EXCLUSIVE: एक बार फिर सियासत की धुरी बनते मुलायम

  • कभी शिवपाल तो कभी अखिलेश के हो जाते हैं नेताजी
  • अब अलग-अलग हो गए लोहिया और जनेश्वर के लोग
  • शिवपाल को आधिकारिक दफ्तर सौंप दिया मुलायम ने

मधुकर त्रिपाठी/सुनील मिश्र

नया लुक लखनऊ। लोग इन्हें धरतीपुत्र के नाम से जानते हैं। बहुत से लोग इन्हें चरखा दांव का महारती बताते हैं। हालांकि पिछले तीन दशक से यह कुश्ती के अखाड़े से बाहर राजनीति के मैदान पर जोर आजमा रहे हैं। उनके बारे में चर्चा रहती है कि यह परिवार के प्रति हमेशा से मुलायम रुख रखते हैं। लेकिन इस बार यह परिवार को लेकर ऐसे मोड़ पर हैं, जहां एक तरफ उन्हें पुत्र देखना है तो दूसरी ओर बांह जितना प्यारा भाई। भाई-भतीजावाद में फंसे उत्तर प्रदेश के इस धाकड़ सियासतदां को शुरू से ही खांटी सियासत करने की आदत रही है। इसी कारण मुलायम सिंह यादव इस बार काफी पशोपेश में हैं, वह एक कदम आगे चलते हैं तो दो कदम पीछे खिसक जा रहे हैं। एक सप्ताह पहले बेटे अखिलेश के साथ देश की राजधानी नई दिल्ली में मंच साझा किया तो कल भाई शिवपाल सूबे की राजधानी लखनऊ में के साथ लोहिया ट्रस्ट पहुंच गए।

लक-दक जीवन शैली के आदी मुलायम सिंह के बारे में कहा जाता है कि वामदल और कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग इनसे काफी प्रभावित रहते हैं। अस्सी और नब्बे की दशक में जब कांग्रेस और संघ के लोग इन पर आंखे तरेरते थे तो दिवंगत कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत की अगुवाई में सभी वामगुट के पुरोधा इनके सिर पर छाता टांगे खड़े दिखते थे। कई बार तो ऐसा भी होता था कि राष्ट्रीय राजनीति में मुलायम सिंह को बंगाल के धाकड़ पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु से ज्यादा तरजीह मिल जाया करती थी। सूबे की एक खास बिरादरी पर मेहरबां रहने वाले मुलायम सिंह ने कम्युनिस्टों को यूपी में इतना कमजोर किया कि पिछले एक दशक या उससे ज्यादा समय से सूबे में एक भी कम्युनिस्ट विधायक बनकर सदन तक नहीं आ सका।

अब बातें उत्तर प्रदेश से, सूबाई राजनीति में सैफई के मुलायम सिंह यादव का परिवार करीब तीन दशक से चर्चा में है। करीब 30 साल पहले बलिया के बागी चंद्रशेखर से टूटकर समाजवादी पार्टी बनाने वाले जेपी और लोहिया से दूर-दूर का सम्बन्ध न रखने वाला यह परिवार उनके नाम को जोर-शोर से यूपी में जरूर भुनाता रहा। वरिष्ठ पत्रकार कुंवर अशोक राजपूत कहते हैं कि चार दशक से ज्यादा विधायक और सांसद रह चुके मुलायम सिंह यादव जब तक सरकार और राजनीति में रहे हैं तब तक तो ठीक थे, लेकिन दिल्ली में रक्षा मंत्री बनते ही वह समाजवाद से दूर हो गए। डेढ़ दशक से वह न तो किसी राष्ट्रीय महत्व के विषय पर किसी की मुखालफत करते हैं और न किसी के खिलाफ मोरचा खोलते हैं। यूपीए-1 और यूपीए-2 में सहयोगी रहे मुलायम सिंह की बोली कांग्रेसी नेताओं ने इस तरह बंद की कि अब वह बोलने से कतराते रहते हैं। आलम यह है कि अमित शाह जैसे जूनियर राजनेता भी उनका हाथ पकड़कर सार्वजनिक स्थल पर अलग लेकर चले जाते हैं। बताते चलें कि राष्ट्रीय राजनीति में मुलायम सिंह का कद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से कहीं ऊंचा है। जेएनयू की प्रो. डॉ. प्रिया कहती हैं कि 32 से 35 प्रतिशत वोट कब्जाने वाले समाजवादी महज पांच लोकसभा सीटों पर सिमटकर रह गए, जबकि यूपी में उनकी सत्ता थी और उनके लाडले अखिलेश सूबे के वजीर-ए-आला थे।

आज जब समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और चाचा शिवपाल यादव के बीच मनमुटाव जारी है तो भी मुलायम सिंह यादव दांव खेलने से बाज नहीं आ रहे हैं। किसान डिग्री कॉलेज बहराइच में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डॉ. चंद्रमोहन उपाध्याय कहते हैं कि लोहिया के जन्म दिन के बहाने लोहिया ट्रस्ट जाकर मुलायम सिंह ने यह पुख्ता कर दिया कि शिवपाल को यह ट्रस्ट बतौर दफ्तर इस्तेमाल करना है। अब अखिलेश और उनके लोग यह संकेत भली-भांति समझ गए और उनके कई खासमखास ‘लोहिया’ से हटकर ‘जनेश्वर’ के लोग हो गए। इस तरह संकेतों से बंटवारा उन्हीं के कद का राजनेता कर सकता है।

दो टुकड़ों में बंटी पार्टी को कैसे संभालना है यह मुलायम सिंह से ज्यादा कोई नहीं समझ सकता। एक लम्बे अरसे बाद वह अखिलेश के साथ नजर आए तो कुछ दिन बाद शिवपाल के साथ मंच साझा कर उन्होंने उसकी भरपाई कर डाली। बताते चलें कि शिवपाल सिंह यादव ने कुछ दिन पहले ही यह घोषणा की थी कि मुलायम सिंह यादव समाजवादी सेक्युलर मोर्चा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले पहले उम्मीदवार है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि ‘नेताजी’ ने शिवपाल को मुगालते में रखा है, वह पुत्र से दूर किसी भी कीमत पर नहीं जा सकते। हालांकि लोहिया ट्रस्ट के कार्यालय में आयोजित उस कार्यक्रम में पूर्व राज्यसभा सदस्य तथा मुलायम सिंह के बेहद करीबी मित्र भगवती सिंह भी मौजूद थे। बताते चलें कि करीब 15 दिनों पहले शिवपाल सिंह उनसे मिलने उनके आवास पहुंचे थे और भगवती सिंह ने उन्हें अपना आशीर्वाद भी दिया था।

पाला बदलने में माहिर हैं मुलायम

बता दें कि मुलायम सिंह यादव पाला बदलने के लिए काफी मशहूर हैं। हर सियासतदां उनकी इस आदत से बखूबी वाकिफ है। अब कोई यह नहीं जान पा रहा है कि वह कब और किस पाले में जा बैठेंगे? यूपीए-2 के जमाने में वह कांग्रेस का विरोध करते-करते उन्हें बाहर से समर्थन देने में तनिक भी गुरेज नहीं कर पाए थे। कई मौके पर वह मनमोहन सरकार के खेवनहार भी साबित हुए। अब जब केंद्र में बीजेपी गद्दीनसीन है, इतने बड़े-बड़े मुद्दे होने के बावजूद वह बीजेपी का पूर्णरूपेण विरोध नहीं कर पा रहे हैं। अपने पोते तेजपाल सिंह यादव की शादी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुलाने वाले मुलायम सिंह अब बीजेपी के सुर में सुर भी मिला लेते हैं। हालांकि नेताजी के बीजेपी से घनिष्ठ सम्बन्ध तीन साल पहले बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान ही एक्सपोज़ हो गए थे, जब उन्होंने लालू प्रसाद यादव से नाता तोड़ कर अपने कैंडिडेट खड़े करते हुए बीजेपी की जीत की भविष्यवाणी कर दी थी। मशहूर अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी कहते हैं कि मुलायम सिंह का यह डर सीबीआई, ईडी और आईटी की वजह से है। नहीं तो पूर्व रक्षामंत्री मुलायम सिंह यादव इस मुद्दे पर जरूर भाजपा की मुखालफत करते। वह कहते हैं कि सपा तीनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में ‘एकला चलो’  की राह पर इसी के डर के कारण चल पड़ी है।

बीजेपी की ‘डमी’ बनने को आतुर शिवपाल

अमर सिंह के करीबी मित्रों में शुमार शिवपाल सिंह यादव के बारे में सूबे में चर्चा है कि वह भारतीय जनता पार्टी की राह आसान करने में जुटे हैं। कहीं उन्हें डमी बीजेपी की उपाधि मिल रही है। गोंडा से लखनऊ आए राम खेलावन यादव कहते हैं कि बीजेपी के लोगों ने शिवपाल को समाजवादी पार्टी तोड़ने का ठेका दिया है, लेकिन वह इस मंशा में सफल नहीं हो पाएंगे। ठेका बांटने में माहिर शिवपाल अब ठेकेदार हो गए हैं, जनता लगातार घट रही इन घटनाओं से जागरूक हो चुकी है। ये वही शिवपाल हैं, जिन्हें भाजपा कदम-कदम पर उपकृत कर रही है और वो समाजवादी खेमे को तोड़ने पर तुले हैं।

बहरहाल अब देखना है कि नेताजी लोकसभा चुनाव तक अभी कितने पाले बदलते हैं। मीडिया के साथ अक्सर गलबहियां करने वाले अखिलेश यादव मौके-बेमौके अपने परिवार की लड़ाई का ठीकरा मीडिया पर फोड़ देते हैं। कई बार वह सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि अंकल (अमर सिंह) की वजह से ही यह सब कुछ हो रहा है। भले ही अभी चर्चा का बाजार गर्म है कि सपा में दो टुकड़े में बंट चुकी है, लेकिन हालात ऐसे ही रहे तो अभी कई टुकड़े और हो सकते हैं।

समान विचारधारा के अलम्बरदार लेकिन जमीन-आसमान का अंतर

राजनीति के जानकारों की मानें तो लालू यादव और मुलायम सिंह यादव करीब-करीब एक ही विचारधारा की राजनीति करते हैं, लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। लालू के बारे में कहा जाता है कि वह कह के कभी पीछे नहीं हटते और मुलायम पल-पल, हर पल पाला बदलते रहते हैं। लालू कल भी सांप्रदायिक ताकतों के विरुद्ध थे और आज भी हैं। उन्हें अपनी बीमारी की भी चिंता नहीं है, लेकिन नेता जी के बारे ऐसा नहीं कहा जा सकता।

…आखिर कैसे लड़ेंगे बीजेपी से जंग

अभी कुछ दिनों पहले शिवपाल यादव ने कहा कि राम मनोहर लोहिया की विरासत को आगे बढ़ाने की हमारी ज़िम्मेदारी है। अगर नेताजी हमारे साथ हैं, तो हम देश में एक नई क्रांति शुरू करेंगे। वह कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ गठबंधन करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा कि हम लोहिया जी के विश्वासों, आदर्शों को आगे बढ़ाएंगे और सांप्रदायिकता के खिलाफ जंग करेंगे। वह दावा करते हैं कि किसी भी कीमत पर वह बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे।