व्यंग्यः आर्ट आफ टार्चरिंग

तारकेश कुमार ओझा बाज़ारवाद के मौजूदा दौर में आए तो मानसिक अत्याचार अथवा उत्पीडऩ यानी टार्चरिंग या फिर थोड़े ठेठ

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