सिंचाई विभाग : भ्रष्टाचार के मामलों की नहीं हो रही सुनवाई

सरकार के सिंचाई विभाग का हाल बुरा, मिलीभगत से घोटाला

नहर निर्माण में हुआ भारी भ्रष्टाचार, कार्यदायी कंपनी ने डकारे करोड़ों रुपये

राप्ती नहर निर्माण में कार्यदायी कंपनी का खेल, कहीं काम नहीं, कहीं भ्रष्टाचार

सियासी पहुंच व अफसरों की मिलीभगत से कंपनी ने निकाले करोड़ों रुपये

वर्षों पहले हाईकोर्ट का आदेश, शासन से शिकायत, मगर कोई कार्रवाई नहीं

सचिन शुक्ला

लखनऊ। शासन-प्रशासन की नाक के नीचे ही राप्ती नहर निर्माण में घोर भ्रष्टाचार किया गया। अधिकारियों की मिलीभगत और सियासी पहुँच का फायदा उठाते हुए कार्यदायी कंपनी ने बिना कार्य किये करोड़ों रुपये निकलवा लिये और जो कार्य किया, उसमें भी जमकर खेल किया गया। हाई कोर्ट में पीआईएल दाखिल होने पर गड़बड़झाले का खुलासा हुआ, जिस पर न्यायालय ने कंपनी पर कार्रवाई के आदेश दिये। इसके लगभग पांच वर्ष बाद भी घोटाले की सही जांच की बजाय खानापूर्ति हुई। कंपनी पर न तो कोई कार्रवाई हुई, न ही उसका कार्य रोका गया। बल्कि इसके उलट कंपनी को करोड़ों रुपये निर्गत किये जाते रहे। एक वर्ष पहले सामाजिक कार्यकर्ता ने इस बावत प्रदेश के मुख्य सचिव से शिकायत की। जाँच अधिकारी मुख्य अभियंता द्वारा शिकायतकर्ता से ही माँग की गयी कि वे शिकायत की पुष्टि के लिए समुचित साक्ष्य उपलब्ध करायें। साल भर से केवल अफसरों के बीच पत्राचार ही चल रहा है, मगर तमाम कवायदों के बाद भी फ्रॉड कंपनी और दोषियों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी।

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मुरारपुर-बाराबंकी निवासी भाजपा कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता राकेश सिंह ने बताया कि पिछली सरकार में राप्ती नहर निर्माण मंडल-2, बस्ती के अंतर्गत निर्माण कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया गया और सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया। इस कार्य के लिए पिछली सरकार द्वारा वर्ष 2012-2013 में नहर निर्माण कार्य का विज्ञापन निकाला गया। यह पूरा कार्य लगभग दो हजार करोड़ रुपये का था तथा इस नहर सेो बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर जिलों में रेन वाटर मैनेजमेंट के तहत लाखों किसानों का फायदा मिलता, लेकिन निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी यह कार्य आज तक पूरा नहीं किया गया। जाँच में यह पाया गया कि श्री साईं लक्ष्मी कंस्ट्रक्शन एंड कंपनी द्वारा जिलाधिकारी के नाम से फर्जी हैसियत प्रमाण पत्र का प्रयोग कर 25 करोड़ रुपये का कार्य लिया गया और रुपयों का बंदरबाँट किया गया।

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शिकायत कर्ता के अनुसार उपरोक्त प्रकरण में एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता इंदिरानगर-लखनऊ निवासी राकेश सिंह द्वारा उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में पीआईएल दाखिल कर मामले को उठाया गया, जिस पर सचाई सामने आ सकी। उच्च न्यायालय ने मामले में भ्रष्टाचार पाते हुए संबंधित कंपनी पर कार्रवाई किये जाने का आदेश दिया। उच्च न्यायालय ने ये आदेश 29 अगस्त 2014 को दिया था, मगर कंपनी के मालिकों की ऊँची राजनीतिक पहुँच के चलते उसके खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। कार्यदायी कंपनी के कार्य को नहीं रोका गया, बल्कि उल्टा मौके पर मौजूद विभागीय अधिकारियों द्वारा 120 करोड़ रुपये का भुगतान भी कंपनी को कर दिया गया। राकेश सिंह ने इस बावत गत वर्ष प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर उनसे शिकायत की।

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इस पर एक साल से अफसरों के बीच पत्राचार ही चल रहा है। गत 25 अप्रैल 2018 को शासन द्वारा प्रदेश सिंचाई एवं जल संस्थान विभाग के प्रमुख अभियंता व विभागाध्यक्ष को जाँच के निर्देश दिये गये। प्रमुख अभियंता की ओर से अधीक्षण अभियंता (प्रारंभिक जाँच प्रकोष्ठ) सिंचाई विभाग आर.के. मिश्रा द्वारा 21 मई 2018 को मुख्य अभियंता, स्तर-1 मध्य, लखनऊ को जाँच अधिकारी नामित करते हुए उनको निर्देश दिये गये कि प्रकरण में यदि कोई अनियमितता या वित्तीय क्षति पायी जाती है, तो उसका विवरण, कारण और उसके जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों के नाम-ब्यौरे समेत जाँच रिपोर्ट दी जाये। इस पर जाँच अधिकारी मुख्य अभियंता, स्तर-1 मध्य, लखनऊ जय प्रकाश द्विवेदी द्वारा शिकायतकर्ता राकेश सिंह को पत्र लिखकर उनसे माँग की गयी कि वे शिकायत के बारे में शपथ पत्र तथा शिकायत की पुष्टि के लिए समुचित साक्ष्य उपलब्ध करायें। राकेश सिंह द्वारा अपनी ओर से समुचित ब्यौरा उपलब्ध करा दिया गया। इसके बाद भी फ्रॉड कंपनी और दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी।