स्थापत्य कला का अनूठा नमूना है खुसरो बाग

रवींद्र सिंह

इलाहाबाद। शहर में कई ऐसी इमारते हैं जो आज भी शहर के पुराने इतिहास और माहौल को ताजा कर देती हैं। इन्हीं में शामिल है खुसरो बाग, जो मुगलकाल के दौरान इलाहाबाद की समृद्धता की याद दिलाता है। भागती जिंदगी के बीच शांति की तलाश हो तो यह तलाश खुसरो बाग में खत्म होती है। समय के साथ शहर भले ही बदल गया, लेकिन सुकून खुसरो बाग के शांत वातावरण में ही मिलता है। चारों ओर से ऊंची दीवारों से घिरा खुसरोबाग इलाहाबाद जंक्शन के पास है। हरियाली व बागानों से आच्छादित मुगल काल की स्थापत्य कला का अनूठा नमूना आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र्र है।

यहां मुगल जहांगीर के परिवार के तीन लोगों का मकबरा है। बगीचों के शौकीन मुग़ल शासक जहांगीर ने खुसरो बाग़ का निर्माण करवाया था। इसका नाम जहांगीर के पुत्र खुसरो के नाम पर रखा गया। कई किलोमीटर में फैले इस बाग में मुगल निर्माण कला का शानदार नमूना देखने को मिलता है।

जहांगीर ने इलाहाबाद में 1599-1604 तक निवास किया था। अकबर द्वारा जहांगीर को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने के बाद जहांगीर के पुत्र खुसरो ने  विद्रोह कर दिया, जिसके बाद वह अपने भाई शाहजहां के हाथों पकड़ा गया। जहांगीर के आदेश पर उसे अंधा करके जेल में डाल दिया गया था। जहांगीर के सबसे बड़े बेटे खुसरो मिर्जा, जहांगीर की पहली पत्नी शाह बेगम और जहांगीर की बेटी राजकुमारी सुल्तान निथार बेगम को यहां 17वीं शताब्दी में दफनाया गया था। खुसरोबाग पूरी तरह पत्थर की दीवारों से घिरा है। कहा जाता है कि मुग़ल बादशाह जहांगीर ने अपने समय के सबसे उम्दा कारीगरों को इन कब्रों के निर्माण के लिए लगवाया था।  कहा यह भी जाता है कि जहांगीर के बड़े बेटे को उसके भाई शाहजहां द्वारा मार दिया गया था, इसलिए उसकी मां ने आत्महत्या कर ली थी। सम्राट ने इन कब्रों और मकबरे को बनवाने में कोई कसर  नहीं छोड़ी। यह बगीचा अमरूद के लिए भी प्रसिद्ध  है।