Exclusive: क्या आप जानते हैं पुलिसिया ‘हॉट स्प्रिंग’

रतींद्र नाथ

पटना। प्रत्येक वर्ष 21 अक्टूबर को हिन्दुस्तान में ‘पुलिस स्मृति दिवस’ मनाया जाता है। आखिर इस तारीख को क्यों भारतीय पुलिस के इतिहास के सपफों में जगह मिली हुई है? पड़ताल करती रतीन्द्र नाथ की रिपोर्ट!
हमारे मुल्क में शहीदों की पुण्य भूमि कहां है? वह कौन सी पाक सरजमीं है जहां साल में एक बार विभिन्न प्रांतों के चुनिंदा आईपीएस अफसर पहुंचकर अपनी सलामी देते हैं, पुष्प अर्पित करते हैं? क्या है इसकी पृष्ठभूमि? इससे चारचश्म होने वास्ते आज से 56 वर्ष पीछे लौटना होगा। दरअसल, भारत-चीन यु( से तीन साल पहले की बात है। इक्कीस अक्टूबर, 1959 का दिन था वह। सुबह से ही हाड़ कंपा देने वाली ठंड पड़ रही थी लद्दाख में। पहाड़ी बर्फीली हवा थपेड़े मार रही थी। बावजूद इसके केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल सीआरपीएफ के हेड कांसटेबल पूरन सिंह के नेतृत्व में कुल बारह जवानों की एक छोटी-सी टुकड़ी बॉर्डर की सुरक्षा हेतु ‘हॉट स्प्रिंग’ में तैनात थी। सभी जवानों के कंधें पर राइफल लटक रही थी। शाम का धुंधका गहराते ही सभी सिपाही ‘हॉट स्प्रिंग’ चौकी से थोड़ा फासले पर गश्त लगाने लगे थे। इसी दरमियान हथियारों से लैस चीनी ब्रिगेड ने अंधाधुंध फायरिंग करते हुए ‘हॉट स्प्रिंग’ पर धावा बोल दिया था। इस पोस्ट को जीत लेना ही उनका मकसद न था, बल्कि इस आक्रमण के बहाने वे लद्दाख में घुसकर अपना झंडा फहराना चाहते थे।

भारतीय केंद्रीय रिवर्ज पुलिस बल के योद्धाओं में भी देशभक्ति और हिम्मत कूट-कूटकर भरी थी। लिहाजा, अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए वे भी शत्रुओं पर टूट पड़े थे। उनकी राइफलें भी आग उगलने लगी थीं। फिर तो भयंकर गोलीबारी आरंभ हो गयी थीं। चीनियों की संख्या साठ-सत्तर के करीब थी। चीनी फौज से घिर जाने के बाद भी सीआरपीएफ के लड़ाकू जत्थे ने उनके दांत खट्टे कर दिये थे । महज बारह सिपाहियों ने चीन की भारी तादाद वाली सेना को ऐसा जबरदस्त सबक सिखाया था कि उन्हें ‘हॉट स्प्रिंग’ से भागना पड़ा था।

अपनी इस शर्मनाक पराजय से चीनी फौज खार खाये बैठी थी, इसलिए उसने रात के नौ बजते-बजते पुनः उसी जगह धावा बोल दिया था। इस चढ़ाई का जवाब भी सीआरपीएफ ने कमर कस कर दिया था। उनकी गोलियों से कई चीनी ढेर हो गये थे। मगर चीनियों की विशाल पलटन के सम्मुख भारत मां के वीर जवान पूरन सिंह, ध्रम सिंह, नोरबू लामा, शिवनाथ प्रसाद, वेगराज, टसेरिंग नासू, हंगजीत सिंह, स्वर्ण दास, इमाम सिंह तथा माखन लाल अधिक समय तक इसलिये नहीं टिक सके क्योंकि उनकी गोलियां खत्म हो चुकी थीं। अंततः दसों सिपाही चीनी फौज के हाथों अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गये थे। इसके बावजूद भारत की एक इंच भूमि भी चीनी उनसे छीनने मेें कामयाब नहीं हो सके थे। देशभक्ति का अनूठा जज्बा प्रस्तुत कर सीआरपीएफ के योद्धाओं ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा लिया था।

इस मुठभेड़ के पश्चात् भारत के प्रतिरक्षा मंत्राी, चीफ ऑफ दि आर्मी स्टाफ जनरल चौधरी, सीआरपीएफ के महानिदेशक वगैरह सूरतेहाल का जायजा लेने ‘हॉट स्प्रिंग’ पहुंचे थे। शहीदों की जांबाजी अब भी वहां के वातावरण में गूंज रही थी। अतएव उन्होंने फौरन निर्णय लिया कि प्रत्येक वर्ष पूरे देश में ‘पुलिस संस्मरण दिवस’ मनाया जायेगा। उस दिन पुलिस बल की तमाम शाखाएं तथा केंद्रीय पुलिस फोर्स ;सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी आदि के ऑफिसर तथा जवान उन शहीदों की याद में हवाई पफायरिंग करने के बाद अपने आर्म्स लौटकर उन्हें श्रंद्धाजलि अर्पित करेंगे। लिहाजा, सन् 1960 से ‘पुलिस संस्मरण दिवस’ सारे देश में आयोजित करने का सिलसिला ही चल पड़ा। 1959 में ही यह भी तय हुआ था कि हर साल सितम्बर के प्रथम या द्धितीय सप्ताह में विभिन्न राज्यों से चुने गये चालीस वर्ष से कम आयु के एक-एक पुलिसकर्मी ‘हॉट स्प्रिंग’ जाकर, स्मारक पर शीश नवाएंगे। दरअसल, अक्टूबर आते-आते संपूर्ण लद्दाख में इस कदर बपर्फबारी होती है कि वहां जाना मुमकिन नहीं होता, इसलिए सितम्बर में ही पुलिस के चयनित जवान ‘हॉट स्प्रिंग’ के अमर शहीदों को सलामी देते हैं। इक्कीस अक्टूबर को केवल ‘हॉट स्प्रिंग’ के निकट की टुकड़ी ही सैल्यूट करती है।

जम्मू-कश्मीर भौगोलिक द्धष्टि से तीन भागों में बंटा है-जम्मू का मैदानी क्षेत्र, कश्मीर घाटी तथा लद्दाख का बर्फीला रेगिस्तान। चीन अधिक्रत तिब्बत लद्दाख से बिलकुल सटा हुआ है। पूरा लद्दाख लगभग वर्षभर बर्फ से पटा रहता है। यहीं सीमा के बिलकुल पास भारतीय क्षेत्रा में स्थित है ‘हॉट स्प्रिंग’। ‘हॉट स्प्रिंग’ का शाब्दिक अर्थ ‘गर्म जल का कुंड’ होता है। यहां के पानी में सल्फर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, इसलिए यह पानी गुनगुना होता है।

जिस मिट्टी पर सीआरपीएफ के दस जवान शहीद हुए थे, उनके सम्मान में यहां एक स्मारक बनाया गया। कालान्तर में पंडित गौतल कौल ने उस स्मारक को विराट स्वरूप प्रदान किया था। हॉट स्प्रिंग का यह अमर स्मारक ‘बुलिस्ट शैली’ में निर्मित है। स्मारक के उूपर एक धर्म-चक्र है और चारों कोनों पर एक-एक प्रार्थना-चक्र। गौरतलब है कि पंडित गौतम कौल आईटीबीपी के डीजी हुआ करते थे। इण्डो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के महानिदेशक पद पर रहते हुए कौल ने ‘हॉट स्प्रिंग’ के शहीद स्मारक की कायापलट की थी तथा इक्कीस अक्टूबर की तिथि का नामकरण ‘पुलिस संस्मरण दिवस’ के बदले ‘पुलिस स्मृति दिवस’ कर दिया था।

‘हॉट स्प्रिंग’ के इन अमर शहीदों को श्रंद्धाजलि अर्पित करने का सौभाग्य बिहार प्रांत से अमिताभ कुमार दास को भी मिला था। समय पर उन्हें सूचित कर दिया गया था कि 20 अगस्त, 2000 को आईटीबीपी ;इण्डो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के चंडीगढ़ केन्द्र में उपस्थित होकर रिपोर्ट करनी है।

अमिताभ कुमार दास बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और तब पटना सचिवालय स्थित अपराध अनुसंधान विभाग में आरक्षी अधीक्षक के पद पर कार्यरत थे। अमिताभ कुमार दास पवित्रा उद्देश्य के लिए की जाने वाली इस रोमांचक यात्रा के लिए खासे उत्साहित थे। निर्धारित दिन और समय पर वे चंडीगढ़ पहुंच गये थे। देश के अन्य प्रांतों के पुलिसवालों को भी वहीं बुलाया गया था। यहां से सभी को एक साथ रवाना होना था। दूसरे दिन तमिलनाडु के आईपीएस अधिकारी राजेश दास के नेतृत्व में यह दल अपनी यात्रा पर निकल पड़ा था।

हॉट स्प्रिंग की इस साहसी टीम का प्रथम पड़ाव था बंदरोल। बंदरोल चंडीगढ़ से 275 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पंजाब के रोपड़, हिमाचल प्रदेश के विलासपुर, मंडी तथा कुल्लू के रास्ते बंदरोल पहुंचना था। बंदरोल में आईटीबीपी मेस में इस जत्थे को ठहराया गया था।

यात्रा का अगला पड़ाव सरचू ;हिमाचल प्रदेश था और उसके बाद लेह। लेह के बाद दुर्गम पैदल रास्ता था। तीस अगस्त के तड़के सभी जवान पीठ पर अपना बैग टांगे पैदल ही फोबरंग की ओर मार्च करने लगे थे। फोरबंग का रास्ता अति दुर्गम था। संकरा-सा मार्ग कीचड़, पानी, कंकड़-पत्थरों से भरा था।

सितम्बर की दूसरी तारीख को पुलिसवाले अपने मुकाम बाओ के लिए रवाना हुए। बाओ का अर्थ होता है- भाला। और वास्तव में फोबरंग के बाद बहुत की चौड़ा नाला इस दल को मिला। कई पहाड़ी नदियां भी इस पथ पर थीं। ये नदियां सुबह में सूखी रहती थीं तथा ज्यों-ज्यों दिन चढ़ता था, पूरी उफान पर आ जाती थीं।

बाओ के बाद यह दल सोमसालू पहुंचा और 4 सितम्बर की सुबह हॉट स्प्रिंग के लिए निकल पड़ा। सोगसालू से हॉट स्प्रिंग तक का पच्चीस किलोमीटर का मार्ग सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन की सरहद यहां से नजदीक है। यह पूरा इलाका फौज के नियंत्राण में है।

अपराहन के ठीक चार बजे यह साहसिक दल हॉट स्प्रिंग के अमर स्मारक के सामने था। आईटीबीपी के तत्कालीन महानिदेशक पंडित गौतम कौल ने जांबाज पुलिस अधिकारियों एवं अन्य पुलिस जवानों का स्वागत किया। लगातार चौदह दिन तक दुर्गम मार्ग पर सफर करते हुए अपनी मंजिल तय कर इस टीम ने एक कीर्तिमान स्थापित किया था। अमिताभ कुमार दास के लिए यह अविस्मरणीय पल थे।

अगले दिन सुबह सभी पुलिस वालों ने वर्दी पहनी। घड़ी की सुइयों ने ज्यों ही दस बजाये, सर्वप्रथम ‘शोक परेड’ शुरू हुआ। पिफर सभी पुलिसकर्मी ने स्मारक पर पुष्प अर्पित किये। इसके बाद इक्कीस राइफलों से हवा में गोलियां दागकर जत्थे ने अपनी राइफलें उलट दी थीं और उन अमर सपूतों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखा था। पुनः इक्कीस राइफलों को सीध खड़ा कर यह पावन सरजमीं राष्ट्रगान से गूंज उठी थी।

उस वक्त हवा के झोकों से भारत का तिरंगा लहरा रहा था। इस झंडे को भी अपने वीर-बांकुरों पर फख्र था, नाज था। बहरहाल, पुलिस अगर नहीं रहे तो लोगों की जिन्दगी पर ग्रहण लग जाएगी। बावजूद इसके हरदम पुलिस को गालियां हीं आम जन से सुननी पड़ती हैं। पुलिस को भी चाहिए कि वह अंग्रेजी में अपनी स्पेलिंग के अनुरूप काम करे। यानी कि पी से पोलाइट, ओ से ओबिडिएन्ट, एल से लरनेड, आई से इंटेलिजेन्ट, सी से कॉम्पीटेंट और ई से ईपफीसिएन्ट।