सियासी डगर के मुश्किलात में दो मुस्तकिल दुश्मन बने दोस्त

  • यूपी की सरजमीं लखनऊ से फिर बनता दिख रहा है थर्ड फ्रंट
  • कांग्रेस और बीजेपी पर बरसकर माया ने चला 2019 की चाल

बृजेंद्र वीर सिंह

लखनऊ। इसे सियासी मजबूरी कहें या मोदी फोबिया या फिर अस्तित्व के लिए जूझ रहे दलों की विवशता। राजनीति के जानकार पहले से यह तर्जुमा कहते हैं कि सियासत में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न मुस्तकिल दुश्मन। राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. सीएम उपाध्याय कहते हैं कि यह मिलन तय था, क्योंकि दोनों की राहें समान, मंजिल समान ,महत्वाकांक्षाएं भी तकरीबन समान ही हैं। एक ने कांशीराम की सल्तनत पर कब्जा किया है तो दूसरे ने पिता मुलायम को खुद के लिए गद्दी से हटा दिया। हालांकि राजनीति में कौन किसी की परवाह करता है। मौका पड़ने पर बिन बुलाए मेहमान बन जाने में भी कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए। इस तरह के खेल से राजनीतिक सफर करते हुए सल्तनत का सदर बनने का गुर तो सीखा ही जा सकता है।

पत्रकारों से बात करने से पहले ही बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती कहती हैं कि करीब 25 साल पहले राजधानी लखनऊ में हुए गेस्ट हाउस कांड से बड़ा फैसला लेने की यह घड़ी है। देश की जनता सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के संकीर्ण, स्वार्थी, साम्प्रदायिक, उन्मादी व सत्ता के लिए बिकी हुई पार्टी से त्रस्त है। यूपी समेत पूरे देश की जनता इन दिनों त्राहि-त्राहि कर रही है। वह कहती हैं कि जन संतोष के लिए बसपा और सपा का चुनावी गठबंधन हो रहा है। इस गठबंधन से राजनीति की एक नई दिशा तय होगी।

राजनीति की चतुर सुजान खिलाड़ी मायावती ने बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस देश की एक मात्र ऐसी पार्टी है, जो 70 बरसों तक देश पर राज करती रही और सभी वर्गों को परेशान किया। उसके शासनकाल में देश में गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार बढ़ा है। इसी पार्टी के कुशासन से मुक्ति के लिए देश में सपा और बसपा जैसी पार्टियों का उदय हुआ है। वह अमर-जेंसी (इमरजेंसी) की बात भी करती हैं और उसके बाद बीजेपी के सफाए की बात भी कहती हैं लेकिन शक भी जाहिर करती हैं, ‘बशर्ते, वोटिंग मशीन में गड़बड़ी न हो।’ वह खनन मामले में अखिलेश का भरपूर समर्थन यूं ही नहीं करतीं। वह कहती हैं कि यह बीजेपी की घिनौनी राजनीति है। मायावती और अखिलेश पहले से ये कहते आ रहे हैं कि वो साथ मिलकर चलेंगे और उन्हें किसी और राष्ट्रीय पार्टी की ज़रूरत नहीं है। वहीं कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अकेले दम पर लड़ने का इशारा कर चुकी है।

कब हुआ बीएसपी-एसपी गठबंधन

राजधानी के एक पांच सितारा होटल में बुलाये गये संवाददाता सम्मेलन में बसपा प्रमुख मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली को देशहित के खिलाफ करार देते हुये लोकसभा चुनाव को साथ मिलकर लड़ने की घोषणा की। समझौते के तहत यूपी की 80 लोकसभा सीटों में सपा और बसपा 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी जबकि दो सीटें सहयोगी दलों के लिये छोड़ी गयी है। दोनों ही दल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में अपने प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। बसपा सुप्रीमो ने कहा कि चार जनवरी को ही दिल्ली में सीटों का बंटवारा हो गया था।

सहयोगी पार्टियों के लिए दो सीट का झुनझुना

सपा-बसपा गठबंधन ने एक ओर 38-38 सीटें बांटकर पलड़ा बराबर रखा है, वहीं दूसरी ओर दो सीटें कांग्रेस के लिए छोड़कर उनके प्रति ‘बाहर से वफादारी’ का परिचय भी दिखा दिया। वहीं अन्य सहयोगी पार्टियों के लिए उन्होंने केवल दो सीटें छोड़कर यह तय कर दिया कि उनके साथ आने वाली पार्टी की हैसियत क्या है?

बीजेपी ने बताया ‘गुनाहबंधन’

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ महेंद्र नाथ पांडेय ने इस गठबंधन को गुनाहबंधन का नाम दिया और कहा कि ये गठबंधन यूपी को कुशासन, भ्रष्टाचार और अपराध की आग में झोंकने वाले अवसरवादी दलों का गुनाहबंधन है। मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने गांव, गरीब, दलित, पिछडों, अगडों के साथ-साथ समाज के सभी वर्गों के लिए काम किया और सुशासन की पहचान बनाई।

बिहार में खटाई में पड़ता दिख रहा है महागठबंधन

एक तरफ जहां आगामी लोकसभा चुनाव को सपा और बसपा ने यूपी में सीटों का बंटवारा कर लिया। वहीं पड़ोसी राज्य बिहार में महागठबंधन में सीटों को लेकर सहयोगी दलों में पेंच फंसा हुआ है। बिहार में विपक्षी एकजुटता की अगुवाई कर रही राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की तरफ से 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर किए जा रहे प्रयास में सबसे बड़ी चुनौती है। राजद नेता तेजस्वी यादव चाहते हैं कि जनवरी के आखिर तक लोकसभा की सभी 40 सीटों का बंटवारा हो जाए। लेकिन, अलग-अलग मांगों के चलते इस दिशा में पार्टी की कोशिशें धीमी हो गई हैं।

क्या वाकई में हो जाएगा वोटिंग ट्रांसफर

बीएसपी सुप्रीमो मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने यह जरूर कह दिया कि दोनों दलों के कार्यकर्ता एक दूसरे को सपोर्ट करें और हर हाल में पूरा का पूरा वोट एक दूसरे पार्टी को डलवाएं। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता जमीन पर अक्सर एक-दूसरे से उलझते रहे हैं, इस हालात में दोनों दलों के कार्यकर्ता एक दूसरे को पूरा सपोर्ट नहीं कर पाएंगे। वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी इस गठबंधन को ‘विनिंग कॉम्बिनेशन’ मानते हैं और उसे बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती के रूप में देखते हैं। वह साल 1993 का उदाहरण देते हैं और कहते हैं जब पहली बार कांशीराम और मुलायम सिंह ने हाथ मिलाया था, उस वक़्त नारा लगा था ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम। कुछ इस तरह भी यूपी में हो सकता है।