपर चढ़ रही हलाहल की ज्वाला मंद पड़ गई। कहा जाता है कि तभी से देवादिदेव को बिल्व पत्र अत्यधिक प्रिय हो गया। वहीं दूसरी कथा के अनुसार बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में ‘स्कंदपुराण’ में कहा गया है कि एक बार देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं।

तीसरी कथा के अनुसार बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति लक्ष्मीजी द्वारा स्तन काटकर चढ़ाने से हुई। लक्ष्मीजी ने भगवान विष्णु को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए शिवजी का घोर आराधन व तप किया। अंत में लक्ष्मीजी ‘ॐ नम: शिवाय’ इस पंचाक्षर मन्त्र से एक सहस्त्र कमलपुष्प द्वारा शिवजी का पूजन कर रहीं थीं तब शिवजी ने उनकी परीक्षा करने के लिए एक कमलपुष्प चुरा लिया। भगवान विष्णु ने जब एक सहस्त्र पुष्पों से शिवजी की अर्चना की थी, उस समय भी भगवान शिवजी ने एक कमल चुरा लिया था।  धर्मपुराण के अनुसार लक्ष्मीजी ने एक कमलपुष्प कम होने पर अपना बायां वक्ष:स्थल काटकर शिवजी पर चढ़ा दिया क्योंकि स्तन की उपमा कमल से की जाती है। जब लक्ष्मीजी अपना दायां वक्ष:स्थल भी काटने को उद्यत हुईं तब शिवजी प्रकट हो गए और लक्ष्मीजी से बोले–’तुम ऐसा मत करो, तुम समुद्र-तनया हो।’

ऐसा माना जाता है कि शिव की आराधना करने से सभी मनोकामना पूरी हो जाती है। भगवान शंकर को बिल्वपत्र अर्पित करने से मनुष्य की सभी मनोकामना सिद्ध होती हैं। श्रावण में बेल पत्र अर्पित करने का विशेष महत्व शास्त्रो में बताया गया हैं। इस पत्र का भगवान शंकर के पूजन में विशेष महत्व है जिसका प्रमाण शास्त्रों में मिलता है। बिल्वाष्टक और शिव पुराण में इसका उल्लेख भी आसानी से पढ़ा जा सकता है। अन्य कई ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। भगवान शंकर एवं पार्वती को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व है।

शिवलिंग पर कैसे चढ़ाएं बेलपत्र 

  • बिल्वपत्र 3 से लेकर 11 दलों तक के होते हैं। ये जितने अधिक पत्र के हों, उतने ही उत्तम माने जाते हैं।
  • पत्तियां कटी या टूटी हुई न हों और उनमें कोई छेद भी नहीं होना चाहिए।
  • शिव जी को बिल्वपत्र अर्पित करते समय साथ ही में जल की धारा जरूर चढ़ाएं। बिना जल के बिल्वपत्र अर्पित नहीं करना चाहिए।
  • महादेव को बेलपत्र हमेशा उल्टा अर्पित करना चाहिए, यानी पत्ते का चिकना भाग शिवलिंग के ऊपर रहना चाहिए।
  • बिना जल के बेलपत्र अर्पित नहीं करना चाहिए । बेलपत्र में चक्र और वज्र नहीं होना चाहिए।
  • कीड़ों द्वारा बनाये हुए सफ़ेद चिन्ह को चक्र कहते हैं एवम् बिल्वपत्र के डंठल के मोटे भाग को वज्र कहते हैं ।

बेलपत्र तीन से लेकर 11 दलों तक के होते हैं , यह जितने अधिक पत्र के हों, उतने ही उत्तम माने जाते हैं। अगर बेलपत्र उपलब्ध न हो, तो बेल के वृक्ष के दर्शन ही कर लेना चाहिए ,  उससे भी पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं । शिवलिंग पर दूसरे के चढ़ाए बेलपत्र की उपेक्षा या अनादर नहीं करना चाहिए ।

बेलपत्र न मिले तो आजमा सकते हैं यह उपाय

  • बिल्वपत्र मिलने की मुश्किल हो तो उसके स्थान पर चांदी का बिल्व पत्र चढ़ाया जा सकता है जिसे नित्य शुद्ध जल से धोकर शिवलिंग पर पुनः स्थापित कर सकते हैं ।
  • भगवान शिव के अंशावतार हनुमान जी को भी बेल पत्र अर्पित करने से प्रसन्न किया जा सकता है और लक्ष्मी का वर पाया जा सकता है। घर की धन-दौलत में वृद्धि होने लगती है।
  • अधूरी कामनाओं को पूरा करता है सावन का महीना शिव पुराण अनुसार सावन माह के सोमवार को शिवालय में बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ कन्यादान के बराबर फल मिलता है।

क्यों विशेष फलदायी है बिल्व वृक्ष

घर में बिल्व वृक्ष लगाने से परिवार के सभी सदस्य कई प्रकार के पापों के प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं। इस वृक्ष के प्रभाव से सभी सदस्य यशस्वी होते हैं, समाज में मान-सम्मान मिलता है। ऐसा शिवपुराण में बताया गया है।

मृतोद्धव श्रीवृक्ष महादेवप्रिय: सदा।

गृहामि तव पत्रणि श्पिूजार्थमादरात्।।

यानी अमृत से उत्पन्न सौंदर्य व ऐश्वर्यपूर्ण वृक्ष महादेव को हमेशा प्रिय है। भगवान शिव की पूजा के लिए हे वृक्ष मैं तुम्हारे पत्र तोड़ता हूँ ।

कब न तोड़ें बेल की पत्तियां

अमारिक्तासु संक्रान्त्यामष्टम्यामिन्दुवासरे ।
बिल्वपत्रं न च छिन्द्याच्छिन्द्याच्चेन्नरकं व्रजेत॥
अमावस्या, संक्रान्ति के समय, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथियों तथा सोमवार के दिन बिल्व-पत्र तोड़ना वर्जित है। विशेष दिन या विशेष पर्वो के अवसर पर बिल्व के पेड़ से पत्तियां तोड़ना निषेध हैं।

  1. शास्त्रों के अनुसार बेल की पत्तियां सोमवार के दिन नहीं तोड़ना चाहिए।
  2. चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या की तिथियों को नहीं तोड़ना चाहिए।
  3. बेल की पत्तियां संक्रांति के दिन नहीं तोड़ना चाहिए।
  4. टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़ना चाहिए।
  5. पत्र इतनी सावधानी से तोड़ना चाहिए कि वृक्ष को कोई नुकसान न पहुंचे ।
  6. बेलपत्र तोड़ने से पहले और बाद में वृक्ष को मन ही मन प्रणाम कर लेना चाहिए।

दोबारा धोकर चढ़ा सकते हैं बिल्व पत्र

शास्त्रों में विशेष दिनों पर बिल्व-पत्र तोड़कर चढ़ाने से मना किया गया हैं तो यह भी कहा गया है कि इन दिनों में चढ़ाया गया बिल्व-पत्र धोकर पुन: चढ़ा सकते हैं।
अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।
शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि चित् ॥
अगर भगवान शिव को अर्पित करने के लिए नूतन बिल्व-पत्र न हो तो चढ़ाए गए पत्तों को बार-बार धोकर चढ़ा सकते हैं।

प्रकृति की अनमोल देन है बेल पत्र

  • रविवार और द्वादशी तिथि एक साथ होने पर बिल्ववृक्ष का विशेष पूजन करना चाहिए। इस पूजन से महापाप से भी मुक्त हो जाते है। धन की कमी दूर होती है।
  • बिल्व का वृक्ष घर के उत्तर-पश्चिम में हो तो सुख-शांति बढ़ती है और बीच में हो तो जीवन मधुर बनता हैं। किसी भी दिन और तिथि पर खरीदकर लाया हुआ बिल्वपत्र हमेशा ही पूजन में शामिल किया जा सकता है।
  • जिस तरह सफेद सांप, सफेद टांक, सफेद आंख, सफेद दूर्वा आदि होते हैं उसी तरह सफेद बिल्वपत्र भी होता है। यह प्रकृति की अनमोल देन है। इस बिल्व पत्र के पूरे पेड़ पर श्वेत पत्ते पाए जाते हैं। इसमें हरी पत्तियां नहीं होतीं। इन्हें भगवान शंकर को अर्पित करने का विशेष महत्व है।
  • शिवपुराण में बताया गया है जिस स्थान पर बिल्ववृक्ष है, वह स्थान काशी तीर्थ के समान पूजनीय और पवित्र है। ऐसी जगह जाने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • बेल के पेड़ की जरा सी जड़ सफेद धागे में पिरोकर रविवार को पहनें इससे रक्तचाप, क्रोध और असाध्य रोगों से निजात मिलेगा । मधुमेह व पेट के रोगियों को विल्व पत्र का सेवन करना चाहिए ।