व्यंग्यः आर्ट आफ टार्चरिंग

तारकेश कुमार ओझा

बाज़ारवाद के मौजूदा दौर में आए तो मानसिक अत्याचार अथवा उत्पीडऩ यानी टार्चरिंग या फिर थोड़े ठेठ अंदाज़ में कहें तो किसी का ख़ून पीना… भी एक कला का रूप ले चुकी है। आम-आदमी के जीवन में इस कला में पारंगत कलाकार क़दम-क़दम पर खड़े नजऱ आते हैं। एक आम भारतीय की मजबूरी के तहत क़स्बे से महानगर जाने के लिए मैं घर से निकलने की तैयारी में था। चाय पीते हुए आदतन मेरी नजऱें टेलीविजन पर टिकी हुई थी। सोचा ज़माने के लिहाज़ से हमेशा अपडेट रहना चाहिए।

एक चैनल पर ख़बर चल रही थी… आइपीएल के लिए फलां क्रिकेटर इतने करोड़ में बिका…। चैनल पर हुंकार भरते उस खिलाड़ी की तस्वीर के पाश्र्व में परिजनों का इंटरव्यू दिखाया जा रहा था। भावुक होते हुए परिजन कह रहे थे… हमें उम्मीद थी। एक दिन उसकी इतनी बोली ज़रूर लगेगी… इतने करोड़ की कीमत पर वह नीलाम होगा। मैने मुंह बिचकाते हुए चैनल बदल दिया। दूसरे चैनल पर ख़बर चल रही थी। बालीवुड का फलां शहंशाह मुंबई के समुद्री तट के किनारे इतने सौ करोड़ का नया बंगला बनवा रहा हैं। यह भी बताया जाता रहा कि जनाब के मुंबई में ही 8 और शानदार बंगले हैं। दुनिया के कई देशों में शहंशाह ने फ़्लैट खरीद रखे हैं। मुझे लगा जैसे स्ट्रायर लगा कर किसी ने मेरे शरीर से थोड़ा सा ख़ून पी लिया। टेलीविजऩ बंद कर मै बड़े शहर की ओर निकल पड़ा। ट्रेन में बैठने से पहले समय काटने की मजबूरी के चलते मैने अख़बार खरीदा। अख़बार खोलते ही नजऱें रंगीन पन्नों पर टिक गई। मैं भीषण गर्मी से बेहाल हो रहा था। उधर पन्नों पर समुद्री लहरों के पास एक अभिनेत्री बिकनी पहने हुए दौड़ लगा रही थी। मुझे फिर मानसिक अत्याचार का अहसास हुआ। बेचैनी में पन्ने पलटते ही नजऱें एक और ऐसी ही ख़बर पर टिक गई। जिस पर लिखा था कि पेज थ्री कल्चर वाले एक प्रसिद्ध शख्सियत ने अपनी पांचवी पत्नी को तलाक़ दे दिया। ख़बर के साथ दोनों की मुस्कुराती हुई फोटो भी छपी थी। साथ में यह भी लिखा मिला कि दोनों ने यह फ़ैसला आपसी सहमति से किया लेकिन दोनों आगे भी अच्छे दोस्त बने रहेंगे। मुझे फिर ख़ून पीए जाने का अहसास हुआ। लगा जि़ंदगी की जद्दोजहद में जुटे लोगों तक ऐसी ख़बरें पहुंचाने वाले ज़रूर आर्ट आफ टार्चरिंग यानी ख़ून पीने की कला में पीएचडी कर चुके होंगे। जो पहले से हैरान-परेशान लोगों के कुढऩे का बंदोबस्त कर रहे हैं। कुछ दूर चल कर ट्रेन अचानक रुक गई। पता चला राजनैतिक विरोध-प्रदर्शन के तहत चक्का जाम किया जा रहा है। प्यास से व्याकुल हो कर पानी की तलाश में मैं प्लेटफार्म पर इधर-उधर भटकने लगा। लेकिन ज़्यादातर नल सूखे पड़े थे। कुछेक से पानी निकला भी तो चाय की तरह गर्म। कुढ़ते हुए मैं मन ही मन व्यवस्था को अभी कोस ही रहा था कि सामने लगे होर्डिंग्स पर नजऱें टिक गई। जिसमें समुद्र की उत्ताल तरंगों से कुछ युवक-युवतियां अठखेलियां कर रहे थे। विज्ञापन के बीच शीतल पेय से निकलने वाला झाग उसी समुद्र के जल में मिल रहा था। मुझे एक बार फिर मानसिक अत्याचार का बोध हुआ। किसी तरह गंतव्य पर पहुँचा तो ट्रेन से उतर कर बस में चढऩे की मजबूरी सामने थी। जैसा कि सभी जानते हैं कि महानगरों की बसें नर्क से कुछ कम अनुभव नहीं कराती। ठसाठस भरी बसों में यात्री बूचडख़ाने के मवेशी की तरह ठूंसे हुए थे। रेल सिग्नल पर जब बस रुकती तो इधर के यात्री उधर और उधर के यात्री इधर होते हुए … उफ्फ़़, आह आदि के साथ अरे यार… आदमी हो या … अरे भाई साहब जऱा देखा कीजिए… जैसे वाक्य दोहराते हुए एक-दूसरे पर गिर-पड़ रहे थे। रेड सिग्नल पर बस के रुकने पर अगल-बगल से गुजऱती बेशकीमती चमचमाती-कारें हमें अपने फटीचरपन और जीवन की व्यर्थता का लगातार अहसास कराती जा रही थी। उधर बस से उतरते ही बड़े-बड़े होर्डिंग्स फिर मुंह चिढ़ाने लगे। जिस पर एक से बढ़ एक महंगी कारों की तस्वीरों के पास किसी पर अभिनेता-अभिनेत्री तो किसी पर नामी-गिरामी क्रिकेट खिलाड़ी खड़े मुस्कुरा रहे थे। सभी का साफ़ संदेश था… बेहद आसान किश्तों पर अब ले ही लीजिए… वग़ैरह-वग़ैरह।

ऐसे आक्रामक प्रचार से मेरा कुछ और ख़ून सूख चुका था। जीवन की दुश्वारियों की सोचते हुए मैं नून-तेल की चिंता में मगन था। लेकिन खून पीने वाली अदृश्य शक्तियां लगातार सक्रिय थी। सड़क के दोनों तरफ लगे कुछ होर्डिंग्स मनोरम और रमणीय स्थलों पर आकर्षक फ्लैट के चित्रों को रेखांकित करते हुए उन्हें खरीदने की अपील कर रहे थे। मुझे फिर मानसिक अत्याचार का भान हुआ। लगा आर्ट आफ टार्चरिंग के कलाकार वापस घर पहुंचते-पहुंचते मेरे शरीर का सारा खून पीकर ही दम लेंगे।