रुपया सम्भालना हम खूब जानते हैं…

 नयालुक  डेस्क

सावन आने वाला है। यह बाबा भोलेनाथ का महीना है जो पूजा-पाठ से लेकर खानपान की शुद्धता तक पर जोर देता है। ऐसे में गृहिणी का अपना नियम है। वह खाना बनाते समय प्याज लहसुन का प्रयोग नहीं करतीं। आगे पितृपक्ष के 15 दिन और फिर नवरात्र के नौ दिन भी यही हाल रहेंगे। यानी महंगे प्याज से बचने के करीब दो महीने का यह दौर देवताओं के नाम पर कट जाना है। एक तरफ धर्म और दूसरी ओर धन बचाने का यह तरीका हमारे भारतीयों ने अपने संस्कार से सीखा है। सरकार भी इससे अलग नहीं है। यही कारण है कि अर्थव्यवस्था पर जब जब संकट के बादल छाते हैं, देश भी इससे पार पा जाता है।

प्याज न खाने और देश की अर्थव्यवस्था को एक साथ जोड़कर देखने को अर्थशास्त्री तर्कसंगत नहीं ठहराएंगे। इसे इतनी आसानी से देखना भी नहीं चाहिए। फिर भी एक बात तो माननी होगी कि हमने परम्परा से ही ऐसे उपाय सीखे हैं जो हमें संकटों से उबार लेता है। तभी तो 2008 की विश्वव्यापी मंदी से हम उबर सके थे। कई बार देश ने छोटा झटका झेला है। पिछले साल ही बाजार धड़ाम से नीचे आ गिराइन्हीं अनुभवों के बूते हमने इस समस्या से निजात पाना भी शुरू कर दिया था। शेयर बाजार की भारी गिरावट से निवेशक परेशान हो उठे तो प्रधानमंत्री ने उसी शाम अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए सुधारों को आगे बढ़ाने और सार्वजनिक खर्च में तेजी लाने की जरूरत बताई। सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने का फैसला किया। इन उपायों में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के भागीदारों के साथ बातचीत करने का फैसला भी शामिल था। इससे निवेशकों को आकर्षित करने के और उपाय हो सकेंगे।

बाजार को ठीक करने के दौरान लगता है कि राजनीतिक स्तर पर भी सरकार ने एक बड़ा कदम उठाने का मन बना लिया है। आर्थिक विकास को गति देने के लिए वस्तु एवं सेवा कर विधेयक को पारित कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी शुरू हुई। इसका विरोध कर रही कांग्रेस के कुछ सुझाव भी बिल में शामिल कर लेने पर विचार हुआ। संसदीय कार्य राज्यमंत्री के बयान से इसके संकेत मिलने लगे। मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि कांग्रेस के अंदर एक अहंकारी समूह बिल का विरोध कर रहा है। संकेत थे कि इस समूह के अहं को शांत करने की भी कोशिशें की गईं हैं। जीएसटी बिल पारित होने की उम्मीद भर से बाजार अगले ही दिन सम्भलने लगा था। सरकार के एक और प्रयास की खबर से निवेशकों में उत्साह का संचार हुआ और संकट के अगले दिन शेयर बाजार में एक प्रतिशत से अधिक की तेजी देखी गई।

दरअसल, बाजार की यह दिक्कत बाहरी कारणों से आई। संकट आया तो बचने के अंदरूनी उपाय तो करने ही थे। सरकार के साथ रिजर्व बैंक और सेबी जैसे नियामकों ने वैश्विक घटनाक्रम पर नजर स्थिर की। भारतीय बाजार में गिरावट का बड़ा कारण अमेरिकी और चीनी बाजार का गिरना रहा। शंघाई के शेयर बाजारों में 10 प्रतिशत से भी ज्यादा की गिरावट देखी गई। संकट के दिन में वहां 7.7 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई थी। उस दिन एशियाई बाजारों में भी भारी गिरावट देखी गई। शंघाई कम्पोजिट 7.25 फीसदी गिरकर 3,270 के स्तर पर आ गया। जापान का निक्केई तीन फीसदी से ज्यादा गिरा और 18,850 के नीचे पहुंच गया। हैंग सेंग में 4.25 फीसदी की तेज गिरावट रही। कोरियाई कोस्पी में भी 2.2 फीसदी की कमजोरी रही। ताइवान का इंडेक्स करीब सात फीसदी गिरकर 7,300 के नीचे पहुंच गया। इससे विदेशी निवेशक चिंतित हो उठे और निवेशकों के रुख से ही भारी गिरावट आई। चीन का असर बाहर भी होता है। उधर अमेरिका में भी ब्याजदरों के बढ़ने की बात सामने आई। बाजार विशेषज्ञ मान रहे थे कि इस हालात का असर ज्यादे दिन नहीं रहेगा। निवेशकों को जल्द समझ आ जाएगा और वह लौटने लगेंगे। भारत में यह अगले ही दिन शुरू हो गया था।

वित्तमंत्री ने जीएसटी से सम्बंधित संविधान संशोधन विधेयक पर आम राय बनाने के लिए सभी राजनीतिक दलों के साथ विचार विमर्श किया। केंद्र सरकार ने शेयर बाजार और रुपये में भारी गिरावट की समीक्षा की । अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक कदम उठाने के निर्देश के बाद रिजर्व बैंक गवर्नर ने जरुरत पड़ने पर विदेशी मुद्रा भंडार के इस्तेमाल किये जाने का बयान दिया। इससे भी बाजार की गिरावट के थमने का भरोसा बढ़ा और साथ ही निवेशकों की निवेश धारणा को ताकत मिली।

इस दौरान आईटी समूह की 0.48 प्रतिशत की गिरावट को छोड़कर बीएसई के शेष 12 समूहों में तेजी दर्ज की गई। टेक,  कैपिटल गुड्सकंज्यूमर ड्यूरेबल्सएफएमसीजीपावर,हेल्थकेयरऑटोबैंकिंगपीएसयूतेल एवं गैसधातु और रियल्टी समूह के शेयर 0.03 से 6.78 प्रतिशत तक उछल गये। बीएसई में कुल 2828 कंपनियों के शेयरों में कारोबार हुआ जिनमें से 1214 बढ़त और 1506 गिरावट पर रहेजबकि 108 में कोई बदलाव नहीं हुआ। एनएसई में कुल 1318 कंपनियों के शेयरों में कारोबार हुआ जिनमें से 656 फायदे में और 633 नुकसान में रहेजबकि 29 में स्थिरता दर्ज की गई।

आखिर कैसे हुआ यह सब? 

कैसे भारत ने संकट के दिन ही खुद को सम्भालना शुरू कर दिया? किस तरह अगले ही दिन से सरकार की कोशिशों के परिणाम भी आने लगे। यह भी तब हुआ, जब संकट वाले सोमवार 26 अगस्त के पिछले हफ्ते पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने ग्लोबल करेंसी मार्केट में अपनी मुद्रा युआन में करीब चार फीसदी का डिवैल्यूएशन करके हड़कंप मचा दिया था। इससे भारत सहित दुनियाभर के उभरते बाजारों की मुद्राएं तेजी से नीचे गिर गईं। फिर भी देखते हैं कि हमारा रुपया दो साल की सबसे बड़ी गिरावट के बावजूद सम्भलने को तैयार रहा। इसे धैर्य के साथ समझना होगा। धैर्य से इसलिए राजनीतिक क्षेत्र इस समय महंगाई का रोना रो रहा है। यह आंकड़ों के जारी होने और खुदरा बाजार के समय में कुछ फर्क के कारण होता है।

खुदरा महंगाई के जुलाई वाले आंकडे कम हो रही महंगाई को दिखा रहे थे। दूसरी ओर कुछ खाद्य सामग्री में तेजी भी थी। ध्यान देना होगा कि पिछले साल भी इन दिनों में ये सामग्रियां तेज रही थीं। रिजर्व बैंक भी तो यही कहता है कि वह जनवरी 2016 तक महंगाई काबू करने के टार्गेट पर चल रहा है। यह जरूर है कि मुद्रा में गिरावट से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। फिर भी रुपये को ताकत इसलिए मिलती रहेगी कि विश्व स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है। फिर रुपये को मजबूत बनाये रखने के लिए कुछ समय से रिजर्व बैंक स्पॉट और फॉर्वर्ड मार्केट में डॉलर की खरीदारी कर रहा था। ऐसा अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने की आशंका को देखते हुए जरूरी समझा गया। इससे व्याज दरें बढ़ाने के अमेरिका के फैसले से निपटने के लिए देश तैयार था।

फॉरेक्स रिजर्व की मजबूती के साथ खुद की मुद्रा का सीधा रिश्ता है। किसी भी देश में वहां की मुद्रा में बड़ी गिरावट से वहां की कंपनियों की बैलेंसशीट पर बुरा असर पड़ता है। भारत में भी इसी तरह के खतरे थे। रुपये में गिरावट से भारतीय कम्पनियों की विदेशी देनदारी बढ़ने के संकेत आने लगे थे। इस खतरे के प्रति आइएमएफ भी लगातार चेतावनी देता रहा। इन चेतावनियों को गम्भीरता से लेते हुए भारतीय कंपनियों ने पिछली कई तिमाही से अपने डॉलर रिजर्व में अच्छा खासा इजाफा किया था। आंकड़े बताते हैं कि पिछली कुछ तिमाही में भारतीय कम्पनियों ने विदेशी देनदारी के लिए डॉलर हेजिंग के स्तर को 15 फीसदी से बढ़ाकर लगभग 41 फीसदी कर लिया था। फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बड़ी संख्या में कंपनियां अधिक विदेशी कर्ज सुरक्षा के इस दायरे से बाहर थीं।

इस माहौल में मुनाफे पर भी विपरीत असर होता है। विदेशी निवेशक भारत से बाहर जाना चाहें तो रुपये में बड़ी गिरावट के चलते उसे कुछ और दिन यहां के बाजार में रुकना पड़ता है। देखते हैं कि ऐसा करने में उसे और हमारे बाजार, दोनों को ही फायदा है। याद करना होगा कि साल 2014 में भी बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश भारत में आया और इस साल भी यह सिलसिला जारी है। लिहाजा जब फॉरेक्स मार्केट में रुपया लगभग दो साल के सपाट स्तर पर पहुंचा तब भी निवेशकों का रुझान भारतीय बाजारों में बने रहने का होना स्वाभाविक था। इस तरह साफ है कि रुपये ने अपने स्वभाव के चलते खुद ही बहुत कुछ सम्भालना शुरू कर दिया।

सम्भालता है सोना भी

जिस दिन विश्वव्यापी बड़ा संकट शुरू हुआ, राजधानी दिल्ली में प्रति 10 ग्राम वास्तविक सोने का भाव 27 हजार 500 रुपये दर्ज किया गया। उस दिन यह पिछले करीब सात महीने के ऊपरी स्तर पर बंद हुआ। पीपी ज्वैलर्स के निदेशक राहुल गुप्ता कहते हैं कि आज शेयरों के लिए भारी गिरावट वाला दिन रहा। रुपये में भी गिरावट रही। इसलिए सोने का भाव चढ़ गया। अगले 10-15 दिनों में सोने के भाव में एक हजार रुपये की और वृद्धि देखी जा सकती है। राहुल ने यह भी जोड़ा कि दुनियाभर के कई शेयर बाजारों में गिरावट रही हैइसलिए निवेश का प्रवाह सोने की तरफ बढ़ने की उम्मीद है। आखिर क्या बात है कि दुनिया का बाजार जहां धड़ाम होता है वहां सोना चमक उठता है। इसका कारण एंजल ब्रोकिंग के कमोडिटी तथा मुद्रा कारोबार के सहायक निदेशक नवीन माथुर समझाते हैं। वह बताते हैं कि सोने की कीमत रुपये के मुकाबले डॉलर में तय की जाती है। सोने में तेजी का प्रमुख कारण रुपये का गिरना ही है। माथुर की बात इस रूप में सच दिखती है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के कारण पिछले कुछ दिनों से सोने की कीमत में वृद्धि दर्ज की गई। कारण यह है कि अनिश्चितता की घड़ी में लोग सोने में निवेशक करना सुरक्षित समझते हैं।

यही कारण है कि सोने का भाव शेयरों के भाव के भी उलटा चलता चलता है। संकट के बड़े सोमवार को भी कुछ हद तक ऐसा ही हाल रहा। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स में जहां 1,625अंकों की गिरावट रहीवहीं कुछ गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड में तेजी दर्ज हुई। सर्वाधिक तेजी कैनरा रोबेको द्वारा प्रबंधित गोल्ड ईटीएफ में रहीजो 1.79 फीसदी या 45.10 रुपये की तेजी के साथ 2,560 रुपये पर बंद हुआ। चीन के शेयर बाजार में आठ फीसदी से अधिक गिरावट के कारण देश के शेयर बाजारों में हुई बिकवाली से निवेशकों ने सुरक्षित संपत्तियों में निवेश करना उचित समझा। स्वाभाविक है कि इसमें सोना सबसे ऊपर है।