EXCLUSIVE: कश्मीर पर बढ़ेगी रार, 2009 के टॉपर आईएएस शाह फ़ैसल ने दिया इस्तीफ़ा

  • बोले- कश्मीर में केंद्र सरकार कर रही गलत, उमर ने बांहें फैलाकर किया खैरमकदम
  • आखिर आईएएस-आईपीएस अफसरों को क्यों जल्दी रहती है नेता बनने की

अभ्युदय अवस्थी

लखनऊ। जम्मू-कश्मीर से साल 2009 में सिविल सेवा परीक्षा (UPSC ) टॉप करने वाले आईएएस अफसर शाह फ़ैसल ने कश्मीर में हिंसा के कारण हो रही पत्थरबाजों व आतंकियों की हत्याओं के विरोध में अपने पद से इस्तीफ़ा देने का ऐलान किया है। ट्विटर पर उन्होंने लिखा कि कश्मीर में बेरोक हत्याओं और केंद्र सरकार से किसी भी विश्वसनीय राजनीतिक पहल के अभाव में मैंने इस पद से इस्तीफ़ा देने का फैसला किया है। शाह ने कहा कि कश्मीरियों की ज़िंदगी मायने रखती है। बताते चलें कि फैसल जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिला स्थित लोलाब घाटी के रहने वाले हैं। शेरे कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस से ग्रेजुएट शाह सिविल सेवा टॉप करने वाले पहले कश्मीरी थे। उन्होंने इराम से शादी की, जिसकी चर्चा उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर लगातार बना रखी थी।

साउथ एशिया को रेपिस्तान बताकर पूरे देश में एकबारगी चर्चित हुए शाह फैसल के इस्तीफे के बाद उनका स्वागत करने वालों की कतार सी लग गई है। नेशनल कांफ़्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने एक ट्वीट करके शाह फ़ैसल के फ़ैसले का स्वागत किया। उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया, ” ब्यूरोक्रेसी का ये नुकसान राजनीति के लिए फ़ायदेमंद होगा। स्वागत है आपका।” उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो उन पर कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद भी डोरे डाल सकते हैं, क्योंकि उन्हें समझाने के लिए कांग्रेस में अच्छे-खासे अफसरों की फौज है।

राजनीति के जानकारों की मानें तो शाह फैसल को यह पता चल गया था कि आईएएस अफसर से कई गुना ज्यादा पॉवर राजनीति में होती है, इसलिए उन्होंने एक बड़ी बहस कराकर अपनी नौकरी छोड़ रहे हैं। इस फैलसे के बाद लग रहा है कि शाह राजनीति में कदम रख सकते हैं। उमर के ट्वीट के बाद इस कयास को और बल मिल रहा है कि फैसल शाह इस साल होने वाले चुनाव में बतौर सांसद खुद को मैदान में झोंक सकते हैं। उन्हें ब्रेक देने के लिए फारुख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी पहले से ही इस्तकबाल कर चुकी है।

बुरहान वानी के साथ भी सुर्खियों में आए थे शाह फैसल

फैसल पहले भी कर चुका है आतंकी बुरहान वानी का समर्थन?

ज्ञात रहे कि ये वही आईएएस है जिसने खूंखार  आतंकी बुरहान वानी की सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ के बाद भी शाह फ़ैसल ने फ़ेसबुक पर एक विवादस्पद टिप्पणी की थी। बताते चलें कि शाह फ़ैसल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा था कि वो कश्मीर के हालात पर दुखी हैं। उन्होंने फ़ेसबुक पोस्ट लिखा था कि कश्मीर हाल में हुई मौतों पर रो रहा है और न्यूज़रूम से फैलाए जा रहे प्रोपेगैंडा के कारण कश्मीर में नफ़रत बढ़ी है और ग़ुस्सा बढ़ा है। उस समय वह श्रीनगर में शिक्षा विभाग के प्रमुख थे और कश्मीर हिंसा के दौरान मीडिया के रवैये से नाराज़ थे। उन्होंने बुरहान वानी के साथ अपनी तस्वीर दिखाए जाने पर नाराज़गी जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि देश में मीडिया का एक तबका फिर से कश्मीर में हिंसा की ग़लत तस्वीर दिखा रहा है, लोगों को बांट रहा है और लोगों में नफ़रत फैला रहा है।

…फिर साबित हुआ आतंकवाद का होता है धर्म?

फैसल के इस्तीफे को अधिकांश हिंदुस्थानी आतंक समर्थित इस्तीफे के तौर पर देख रहे हैं। आतंकियों के समर्थन में दिए गए इस्तीफे से एक बार फिर बहस छिड़ गई है कि क्या आतंक का धर्म होता है? कश्मीरी पंडितों से बलात्कार, लूट और हत्याओं के सहारे कश्मीर खाली करवाने वाले इस्लामी आतंकी व स्थानीय इस्लामिक फॉलोवर्स खुलकर आतंकवाद में संलग्न हैं, ये सर्वविदित है।

इसके पहले भी फैसल फैला चुके हैं सनसनी

शाह फैसल ने ट्वीट में लिखा था कि पितृसत्ता, अशिक्षा, पोर्न, तकनीक, शराब, अराजकता, भुखमरी के कारण साउथ एशिया रेपिस्तान बनता जा रहा है। शाह फैसल को साउथ एशिया में बलात्कार की बढ़ती घटनाओं पर ट्वीट करना महंगा पड़ा। फैसल के खिलाफ केंद्र सरकार के पर्सनल एवं ट्रेनिंग विभाग की सिफारिश पर जम्मू कश्मीर जनरल प्रशासनिक विभाग (जीएडी) ने विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी है।

स्टडी लीव पर चल रहे फैसल ने जीएडी के पत्र को लव लेटर करार देकर दोबारा ट्वीट किया और उक्त पत्र को भी ट्वीटर पर डाला है। उन्होंने कहा स्वतंत्र एवं लोकतांत्रिक भारत को एक कालोनी के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने फैसल के ट्वीट को सर्विस रूल 1968 का उल्लंघन करार दिया है। फैसल के अनुसार, वह इस रूल को बदलना चाहते हैं। बस यही उनकी मंशा थी।

आईएएस-आईपीएस अफसर जल्द बनना चाहते हैं राजनेता

बड़े नेताओं की लोकप्रियता और उनकी सुपरहीरो वाली इमेज से हर कोई प्रभावित होता है, तो उनमें अफसर भी शामिल होते हैं। ऐसे में बड़े अधिकारियों के पास कई कारण होते हैं जो उनको राजनीति में आने के लिए प्रेरित करते हैं। इनमें जनसेवा जैसी भावना के साथ रूतबा और पॉवर जैसी चीजों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बताते चलें कि देश के लाखों युवाओं का सपना आइएएस अधिकारी बनना होता है। हर साल लाखों युवा आइएएस बनने का सपना लिए ये परीक्षा देते हैं और उनमें से बहुत ही गिने-चुने प्रतिभागी अंतिम चयन के लिए चुने जाते हैं। अब आपको यह जानकर हैरानी हो रही होगी कि राजनीति के लिए कोई कलेक्टरी कैसे छोड़ सकता है। लेकिन, ऐसा वास्तव में हो रहा है और फिलहाल इस चलन में और बढ़ोत्तरी हो सकती है।

छत्तीसगढ़ के कांग्रेस प्रभारी और राज्यसभा सांसद पीएल पुनिया की गिनती यूपी के तेजतर्रार आईएएस अफसरों में की जाती थी

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के चहेते कलेक्टर ओपी चौधरी भी राजनीति के लिए आईएएस कैडर छोड़ दिया और खरसिया से विधायकी लड़े। वहीं छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी आईएएस अफसर रह चुके हैं। उन्हें सबसे ज्यादा चर्चा इंदौर में कलेक्टर रहने के दौरान ही मिला था। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के कांग्रेस प्रभारी पीएल पुनिया यूपी के तेजतर्रार आईएएस अफसरों में गिने जाते थे।

वहीं जदयू के राज्यसभा सांसद आरसीपी सिंह कभी कांग्रेस के मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के निजी सचिव हुआ करते थे। पूर्व डीजीपी बृजलाल भी कभी मायावती के चहेते अफसर थे, लेकिन आज योगी सरकार में दर्जा प्राप्त मंत्री हैं। राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डॉ. सीएम उपाध्याय कहते हैं चूंकि राजनीति के ताकत को आईएएस/आईपीएस बड़े करीब से देखता है तो उसे अपनी ताकत समझ में आने लगती है, इसलिए वह भी ताकतवर होने और जल्दी तरक्की करने के लिए राजनेता बनने की राह पर निकल पड़ता है।

लखनऊ के पूर्व कांग्रेसी नेता संजय दीक्षित कहते हैं कि यूपी में एक अदना सा नेता आए और पार्टी ने उन्हें संगठन मंत्री बना दिया। कुछ दिनों में उनके दरबार में प्रदेश के मंत्री, विधायक और सांसद अपना माथा रगड़ने लगे। ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर सीएम के दौरे तक वह तय करने लगे। इतनी त्वरित तरक्की देखकर कोई भी राजनेता बनने का सपना देखने लगेगा।

नेता बनने के लिए चार साल यूपी से भाग गए थे एडीजी शेरपा

एडीजी दावा शेरपा भी राजनीति में आजमाना चाहते थे भाग्य

यूपी के एडीजी दावा शेरपा भी नेता बनने के लिए लम्बी छुट्टी लेकर गायब हो गए थे। गृह विभाग के सूत्रों का कहना है कि साल 2008 से लेकर 2012 तक उनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। इसी दौरान दावा शेरपा बीजेपी में शामिल हुए और पश्चिम बंगाल में पार्टी के सचिव बन गए। दार्जिलिंग के शेरपा 2009 में लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन आख़िरी वक्त में जसवंत सिंह को टिकट मिल गया और वह हाथ मलते रह गए। बाद में बीजेपी छोड़ कर वह अखिल भारतीय गोरखा लीग में शामिल हो गए।

छह क्षेत्रीय पार्टियों के मोर्चा डेमोक्रेटिक फ्रंट का उन्हें संयोजक भी बनाया गया, लेकिन उसके बाद भी वह राजनीति में कोई तीर नहीं मार पाए और थक हारकर शेरपा वापस यूपी लौट आये। अब वह प्रमोशन पाकर एडीजी बन चुके हैं और गृह मंत्री राजनाथ सिंह के करीबी लोगों में शुमार हैं। सपा नेता सुनील साजन कहते हैं कि विपक्ष को परेशान करने के लिए ही भगवाधारी अफसरों को पोस्ट किया जा रहा है। ऐसे लोगों को तो नौकरी से बाहर देना चाहिए था। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता अशोक सिंह कहते हैं कि जो अधिकारी कल तक भाजपाई था, उससे आप निष्पक्षता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? बताते चलें कि अक्टूबर 2008 में दावा शेरपा सीतापुर में पीएसी के कमांडेंट थे। बाद में उन्होंने वीआरएस के लिए आवेदन किया था, लेकिन सरकार ने इसे मंजूर नहीं किया था।