लाश! आह! और चीत्कार छोड़ गई अमृतसर की घटना

 

  • सिस्टम हारा, सियासत जीती
  • बड़ा सवाल-60 लाश का दोषी कौन?
  • आखिर वोट लेने वाले कब होंगे जिम्मेदार

अमृतसर से करमवीर सिंह की आंखों देखी और भौमेंद्र शुक्ल की रिपोर्ट…

मेरी प्यारी बेटी अनु। वह कल ही अपने ससुराल फगवाड़ा से दशहरे के लिए अमृतसर आई थी। उसकी डेढ़ साल की बेटी नूर। मेरी प्यारी सी धेवती। वो मेरी गोद में ही थी। हम रेलवे ट्रैक पर नहीं थे, उससे दूर खड़े थे। पटाखे छूट रहे थे और नूर खुशी में झूम रही थी। पता ही नहीं चला कब लोगों ने मेरी बेटी और धेवती (नातिन) को कुचल दिया। उसका क्या कसूर था, जो लोग उसके ऊपर से चढ़कर भाग गए। हे भगवान, अब मैं उसके ससुराल वालों को कैसे मुंह दिखाऊंगा। अमृतसर के गुरुनानक अस्पताल में भर्ती कीमतीलाल कुछ इन्हीं लफ्जों के साथ चीख रहे थे, चिल्ला रहे थे। उनके आंसू सूख चुके थे, लेकिन उनकी जुबां लड़खड़ाते-लड़खड़ाते निकल रही थी। उनकी आह से पूरा हॉस्पिटल सन्न था। वो चीख-चिल्ला रहे थे कि हम ट्रैक पर नहीं थे। अलग खड़े थे। भगदड़ हुई तो लोगों ने हमें कुचल दिया।

वहीं पूरे अस्पताल में अफ़रा-तफ़री का माहौल था। लोग अपने रिश्तेदारों को खोजने के लिए अस्पताल पहुंचे थे। मुर्दाघर के पास भारी भीड़ बनी हुई थी। हादसे में क़रीबियों को गंवाने वाले लोगों की वहां कतारें देर रात तक लगी रहीं। अपनों को खोजने आए लोग रो रहे थे। लोग बदहवास पोस्टमार्टम हाऊस जाते थे और लौट आते थे। खबरों के मुताबिक मुर्दाघर में अब भी क़रीब 25 लाशें हैं, जिन्हें लोग देखने तो आते हैं, लेकिन कोई पहचान नहीं पाता।

दूसरी ओर घटनास्थल के आसपास गमगीन लोग अपनों को तलाश रहे थे। अपने परिजनों को खोजने घटनास्थल पहुंचे मनजीत बीबीसी से कहते हैं कि हमें पटाखे की आवाज़ और लोगों के कोलाहल के आगे और कुछ सुनाई नहीं दिया। वहां मौजूद लोग जश्न के माहौल में थे। मस्ती में डूबे लोग यह भूल गए कि वह रेलवे ट्रैक पर खड़े हैं। वहीं उषा अपने 17 वर्षीय भतीजे की तलाश में सुबह-सुबह पटरी पर आई हैं। वह कहती हैं कि एक पल में ही वो जगह इतना भयानक घटनास्थल में बदल जाएगा इसका अंदेशा किसी को नहीं था। चारों ओर ख़ून बहती क्षत-विक्षत लाशें बिखरी पड़ी थीं। कहीं किसी का सिर था तो दूर उनका कटा पैर पड़ा था। कहीं खून सनी लाश थी तो कहीं कटा हाथ स्वयं फड़फड़ा रहा था। वहां जो लोग जिंदा बचे थे, वो मंजर देखकर अंदर तक डर गए। प्रत्यक्षदर्शियों की माने तो लोग मोबाइल फ़ोन का टॉर्च जला कर रेलवे ट्रैक और इसके आसपास की झाड़ियों में अपने परिजनों को ढूंढ रहे थे। एक अधेड़ उम्र की महिला उषा अपने भतीजे आशीष की तलाश कर रही थीं। वो अस्पताल भी गई थीं, लेकिन वहां उनका भतीजा नहीं मिला, इसलिए वो अब इन झाड़ियों में उसे ढूंढ रही थीं।

बलबीर सिंह के साथ कई और लोग शोक में हैं। पटरी पर इस डरावनी ख़ामोशी के बीच लोगों को अब भी उम्मीद थी और उनकी तलाश जारी थी, लेकिन उनके मोबाइल की बैटरियों ने दम तोड़ना शुरू कर दिया था। मनजीत सिंह बताते हैं कि उनके चाचा ने उन्हें दशहरा में बुलाया था। वो ख़ुद हॉल बाज़ार में एक दुकानदार हैं, उनके चाचा वेल्डिंग का काम करते थे। वो इस दुर्घटना से पहले पटरी पर खड़े थे क्योंकि वहां से रावण दहन को साफ़ देखा जा सकता था।

बताते चलें कि पंजाब के अमृतसर में दशहरे के मौक़े पर रावण दहन देखने पहुंचे लोगों को तेज़ रफ़्तार ट्रेन ने अपनी चपेट में ले लिया। इस हादसे में अभी तक 59 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है। हादसे के बाद से ही एक सवाल लगातार बना हुआ है कि आख़िर ज़िम्मेदार कौन है? सवाल करती उंगलियां रेलवे प्रशासन से लेकर दशहरा मेला आयोजन करवाने वाली कमेटी और स्थानीय प्रशासन पर उठ रही हैं। पंजाब में सिस्टम फेल दिखा, लेकिन सियासत एक बार फिर पास हो गई। हर कोई एक दूसरे को दोषी ठहरा रहा है, लेकिन जिम्मेदारी उठाने को कोई तैयार नहीं दिख रहा है।

इस बीच कुछ सवाल उस ट्रेन को चलाने वाले ड्राइवर पर उठाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि क्या वह ड्राइवर इतनी भीड़ को देखते हुए ट्रेन की गति को कुछ कम नहीं कर सकता था? या फिर ड्राइवर ने हॉर्न क्यों नहीं बजाया? रेलवे पुलिस ने ट्रेन के ड्राइवर को हिरासत में लेकर पूछताछ की तो उसने बताया कि उसे ग्रीन सिग्नल मिला था, इसीलिए ट्रेन नहीं रोकी। साथ ही उन्हें कोई अंदेशा नहीं था कि ट्रैक पर सैकड़ों लोग मौजूद होंगे। इमरजेंसी में ब्रेक लगाता तो और बड़ा हादसा हो जाता। ट्रेन पलटती तो इधर-उधर भाग रहे लोग भी चपेट में आ जाते और ट्रेन में बैठीं सवारियां भी।

जोड़ा रेलवे फाटक लाइनमैन से जब यह पूछा गया कि उसके ड्राइवर को ट्रैक पर लोगों की मौजूदगी के बारे में अवगत क्यों नहीं कराया तो वह इंकार कर गया। उसके अलावा रेलवे प्रशासन ने भी पल्ला झाड़ते हुए कहा कि उन्होंने इस आयोजन की मंजूरी नहीं दी थी। रेलवे ने पूरी जिम्मेदारी अमृतसर प्रशासन पर डाल दी और कहा है कि स्थानीय अधिकारियों को दशहरा कार्यक्रम के बारे में पता था। साथ ही इस कार्यक्रम में पंजाब के उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर भी मौजूद थीं, तो प्रशासन ने ट्रैक के आसपास लोगों को क्यों जमने दिया? सिस्टम के कई अफसरों ने यहां तक सवाल उठाए कि वहां खड़े लोग बेवकूफ थे, जिन्हें यह पता नहीं था कि रेलवे ट्रैक खड़ा होने के लिए नहीं होता? अब सवाल यह कि इस हादसे का जिम्मेदार कौन? रेलवे, गार्ड, ड्राइवर, स्थानीय प्रशासन, आयोजन समिति या फिर वो लोग जो इस हादसे में अपनी जान गंवा बैठे?

रेलवे के एक अफसर ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि हमें इस कार्यक्रम के आयोजन के बारे में किसी ने नहीं बताया और न ही हमने इसकी मंजूरी दी थी। यह मामला अतिक्रमण से जुड़ा है और स्थानीय प्रशासन को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। सवाल यह उठता है कि भले ही रेलवे को इस कार्यक्रम की जानकारी ना रही हो, लेकिन इतनी बड़ी भीड़ को देखने के बावजूद ट्रेन को रोका क्यों नहीं गया? इसके जवाब में रेलवे अधिकारी कहते हैं कि जिस जगह हादसा हुआ वहां बहुत ज़्यादा धुंआ था, जिस वजह से ड्राइवर को भीड़ नज़र नहीं आई, साथ ही वहां एक मोड़ भी था। वह कहते हैं कि बिना किसी लाग-लपेट के रेलवे महकमा बचाव टीम का साथ दे रहा है, लेकिन जिम्मेदारी तो स्थानीय प्रशासन की ही बनती है। वहीं रेल मंत्री पीयूष गोयल अमरीका यात्रा छोड़कर वापस लौट रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये और घायलों के लिए 50 हज़ार रुपये मुआवजे की घोषणा कर दी है।

घटना को याद करते हुए एक घायल व्यक्ति बताता है कि जहां रावण दहन हो रहा था, हम वहां से दूर थे। रेलवे ट्रैक के पास एक एलईडी लगी थी, हम उसी पर रावण दहन का कार्यक्रम देख रहे थे। रेलवे ट्रैक से तीन ट्रेन गुजर चुकी थीं, लेकिन जब ये ट्रेन आई तो पता ही नहीं चला। अपनी घायल पत्नी की देखभाल कर रहे पवन भगवान का शुक्रिया अदा कर रहे हैं। वह कहते हैं कि मैं भी रेलवे ट्रैक पर मौजूद था। मेरी बेटी मेरे कंधे पर बैठी थी। पत्नी ने मेरा एक हाथ थामा हुआ था। हम रेलवे ट्रैक पर ही खड़े थे। कुछ वक्त पहले एक ट्रेन गुजरी और ट्रैक पर खड़े लोगों ने उसे रास्ता दे दिया। थोड़ी ही देर में दूसरी ट्रेन भी आ गई। मेरी पत्नी भी ट्रेन की चपेट में आ जाती, लेकिन मैंने हाथ पकड़कर उसे खींच लिया। वो कहते हैं कि उनकी पत्नी के जख़्म भी भर जाएंगे लेकिन कई लोगों को इस हादसे ने ऐसी चोट दी है, जो ताउम्र बनी रहेगी।

रावण की जान भी ले ली

अमृतसर रेल हादसे से कुछ ही देर पहले दलबीर सिंह वहां की रामलीला में रावण का अभिनय कर रहे थे। अभी रावण का पुतला जल ही रहा था कि वो भी इस हादसे का शिकार हो गए। दलबीर सिंह रामलीला में हर साल राम का किरदार करते थे, लेकिन दोस्तों के आग्रह पर वो इस बार रावण की भूमिका निभा रहे थे। बलबीर कहते हैं कि मंच पर आख़िरी बार रावण का किरदार करने के बाद दलबीर सिंह घनुष उठा कर भीड़ में लोगों के बीच रावण दहन के लिए गया था। मंच और रेलवे ट्रैक के बीच क़रीब 25 मीटर का फ़ासला है। रावण की मौत का किरदार करने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था कि आज रामलीला में उनका किरदार ख़त्म हो जाएगा, लेकिन मंच पर और वास्तविक जीवन में उनकी मौत के बीच का फासला इतना कम होगा यह किसी ने नहीं सोचा था।

क्या कहते हैं जिम्मेदार

पुलिस महानिदेशक सुरेश अरोड़ा ने घटनास्थल का दौरा किया। उन्होंने कहा कि मामले की जांच की जाएगी और दोषियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि इस दशहरा उत्सव के लिए स्थानीय प्रशासन से अनुमति ली गई थी या नहीं।