OMG! न डिग्री न अनुभव, फिर भी शर्तिया इलाज का दावा

  • यूपी में फल-फूल रहा है झोला छाप डॉक्टरों का धंधा
  • सरकारी अस्पतालों का रवैया भी गैर-जिम्मेदार

केस-1

जिला महराजगंज के निचलौल से सटे जमुई पंडित के सुबोध पांडेय को सीने में दर्द की शिकायत होती है। वह बाइक निकालते हैं और एक झोला छाप डॉक्टर के पास पहुंच जाते हैं। वह वायरल की बात बताता है और हाई एंटीबॉयोटिक (मोनोसेफ) दवाएं देना शुरू कर देता है। कुछ दिनों बाद जब उनके सीने में दर्द बढ़ जाता है तो वह गोरखपुर के मशहूर हृदयरोग विशेषज्ञ को दिखाने पहुंचते हैं। वह जांच कराते हैं और कहते हैं कि हार्ट की पांच नसें ब्लॉक हैं, केवल एक नब्ज काम कर रही है इसलिए आप जिंदा है। वह आनन-फानन किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी पहुंचते हैं और ओपन हार्ट सर्जरी के बूते जान बचा पाते हैं। लॉरी कार्डियोलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉ. वीएस नारायण कहते हैं कि छोटा सा हार्ट अटैक था, हाई एंटीबॉयोटिक के कारण उसका असर बड़ा हो गया।

केस-2

कुछ दिनों पहले उन्नाव में एक बड़ी लापरवाही का मामला आया था। एक झोलाछाप डॉक्टर के इलाज के बाद 21 लोग HIV संक्रमित पाए गए थे। इनमें से अधिकांश दिहाड़ी मज़दूर थे। बताया जा रहा है कि डॉक्टर ने एक ही सीरींज़ से सभी लोगों को इंजेक्शन लगा दिया और सभी संक्रमण के शिकार हो गए। इस मामले में स्वास्थ्य विभाग ने अज्ञात के ख़िलाफ़ एफ़आईआर लिखवाई थी, लेकिन क्या हुआ यह लोग सहज समझ सकते हैं।

केस-3

कुछ इसी तरह मथुरा के महानगर क्षेत्र में कृषि मंडी के समीप हरिहर क्लीनिक में उपचार के दौरान महिला की मौत हो गई थी। यह महिला तीन दिनों से वहां भर्ती थी। घटना के बाद झोलाछाप फरार हो गया था। गांव उस्फार की रहने वाली 42 वर्षीय गुड्डी पत्नी पप्पू को बुखार आया था। परिवार वालों ने तीन दिन पहले उसे दिल्ली-आगरा हाईवे पर स्थित हरिहर क्लीनिक पर भर्ती करा दिया था।

अरुण वर्मा, ब्यूरो चीफ/अवनींद्र शुक्ल

महराजगंज/गोरखपुर/लखनऊ। शहर की गलियों से लेकर गांव के चौक-चौराहे और सड़कें नहीं बची हैं, जहां झोला छाप डॉक्टरों की भरमार न हो। बिना किसी डिग्री के यह डॉक्टर बड़े-बड़े हरफों में डिग्रियां लिख डालते हैं। आलम यह कि एक गली में पांच-छह लोग इस तरह के लोग दिख जाते हैं। सबकी अपनी टाइमिंग है और सबका अपना मेहनताना। इन्हें इस बात की फिक्र नहीं है कि मरीज को क्या बीमारी है, सबको हाई-एंटीबॉयोटिक देना शुरू कर देते हैं। हालांकि सरकारी तंत्र में बैठे लोग इन झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की बात जरूर करते हैं लेकिन कार्रवाई के नाम पर इनकी मशीनरी केवल धन उगाही करती है।

पैसे कमाने के लिए अपनी दुकान खोले इन डॉक्टरों को किसी के जान-माल की चिंता नहीं रहती। वह केवल पैसे बढ़ाने और कमाने के बारे में सोचते हैं। तभी तो शहर के जिस हिस्से में कंस्ट्रक्शन की ज्यादा साइटें चलती हैं, वहां इनकी दुकान बहुत जल्दी खुल जाती है। देहात क्षेत्र में ये डॉक्टर यह चिंता करते हैं कि किस बाजार के पास लोगों का जमावड़ा ज्यादा होता है, बस वहीं इनकी दुकान सज जाती है और मौत बांटना शुरू कर देते हैं।

कल योजना भवन में छह पुराने राजकीय मेडिकल कॉलेज समेत दो संस्थानों की हॉस्पिटल परियोजना का लोकार्पण किया। प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाएं जल्द ही बेहतर होंगी। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने आठ मेडिकल कॉलेज यूपी को दिए हैं। पहले से पांच का निर्माण चल रहा है। आजादी के बाद से केवल 13 मेडिकल कॉलेज यूपी में बने थे। वहीं इन चार साल के अन्दर ही 13 और बन रहे हैं, जहां भी काम चल रहे हैं उन्हें इस साल के अंत तक काम पूरा करने का निर्देश दिया गया है। तीन मेडिकल कॉलेज 2019 में शुरू हो जाएंगे। इनके संचालित होने से व्यवस्था में सुधार होगा। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी को दूर करने के लिए प्रयास हो रहे हैं। इसके लिए मेडिकल कॉलेजों की सीट बढ़ाई जाएगी। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी के सवाल पर वह कहते हैं कि सरकार व्यवस्था कर रही है कि जो भी चिकित्सक सरकारी मेडिकल कॉलेज से शिक्षा ग्रहण करके निकल रहे हैं, उन्हें कम से कम दो से तीन साल सरकारी अस्पताल में ड्यूटी करनी होगी। इसका बांड प्रवेश के समय ही भरवाया जाएगा। इससे हर साल दो हजार चिकित्सक प्रदेश के सरकारी अस्पतालों को मिलते रहेंगे।

लखनऊ के पीडियाट्रिक्स डॉ. संजय निरंजन कहते हैं कि यह पूरी तरह से सरकारी तंत्र की नाकामी है। दुनिया के सामने वह दुकान खोलता है और स्वास्थ्य अमले को दिखाई न देना, कहां समझ में आता है। अब स्वास्थ्य विभाग के लोग केवल धन उगाही करेंगे तो इस तरह के झोला छाप डॉक्टरों की बाढ़ आ ही जाएगी। वहीं लखनऊ के मशहूर फिजीशियर डॉ. पीके पांडेय कहते हैं कि सरकारी तंत्र की नाकामी के साथ-साथ हमारे प्रदेश के लोगों की मनःस्थिति भी इस तरह के कुकुरमुत्तों को उगाने में मदद करती है।

एक सर्वे के अनुसार उत्तर प्रदेश के लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की अपेक्षा प्राइवेट इलाज को अधिक महत्व देते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के 71वें दौर के आंकड़ों के आधार पर ‘ब्रूकिंग्स इंडिया’ द्वारा जारी एक शोध के अनुसार यूपी के सभी नागरिक स्वास्थ्य पर हर साल न्यूनतम 488 रुपये खर्च करता है। ये आंकड़े केवल बिहार और झारखंड से ज्यादा हैं। हिमाचल प्रदेश द्वारा 1,830 रुपये खर्च किए जाते हैं, जिसकी तुलना में यूपी का खर्च केवल 26 फीसदी है।  शोध में गाढ़े-गाढ़े हरफों में लिखा है कि यूपी के लोग सरकारी सेवाओं से ज्यादा प्राइवेट स्वास्थ्य सेवाओं पर ज्यादा भरोसा करते हैं।

शोध की सत्यता कुछ आंकड़ें भी करते हैं। आंकड़ों के अनुसार यूपी के 20 करोड़ लोगों का स्वास्थ्य बीमा चार फीसदी तक पहुंचा है। इस मामले में अखिल भारतीय औसत 15 फीसदी है। दूसरे राज्यों की तुलना में यूपी के सार्वजनिक बुनियादी ढांचा बहुत ही खराब है। ऐसे में बिहार और हरियाणा को छोड़कर किसी भी अन्य राज्य की तुलना में यहां के ज्यादातर लोग स्वास्थ्य सेवा के लिए निजी सुविधाओं पर निर्भर करते हैं। यूपी में सरकारी स्वास्थ्य सेवा पर बदहाली के कारण 80 फीसदी स्वास्थ्य खर्च परिवारों द्वारा निजी क्षेत्र में इलाज कराने पर किया जाता है।

डॉक्टरों की कमी से झोलाछाप वालों की बल्ले-बल्ले

सूबे की बीमार स्वास्थ्य सेवाओं में एक बड़ा तथ्य यह है कि सूबे में डॉक्टरों की बेहद कमी है। हाल यह है कि राज्य सरकार ने बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के मकसद से एक साल के अनुबंध पर एक हजार डॉक्टरों की भर्ती का फैसला लिया है। इनमें 500 स्पेशलिस्ट डॉक्टर होंगे। प्रदर्शन के आधार पर इन डॉक्टरों की अनुबंध बढ़ाने पर सरकार विचार कर सकती है। पीएचसी-सीएचसी पर डॉक्टरों की कमी के चलते सूबे में झोलाछाप डॉक्टरों की संख्या में भारी वृद्धि हो चुकी है। हर चौक-चौराहों पर आपको डॉक्टर और हॉस्पिटल खुले मिल जाएंगे।

एक नजर में यूपी का बजट

वर्ष 2018-19 के लिए कुल 4,28,384.52 करोड़ रुपये का बजट पेश किया गया। यह 2017-2018 के बजट से 11.4 प्रतिशत अधिक है। बजट में 14,341.89 करोड़ रुपये की नई योजनाएं शुरू की गईं। 17 फरवरी 2018 को बजट जारी करते समय वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल ने मेडिकल कॉलेजों के लिए 126 करोड़,  चिकित्सा एवं स्वास्थ्य में प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के लिए 291 करोड़, प्रधानमंत्री चिकित्सा शिक्षा के तहत सुपर स्पेशिलिटी विभाग बनाए जाने हेतु 126 करोड़ रुपये और सूबे के पांच जनपद फैजाबाद, बस्ती, बहराइच, फिरोजाबाद और शाहजहांपुर में जिला चिकित्सालय के लिए 500 करोड़ रुपये का प्राविधान किया था। इसके अलावा ग्रेटर नोएडा एम्स को एमबीबीएस की 100 सीटों में पढ़ाई शुरू करने की अनुमति, पीजीआई में रोबोटिक सर्जरी शुरू करने की अनुमति, ग्रामीण क्षेत्रों में 100 नए आयुर्वेदिक अस्पताल खोलने का आदेश भी दिया है।

झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे लाखों की आबादी

  • 40 किमी की परिधि में नही है कोई व्यवस्थित सुविधाजनक अस्पताल
  • विभागीय मिलीभगत से 

महराजगंज जनपद के सीमाई छोर पर बसा क़स्बा ठूठीबारी के इर्द-गिर्द सुविधाओं से लैस अस्पताल ना होने के कारण लाखों की आबादी झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे है। जो बिना किसी डिग्री व अनुभव के ही शर्तिया इलाज का दावा कर आम जनता से पैसा ऐंठ रहे है। क़स्बा के हर गली चौराहों पर इनकी फलती-फूलती दुकान देख सभी चौंक जाते है कि इन्हें किसी का डर नही।

विभागीय मिलीभगत से सीमाई क्षेत्र ठूठीबारी क़स्बा सहित आसपास के गांवों के गलियों चौराहों पर चाय- पान की दुकानों की तरह ही निजी अस्पताल खोल लिए गए है। जंहा आमलोगों की जिंदगियों के साथ खुला खिलवाड़ किया जाता दिखता है। निजी अस्पतालों में बड़े बड़े डॉक्टरों का नाम लिखा लोगो को गुमराह किया जाता है और उन्ही डॉक्टरों के नाम के सहारे अपनी जेबें गर्म की जाती है। इन निजी अस्पतालों के सुविधाओं के नाम पर कुछ नही है जंहा ऑपरेशन तख्त व फर्श पर लिटा ही कर दिया जाता। ऐसी तमाम घटनाएं भी घटित होती है पर परिजन भगवान का हवाला दे अपनी जिम्मेदारियों बहक जाया करते और कुछ घटनाओं को मैनेज करा दिया जाता।

ठूठीबारी के शांतिनगर स्थित आधा दर्जन निजी अस्पतालों में बवासीर, भकन्दर व गुप्त रोगों का शर्तिया इलाज का दावा लिखा हुआ मिलता है जंहा आराम ना होने पर खर्च किये गए पैसों की वापसी की भी बात बोर्ड पर लिखी मिलती है। झोलाछाप डॉक्टर इतने शातिर दिमाग के हो गए है कि वह अस्पताल तो यहां खोले है पर उसकी शाखा नेपाल के महेशपुर में खोल रात में ऑपरेशन किया करते। सप्ताह में अपने निजी वाहनों से नेपाल व भारतीय बाजारों प्रचार प्रसार कराते देखे जाते फिर भी कोई कार्यवाही नही की जाती। ठूठीबारी के शांतिनगर, गौतमबुद्ध नगर, सडकहवा आदि क्षेत्रों में फर्जी डॉक्टरों की बाढ़ सी आ गई है। अब विभाग इस पर क्या कार्यवाही कर सकता है यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

कार्रवाई के नाम पर चल रहा मैनेज का खेल

ऐसा नही है कि विभाग जगता नही है? विभाग जगा और कई दिनों तक ताबड़तोड़ छापेमारी की कार्रवाई भी हुई, जिसमे दर्जनों संदिग्धों को नोटिस जारी किया गया। बहुत से लोगों पर मुकदमा दर्ज कराने की बात कही गई, पर अब तक हुआ कुछ नही। चर्चाओं का बाजार गर्म है कि छापेमारी की जद में आये झोलाछाप डॉक्टरों व पैथालॉजी सेंटरों के प्रोपराइटर को बुला-बुलाकर सौदा किया जा रहा है। जिसमें एक लाख से लेकर ढाई लाख रुपये तक कि डिमाण्ड कर मामले को मैनेज किया जा रहा है, और सच्चाई दिख भी रही है।

आखिर विभाग यह बताते को तैयार क्यों नहीं?

महराजगंज के डीएम अमरनाथ उपाध्याय

अब तक किन-किन झोलाछाप डॉक्टरों पर मुकदमा पंजीकृत कराया और कितने अस्पतालों को सील किया गया। अब अगर यह सच है कि पैसों के बलबूते लाखों की जिंदगी का सौदा कर एक बार फिर उन्ही झोलाछाप डॉक्टरों के हवाले कर दिया गया तो हैरानी होगी इस शासन की सार्थकता पर….? इस बावत महरागजंग के डीएम अमरनाथ उपाध्याय कहते हैं कि झोलाछाप डॉक्टरों की भरमार की खबर मिली थी, इसलिए पूरे जिले में ताबड़तोड़ कार्रवाई की गई। अब अगर स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी उस नाम पर धनउगाही कर रहे हैं तो निश्चित रूप से इसकी जांच करवाई जाएगी और गड़बड़ी में मिले कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होगी।