शिवा को सराहौं कि सराहौं छत्रसाल को

केके अस्थाना

महाकवि भूषण को भी वही समस्या थी जो हमारे आज के कवियों को है। उनको भी दुविधा थी कि शिवा को सराहौं के सराहौं छत्रसाल को। कवि आज भी इसी दुविधा से परेशान है। शिवा को सराह दिया तो छत्रसाल खेमा नाराज। छत्रसाल की भूल कर प्रशंसा कर दी तो शिवा के लोगों से दुश्मनी ! भूलकर भी आगे नहीं बढ़ने देंगे।

भूषण इस मामले में फिर भी ज्यादा आरामदायक स्थिति में थे। उनके समय शिवा और छत्रसाल कम से कम परमानेन्ट तो थे। यहाँ तो आज शिवा को सराहो तो पाँच साल बाद छत्रसाल आ जाते हैं। छत्रसाल से कुछ जुगाड़ लगना शुरू होता है कि फिर शिवा का समय शुरू। कहाँ तक विचारधारा को लचीला बनायें। अच्छा खासा कवि चकरघिन्नी बनकर रह जाता है। कविता लिखे तो कब लिखे। कहाँ तक लिखे, जब सुनाने का मौका ही न मिले।

जो कवि नहीं है उन्हें पता है कि कविता लिखना कितना कठिन काम है। यह तो कहो अतुकान्त कविता ने लाज बचा रखी है, वरना छन्द, सोरठा, दोहा, चौपाई, सवैया, छप्पय लिखने पड़ते तो तीन चौथाई कवि तो मैदान छोड़कर भाग ही लिये होते। घनाक्षरी का तो नब्बे प्रतिशत कवियों ने नाम तक नहीं सुना होगा। घनानन्द की कविता को घनाक्षरी समझते हैं। कागज का पन्ना छोटा होने पर घने-घने अक्षरों से लिखी कविता को घनाक्षरी मान लेते हैं। ऊपर से इन बेचारों से आशा करते हो कि सरोकार की कविता लिखे। किसी विचारधारा को सर्पोट करें।

पता नहीं किस सरोकार की बात करते हैं। मैंने तो आज तक ऐसा कवि नहीं देखा जो सरोकार की कविता न करता हो। हर कवि अपनी कविता और अपने कवि सम्मेलन से सरोकार रखता है। उसकी कविता तो अपने इस सरोकार की होती ही है। धीरे-धीरे उसकी पूरी सोच भी सरोकार की हो जाती है। जो बड़े कवि हैं वह बड़े सरोकार का साहित्य सृजन करते हैं। उन्हें अपने खेमे के कवियों से सरोकार रहता है। बाकी सबसे नहीं। इस तरह हमारा पूरा कवि समाज सरोकार की कविता लिख रहा है।

जिन दिनों छत्रसाल खेमे के लोगों को ज्यादा कवि सम्मेलन मिलने लगते हैं उस समय ‘‘शिवा खेमा’’ कवि सम्मेलनों के गिरते स्तर परेशान होने लगता है। जैसे ही पाला बदलता है, चिन्तायें बदल जाती हैं। अब शिवा खेमा इतना व्यस्त हो जाता है कि वह कवि सम्मेलनों के गिरते स्तर की ओर ध्यान नहीं दे पाता है। अब इसकी चिन्ता करने की जिम्मेवारी छत्रसाल प्रशंसकों पर होती हैं।

कुछ कवि ऐसे भी होते है जिन्हें यह द्विविधा कभी नहीं रहती। वह शिवा को भी सराहते हैं और छत्रसाल को भी। पर यह काम यह अकेले में करते हैं। सबके सामने नहीं करते। सबके सामने करेगें तो दोनों तरफ से जायेंगे। शिवा और छत्रसाल दोनों को एक साथ साधना भी एक कला है। कुछ नासमझ ऐसे भी हैं जो गुट निरपेक्षता को बहुत गम्भीरता से ले लेते हैं। पर शिवा और छत्रसाल खेमा, दोनों ही इन्हें गम्भीरता से नहीं लेते। उन्हें हमेशा शंका की दृष्टि से देखते हैं। शिवा गुट उन्हें छत्रसाल गुट का भेदिया और छत्रसाल गुट शिवा गुट का जासूस मानता है। ऐसे गुट निरपेक्ष लोगों को अपना एक अलग गुट बना लेना चाहिये।

शिवा और छत्रसाल खेमा सिर्फ कवियों तक सीमित हो ऐसा कदापि नहीं है। शिक्षा खेल, कला और राजनीति सभी में शिवा और छत्रसाल हैं। शिवा गुट का प्रोफेसर अपने पी0एच0डी0 करने वाले छात्र के वाइवा के लिये शिवा गुट के ही किसी प्रोफेसर को बुलवाता हैं। और छत्रसाल गुट भूल कर भी छत्रसाल कैम्प से बाहर वाले प्रोफेसर को अपने यहाँ कदम नहीं रखने देता है। यही छात्र के प्रति गुरू जी का कर्तव्य होता है। हमारे देश में गुरूजन इस गुरू गम्भीर उत्तरदायित्व से कभी पीछे नहीं हटे। हमारे सारे विश्वविद्यालय अपनी विभिन्न भिन्नताओं के बाद भी इस मामले में एक समान हैं।

कवि ही नहीें बूढ़े माँ बाप भी इसी दुविधा में रहते हैं कि दूर देश से हर महीने मनी आर्डर भेजने वाले शिवा को सराहें कि पास रहकर सेवा करने वाले बेरोजगार छत्रसाल को। शिवा पैसे न भेजे तो काम न चले। और छत्रसाल सुबह शाम सेवा न करे तो सिर्फ मनी आर्डर के सहारे भी जिन्दगी नहीं चल सकती। बेचारा बूढ़ा बाप इसी चिन्ता में खटिया पकड़ लेता है। घर वाले समझ नहीं पाते कि बप्पा को हुआ क्या है।

बेचारा युवा तो और भी कन्फ्यूज्ड है कि मोहल्ले में रहने वाली, आते जाते देख कर मुस्कुराने वाली शिवा को सराहे या कालेज वाली छत्रसाल को। समस्या और बढ़ जाती है जब शिवा और छत्रसाल आपस में सहेलियाँ होती हैं। और तो और दुनिया से मुँह मोड़कर अपना आश्रम चलाने वाला साधू सन्यासी तक इस दुविधा में फँसा है कि वह इस साक्षात् दिखने वाली माया मोह वाली दुनिया रूपी शिवा को सराहे या जीवन के बाद वाले उस अनजान, कल्पना लोक के स्वर्ग रूपी छत्रसाल को। जब ज्ञानी तक कन्फ्यूज्ड हैं तो कवि किस खेत की मूली है। वह बेचारा तो साहित्य रूपी समाज के दर्पण पर लगी धूल हटाने में लगा रहता है। जो समाज उससे करवाता है, वही वह करता है। यह बात अलग है कि अब उसका समाज अपने शिवा या अपने छत्रसाल तक ही सिमट कर रह गया है।

पता नहीं यह दुविधा सिर्फ हिन्दी कवियों के साथ ही है या कन्नड़, मलयाली और तमिल में भी कवि सम्मेलन होते हैं। फ्रांस और जर्मनी के कवि पता नहीं सरोकार की कविता करते हैं कि नहीं। मुझे नहीं लगता कि वह सरोकार या ऐसी ही किसी बात की कविता करते होगें। उन देशों में ऐसी साहित्यिक चेतना कहाँ कि रात-रात भर बैठकर लोग कवि सम्मेलन और मुशायरा सुने।

यह तो हिन्दी के कवि के ही बस का है कि चन्द्र बरदाई पृथ्वीराज रासो भी लिखते थे और पृथ्वीराज चौहान के साथ सर कटाने रण क्षेत्र में भी जाते थे। और वहाँ जाकर ‘‘चार हाथ चौबीस गज…….ता ऊपर सुल्तान है मत चूको चौहान’’ जैसी कविता लिख कर अपने आश्रयदाता का साथ निभाते थे।

आज का कवि ज्यादा समझदार है। हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष पद से हटने वाले के साथ पोर्च तक उसे छोड़ने तक नहीं जाता। अगले अध्यक्ष के इन्तजार में गलियारे में खड़ा रहता है। उसे कोई भ्रम नहीें है कि किसे सराहना है। किससे दूर रहना है। यह तो भूषण जैसे महाकवि थे जो कन्फ्यूजन में रहते थे। हाँ आज के कवि को अगर शिवा और छत्रसाल दोनों में अच्छा आयोजक बनने या कोई बड़ा पुरस्कार दिला पाने की सम्भावना दिखाई पड़ती है तब तो वह जरूर सोचने को विवश हो जाता है कि ‘शिवा को सराहौं या सराहौं छत्रसाल को’’।