राजनीति के लिए रामलला को याद नहीं करते हिंदूवादी संगठन

  • हिंदू हृदय जीतने के लिए राममंदिर जरूरी

पवन पांडेय

सम्पूर्ण जगत जानता है कि सनातन धर्म एवं संस्कृति को अपमानित करने के लिए आतताइयों एवं आक्रांताओं द्वारा क्रूरता से अनगिनत हिंदू धर्मावलंबियों का संहार किया था। इसी क्रम में आतताइयों ने अयोध्या नगरी में श्रीराम जन्मभूमि पर निर्मित रामलला के भव्य मन्दिर को भी विध्वंस कर डाला था और उस पर एक ढांचे का निर्माण करवा दिया था। श्रीराम जन्मभूमि को बचाने के लिए सनातन धर्मावलंबियों द्वारा अब तक अनन्त वलिदान दिए गए हैं। अत्यंत दुखद है कि आजाद भारत में धर्मनिरपेक्षता के अलम्बरदार भी दशकों से इस स्थल पर मंदिर होने के प्रमाण भी हम से ही मांग रहे हैं, जिनका खुद कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे नकली गोत्रधारी हिंदू और विदेशी आक्रांताओं की तथाकथित नाजायज औलादें तो राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाकार उनके होने न होने का प्रमाण भी मांगने लगे हैं।

रामायण ग्रंथ में ऐसा लिखा है कि जिस स्थान पर अयोध्या में बाबरी मस्जिद थी, उसी स्थान पर भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था और उसी धारणा के अनुसार यह भी कहा जाता है इस मंदिर को मुगलों ने ढहा दिया था और उसी जगह पर मस्जिद बनवा दी थी। सोचिए, मुगलों ने हमारे मंदिर को बर्बरतापूर्व विध्वंश कर दिया और हम लोगों ने कुछ नहीं कहा। अब हम मजबूत हुए, संगठित हुए और ढांचा ढहा दिया तो दोषी हो गए। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो यह मानने को तैयार नहीं है कि इस जगह पर राम का मंदिर भी था, वह बात-बात में इसका सबूत मांगते हैं।

शायद यही कारण रहा कि बाबरी मस्जिद और राममंदिर पर राजनीतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक विवाद रहे। धार्मिक पुराणों के अनुसार 10वी-11वी सदी में अयोध्या में राम मंदिर बनवाया गया था। उसी विवादित ढांचे को छह दिसम्बर 1992 को श्रीराम भक्तों द्वारा ध्वस्त कर दिया था। इसके ध्वस्त होने के बाद सम्पूर्ण विश्व के सनातन धर्मावलंबियों ने गर्व और गौरव के साथ विजय दिवस मनाया। हम लोग खुशकिस्मत लोगों में शामिल हैं, जिन्हें यह अवसर बार-बार मनाने का मौका मिल रहा है।

इसी दिन अयोध्या नगरी में श्रीराम जन्म भूमि स्थित कलंक एवं भार स्वरूपी तथाकथित ढांचे का विध्वंस कारसेवकों द्वारा किया गया। ढांचा विध्वंस की 26वीं वर्षगांठ पर ज्ञात-अज्ञात वलिदानी श्रीराम भक्त हिन्दुक्रांतिवीरों को कोटि-कोटि नमन करते हुए उनके श्री चरणों में अपनी शाश्वत एवं दण्डवत श्रदांजलि अर्पित करता हूँ, जिन्होंने सनातन धर्म संस्कृति के स्वाभिमान और सम्मान के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करते हुए श्रीरामकाज हेतु अपना बलिदान दे दिया।

लोग कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक, विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना ने रामजन्म भूमि को अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करती आ रही है तो बता दूं 19 जनवरी 1885 को महंत रघुबीर दास ने पहली बार इस मामले को फैजाबाद के न्यायाधीश पं. हरिकिशन के सामने रखा था और दलील दी थी कि मस्जिद की जगह पर मंदिर बनवाना चाहिए, क्योंकि वो स्थान प्रभु श्रीराम का जन्म स्थान है। इतिहास न जानने वाले यह तिथि नोट कर लें और जान लें कि रामजन्मभूमि मसला कब कोर्ट पहुंचा था। इसके अलावा आजादी के दो साल 128 दिन बाद यानी 22 दिसंबर 1949 को प्रभु श्रीराम और माता सीता की मूर्ति पहली बार बाबरी मस्जिद में दिखाई दी। उसके बाद वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि वो जमीन उनकी है, उसके विरुद्ध हिंदुओं ने भी मामला दर्ज करवाया था, जिसकी वजह से सरकार को उस स्थान को ‘विवादित स्थान’  घोषित करना पड़ा और उस जगह को बंद करना पड़ा।

तत्कालीन सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो इसका दोषी हिंदू समाज कहां से है। हां, यह सच है कि आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद ने इस मामले को तूल पकड़ाया, लेकिन राजनैतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि हिंदू गौरव को वापस जगाने के लिए। मुझे याद है साल 1984 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और भारतीय जनता पार्टी ने एक धर्म संसंद का आयोजन किया था। उसी धर्म संसद में राम जन्मभूमि बनाने के लिए आन्दोलन की नींव पड़ी थी। उसी हुंकार का परिणाम था कि राजीव गांधी की सरकार ने 11 फरवरी 1986 को फैजाबाद जिला न्यायाधीश के फैसले की आड़ में हिंदुओं के लिए कपाट खोल दिए थे। उसके बाद छह दिसम्बर 1992 को हिंदुओं के विशाल जनसैलाब ने अपने कुछ प्रशिक्षित जवानों के बूते उस विवादित ढांचे को ढहा दिया। अब पूरा हिंदू समाज चाहता है कि इस जगह पर भव्य मंदिर बने और मर्यादा पुरुषोत्तम के भक्त उन्हें अपने घर में पूज सकें।

आज के दिन मैं उन समस्त राम भक्तों का हृदय से आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बगैर उस ढांचे के विध्वंस करके  एवं श्रीराम भक्तों का उत्साह वर्धन करके  प्रत्यक्षदर्शी होने का गौरवमयी सौभाग्य प्राप्त किया। अब ठीक उसी तरह उस समय के लिए प्रतीक्षारत हूं, जब विध्वंस के साक्षी श्रीराम भक्त रामलला के जन्म स्थल अर्थात गर्भगृह से भव्य मंदिर का निर्माण करने तथा प्रत्यक्षदर्शी होने का सौभाग्य प्राप्त करते हुए सदियों से अतृप्त अपने पूर्वजों की आत्मा को मुक्ति देने एवं  शांति प्रदान करने हेतु मां सरयू के जल से तर्पण करेंगे। इस शौर्य दिवस पर एक बार फिर से ज्ञात-अज्ञात बलिदानी श्रीराम भक्तों को नमन एवं राम कार्य में जान गंवाने वाले कारसेवकों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और विश्व के समस्त सनातन धर्मालंबियों को इस पावन अवसर पर अपनी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं भी देता हूं।

मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम के चरणों में कुछ लाइनें अर्पित करता हूं, शेष बातें फिर…

पूर्वजों के बलिदानों को व्यर्थ नहीं होने देंगे।

हम श्रीराम के सेवक अब, काज पूर्ण सब कर देंगें।

श्रीराम जन्म की भूमि पर, हम मंदिर भव्य बनाएंगे।

संकल्प लिया जो हमनें है, हम पूर्ण उसे अब कर देंगे।

वन्देमातरम् !

(यह लेखक के अपने विचार हैं, लेखक अकबरपुर (अम्बेडकर नगर) के पूर्व विधायक हैं और शिवसेना के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में ढांचा विंध्वंश करने में अग्रणी भूमिका निभा चुके हैं, न्यायालय में आज भी मुख्य आरोपी।)