महालक्ष्मी पूजन की सारी विधि एक क्लिक पर, ऐसे करें पूजा और पाएं मनोवांछित फल

आचार्य प्रदीप तिवारी

भगवती महालक्ष्मी चल और अचल संपत्तियों सिद्धियों एवं निधियों की अधिष्ठात्री साक्षात नारायणी ही है। कलो चंडी विनायको सूत्र के अनुसार गणेश जी समस्त विघ्न को हरण करने वाले और सभी अमंगलों के नाशक हैं, इसलिए कार्तिक अमावस्या के दिन शुभ लगन देखकर श्रद्धा और पवित्रता के साथ गणेश जी की और लक्ष्मी जी का पूजन करना चाहिए। इस दिन घर में विशेष लक्ष्मी-गणेश पूजन करने से सुख शांति एवं समस्त प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है और वर्ष भर धन-धान्य की कोई कमी नहीं रह जाती। लखनऊ के मशहूर ज्योतिषाचार्य प्रदीप तिवारी से जानिए इस बार कैसे करें दिवाली के पावन पर्व पर मां महालक्ष्मी और विघ्नहर्ता सिद्धि विनायक की पूजा…।

इस बार 59 साल बाद दिवाली पर कई लाभकारी संयोग बन रहे हैं। गुरु और शनि का दुर्लभ योग बन रहा है। दिवाली पर देव गुरु बृहस्पति, मंगल के स्वामित्व वाली वृश्चिक राशि में रहेंगे। वहीं, त्रिग्रही और आयुष्मान, सौभाग्य योग के कारण दीपावली व्यापार, राजनीति और नौकरी करने वालों के लिए अधिक मंगलकारी होगी। उद्योग जगत को दिवाली पर ग्रहों का गिफ्ट मिलेगा। व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर दिवाली पूजन के कई मुहूर्त हैं।

जानिए कब-कब है पूजन का मुहुर्त-

घरों पर दिवाली के पूजन का मुहूर्त  सायं 5.27  बजे से 8.06  बजे है। यह अवधि 1 घंटा 59 मिनट यानी लगभग दो घंटे रहेगी। घर में सुख शांति के लिए प्रदोषकाल के दौरान स्थिर लग्न कुंभ और वृषभ लग्न में करना चाहिए। इसी में लक्ष्मी जी का वास माना गया है। वहीं व्यावसायिक स्थलों पर पूजन मूहूर्त प्रदोषकाल में शाम 5.30 से रात 8.16 बजे तक है। शुभ की चौघड़िया मुहुर्त शाम 7.08 से रात 8.46 बजे तक और अमृत की चौघड़िया लग्न- रात्रि 8.46 से 10.23 बजे तक है। व्यापार वृद्धि के लिये 5 कौडी 5 कमलगट्टे देवी को अर्पित करें। इनको अगली दिवाली तक रखा रहने दें। प्रदोषकाल में सायं 5.27 से 8.06 तक शुभ चौघड़िया मुहूर्त है। इसके बाद ही घर में दीप जलाएं,  दीपमालिकाएं सजाएं और दीपदान करें।

इसके अलावा लग्न के अनुसार पूजन करे वाले इस प्रकार पूजन करें।

धनु लग्न : उद्योग, प्रतिष्ठान में लक्ष्मी पूजन धनु लग्न में श्रेष्ठ रहेगा। दीपावली पर धनु लग्न सुबह 9.24 से 9.39 बजे तक रहेगी।

कुंभ लग्न : कुंभ लग्न दोपहर 1.35 बजे से 2.53 तक रहेगी। इस समय माता लक्ष्मी-गणेश, त्रिदेव, नवग्रह, कुबेर, रिद्धि-सिद्धि, बही खाता, कलम दवात का पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा।

मेष लग्न : शाम 4.19 बजे से शाम 5.54 बजे तक मेष लग्न रहेगी। यह लग्न सूर्य, चंद्र और शुक्र से प्रभावित होकर अत्यंत सुखद रहेगी। इस लग्न में गोधूलि बेला और प्रदोष बेला का समागम जातकों को सफलता दिलाएगा।

वृषभ लग्न : यह लग्न शाम 5.54 बजे प्रदोष के समय शुरू होकर शाम 7.50 बजे तक रहेगा। वृष लग्न में बुध, गुरु की सप्तम दृष्टि तथा मंगल की चौथी दृष्टि पड़ेगी जो भौतिक विकास में सहायक होगी।

मिथुन लग्न : यह लग्न शाम 7.50 बजे से शुरू होकर रात 10.45 बजे तक रहेगी। इस लग्न पर शनि का सीधा प्रभाव पड़ने से उद्योग संचालकों पर लक्ष्मी की विशेष कृपा रहेगी।

कर्क लग्न : रात 10.45 बजे से 12.23 बजे तक रहेगी। इस लग्न में पूजन करने से कामों में उन्नति मिलती है।

सिंह लग्न : मध्य रात्रि 12.46 बजे से रात 3.02 बजे तक सिंह लग्न रहेगी। इस समय मां लक्ष्मी शेर पर सवार होकर भक्त के घर आती हैं।

गोधूलि बेला : शाम 5.48 बजे से रात 8.12 बजे तक गोधूलि बेला रहेगी….

धन प्राप्ति मन्त्र- ॐ ह्रीं श्रीं श्रीं महालक्ष्मी नमः।

विद्या प्राप्ति मन्त्र- ॐ ऐं

व्यापार वृद्धि- ॐ गं गं श्रीं श्रीं श्रीं मातृ नमः

शुभ दीपावली पर कैसे करें महालक्ष्मी, गणेश और कुबेर की पूजा-

पहले पूजन की समस्त सामग्री एकत्रित कर लें ताकि पूजन में किसी प्रकार की दिक्कत असुविधा न हो। यह सामग्री इस प्रकार है- अक्षत, दूध, दही, घी, शहद, चीनी, पंचामृत, गंगाजल, या शहद जल, वस्त्र मूर्तियों के लिए, यज्ञोपवीत ( जनेऊ ), चंदन केसर युक्त लाल, चंदन, सिंदूर, कुमकुम, अक्षत, इतर, पुष्पमाला, कमल का फूल, धूप, दीप, नैवेद्य, फल खासकर अनार का फल, लक्ष्मी जी के लिए विशेष है। पान, सुपारी, लौंग, इलायची और दीपों की माला, कर्पूर इसके पश्चात अपने लिए मूर्ति के लिए सुआसन अपने लिये ऊन आसन का प्रयोग सर्वोत्तम माना जाता है।

सर्वप्रथम ॐ अपवित्रःपवित्रो वा सर्वावस्थां गतोअपि वा। ऊँ यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः। इसके बाद भगवान नारायण का तीन बार स्मरण करें, फिर प्रधान दीपक को प्रज्वलित करें उस पर पुष्प अक्षत चढ़ा दें और नमस्कार करें और हाथ में अक्षत लेकर संकल्प करें। देववाणी में इस प्रकार से संकल्प है-

ॐ विष्णुः विष्णुःविष्णुः कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे पूण्यायामं अमावस्यायां तिथौ बुधवासरे गोत्रोत्पन्नः नाम अहम श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलावाप्ति कामनया स्थिर लक्ष्मी प्राप्तये श्रीमहालक्ष्मी विशेष अनुकंपा प्राप्ते प्रीत्यर्थं श्री गणपति गौरी सहित कुबेर आदि देवा नाम यथाज्ञानेन पूजनं अहम करिष्ये ।

उसके बाद गणेश-लक्ष्मी प्रतिमा के साथ उनके मध्य भाग में एक सुपारी पर कलावा लपेटकर गौरी के प्रतीक रूप में भी स्थापित करें, फिर इन तीनों का ध्यान करते समय पुष्प अक्षत जरूर रखें और यह मंत्र पढ़ें-

गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थजम्बूफलचारूभक्षणम उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपक्ङजम।

उसके बाद गौरी जी का ध्यान करते हुए

ॐ नमोदव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताःस्म ताम्।

हाथ में रखे हुए पुष्प अक्षत गणेश गौरी को चढ़ा दें, फिर श्री लक्ष्मी जी का ध्यान करें। पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी गम्भीरार्वनाभिस्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया,

या लक्ष्मीर्दिव्यरूपैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भैः सा नित्यं पद्महस्ता मम वस्तु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता।

इस मंत्र को पढ़ें और ध्यान करते हुए महालक्ष्मी को पुष्प अक्षत अर्पण करें इन की प्राण प्रतिष्ठा करें ऊँ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च । अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन।

दूसरा मंत्र इस प्रकार है-

ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्य़ज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ गुंग समां दधातु विश्व देवास इह मादयन्तामो ऊँ म्प्रतिष्ठ
अक्षत को चढ़ाते हुए मन में कामना करें की गौरी लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि आसन के लिए सुंदर पुष्प अर्पित करे ऊँ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि।

जल से गंगाआदि तीर्थ सम्भूतं गंध पुष्प आदिभिर्युतम्। पाद्मं ददाम्यहं देव गृहाणाशु नमोअस्तु ते। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः। पादयोःपाद्म समर्पयामि। अर्घ्य गन्धपुष्पाक्षतैर्युत्कमर्घ्यं मया दत्तं प्रसन्नो वर्दी भव। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां ङनमः हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि।

आचमन दे कर्पूरेण सुगन्धे वासितं स्वादु शीतलम् तोयमाचमनीयार्थं गृहाण परमेश्वर। लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः। आचमनीयं जल समर्पयामि…

स्नान के लिए मन्दाकिन्यास्तु यद् वारि सर्वपापहरं शुभम्।

तदिदं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्ताम। ॐ

लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः स्थानों समर्पयामि।

दुग्ध स्नान करें और यह मंत्र जपें…

कामधेनुसमुत्पन्नं सर्वेषां जीवन परम्। पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानामर्पितम् । ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः पयः स्थानों समर्पयामि।

दधि स्नान इस तरह करें-

पयसस्तु समुद्भुतं मधुराम्लं शशिप्रभम। दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः। दधिस्नानं समर्पयामि।

घी स्नान-

नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम।

घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः घृतस्नानं समर्पयामि।

मधु से-

तरूपुष्पसमुद्भुतं सुस्वादु मधुरं मधु, तेजःपुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्ताम।

ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः मधुस्नानं समर्पयामि।

इसके बाद शर्करा स्नान कराया जाता है-

इक्षुसारसमुद्भुता शर्करा पुष्टिकारिका, मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः शर्करास्नानं समर्पयामि।

पंचामृतस्नानः

पयो दधि घृतं चैव मधुशर्करयान्वितम्, पन्चामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः पन्चामृतस्नानं समर्पयामि।

सुगंधित द्रव्यः

मलयाचलसम्भूतं चन्दनागरूस्मवम, चन्दनं देवदवेश स्नानार्थं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः गन्धोदकस्नानं समर्पयामि।

गंगाजलः

मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम्, तदिदं कल्पितं तुभ्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। इसके बाद आचमन जल अर्पित करें ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः।

वस्त्रः

शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम्, देहालक्ङणं वस्त्रमतः शान्तिं प्रयच्छ मे। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः वस्त्रोंवस्त्रम समर्पयामि, आचमनीयं जलं समर्पयामि। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः उपवस्त्र समर्पयामि आचमनीयं जलं समर्पयामि।

जनेऊ चढ़ाएं-

नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां

नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि।

कांस्य पात्र में दही और शहद मिलाकर के और घी के साथ महालक्ष्मी के सम्मुख रखें इसका विशेष महत्व है।

कांस्ये कांस्येन पिहितो दधिमध्वाज्यसंयुतः, मधुपर्को मयानीतः पूजार्थं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः मधुपर्कं समर्पयामि आचमनीयं जलं समर्पयामि। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः नानाविधानि कुण्डलकटकादीनि आभूषणनि समर्पयामि।

लाल चंदन-

चन्दनं गन्धं कर्पंरसंयुक्तं दिव्यं चन्दनमुत्तमम्, विलेपनं सुरश्रेष्ठ प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः गन्धं समर्पयामि। लालचन्दन ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः रक्तचन्दनं समर्पयामि।

सिन्दूर-

सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम, शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः सिन्दूरं समर्पयामि

कुङ्कुमं-

कुङ्कुमं कामदं दिव्यं कुङ्कुमं कामरूपिणम, अखण्डकामसौभाग्यं कुङ्कुमं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः कुङ्कुमं समर्पयामि।

अक्षत-

अक्षताश्च सर्वश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ताःसुशोभिताः, मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः अक्षतान् समर्पयामि।

इतर-

दिव्यगन्धसमायुक्तं महापरिमलाद्भुतम, गन्धद्रव्यमिदं भक्त्या दत्तं वै परिगृह्यताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः सुगन्धिततैलं पुष्पसारं समर्पयामि।

माला-

माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो। मयानीतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः पुष्प पुष्पमालां समर्पयामि।

दुर्वाः गणेश जी को दुर्वा चढ़ाएं दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि गं गणपतेय नमः।

8 पुष्पों में चंदन, इत्र, सिंदूर लगाकर अक्षत सहित महालक्ष्मी के प्रत्येक अंगों का पूजन करना चाहिए। ॐ चपलायै नमः पादौ पूजयामि। ॐ चन्चलायै नमः जानुनी पूजयामि। ॐ कमलायै नमः कटिं पूजयामि। ॐ कात्यायन्यै नमः नाभिं पूजयामि। जगन्मात्रै नमः जठरं पूजयामि। ॐ विश्ववल्लभायै नमः। वक्षःस्थलं पूजयामि। ॐ कमलवासिन्यै नमः मुखों पूजयामि। ॐ कमलपत्राक्ष्यै नमः नेत्रत्रयं पूजयामि। ॐ श्रियै नमः शिरः पूजयामि। ॐ महालक्ष्म्यै नमः सर्वाग्ङं पूजयामि।

इसके बाद आठ सिद्धियों का पूजन करें। प्रतीक के रूप में आठ कमल दाना आठों दिशाओं में लक्ष्मी जी के पास रखें। ॐ अणिम्ने नमः (पूर्वे)। ॐ महिम्ने नमः (अग्नकोणे)। ॐ गरिम्णे नमः (दक्षिणे )। ॐ लघिम्ने नमः। (नैर्ॠत्ये)। ऊँ प्राप्त्यै नमः (पश्चिमे) । ॐ प्राकाम्यै नमः (वायव्ये)। ॐ ईशितायै नमः (उत्तरे)। ॐ वशितायै नमः (ऐशान्याम)।

अष्टलक्ष्मी यों का इसी प्रकार से आठों दिशाओं में पूजन करना चाहिए प्रतीक के रूप में सुपारी या चांदी के सिक्के रखने चाहिए। ॐ आद्यलक्ष्म्यै नमः। ॐ विद्यालक्ष्म्यै नमः। ॐ सौभाग्यलक्ष्म्यै नमः। ॐ अमृतलक्ष्म्यै नमः। ॐ कामलक्ष्म्यै नमः। सत्यलक्ष्म्यै नमः। ॐ भोगलक्ष्म्यै नमः। ॐ योगलक्ष्म्यै नमः।

आठ पुष्पों में चंदन, इत्र, सिंदूर, रोली, अक्षत के साथ आठों सिद्धियों और आठ और लक्ष्मियों पर चढ़ाएं और नमस्कार करें।

धूप-

वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यः सुमनोहरः, आर्घेयः सर्वदेवानां धंपोअयं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः। धूपमाघ्रापयामि।

दीप-

कार्पासवर्तिसंयुक्तं घधतयुक्तं मनोहरम्, तमोनाशकरं दीपं गृहाण परमेश्वर। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः। दीपं दर्शयामि।

नैवेद्य-

शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च, आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः।  नैवेद्य निवेदयामि आचमनीयं जल समर्पयामि मध्ये पानीयम् उत्तरापोअशनार्थं हस्तप्रक्षालनार्थं मुखप्रक्षालनार्थं च जलं समर्पयामि।

ॠतुफल-

फलेन फलितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम। तस्मात् फलप्रदानेन पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। ॐ

लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः अखण्डॠतुफलं समर्पयामि।

पान-

पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम, एलाचूर्णादिसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः। मुखवासार्थे ताम्बूलपत्रं आदि समर्पयामि।

दक्षिणा-

हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः, अनन्तपुणूयफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः दक्षिणां समर्पयामि।

कर्पूर-

कदलीगर्भसम्भूतं कर्पंरं तु प्रदीपितम्, आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः नीराजनं समर्पयामि।

महालक्ष्मी के उत्तर भाग में कुबेर जी का ध्यान करें उस स्थान पर कुबेर के प्रतीक के रूप में कुबेर यंत्र या रुपैया

आवाहयामि देव त्वामिहायाहि कृपां कुरू, कोशं वर्ध्दय नित्यं त्वं सुरेश्वर। ॐ कुबेराय नमः। पुष्प में इत्र, चंदन, अक्षत, रोली लगाकर चढ़ाएं और प्रार्थना करें-

अन्याय नमसूतुभ्यं निधिपद्माधिपाय च, परन्तु त्वत्प्रसादेन धनधान्यादिसमूपदः।

इसको अपनी तिजोरी में रखें पूजन के बाद मंत्र पुष्पांजलि- श्रद्धया सिक्त्तया भक्त्या हार्दप्रेम्णा समर्पितः मन्त्रपुष्पान्जलिश्चायं कृपया प्रतिगृह्ताम। ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः सर्व देवताभ्यो नमः मन्त्रपुष्पान्जलि समर्पयामि।

इसके बाद माता लक्ष्मी, श्री विघ्न विनाशक और कुबेर देवादि से माफी स्वतन करें-

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर | यतूपूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे।

हाथ में जल लेकर ॐ अनेन यथाशक्त्यर्चनेन श्री महा लक्ष्मीगणपतिभ्यां सर्व देवताभ्यो प्रतियां न मम।। ॐ।।